I purchased a Redmi 2 Prime 16 GB last month. It was smoothly delivered by Snapdeal with a bill dated 19th of September 2015 ( IMEI No 867935020560040). However, soon I realised that the internet function was not working on the phone. It was, however, working on wifi. I thought this must be either a fault with the sim card or service provider's fault. I contacted my service provider for the mobile data and spent long hour at the shop. The technician said this might be due to outdated software installed in the phone and i should contact the RedMi 2 service center for updating software. On 17th October 2015, i went to the local Red Mi service centre at Surat. After a long and arduous wait for about an hour, my token number blinked on the digital screen and i was at the counter explaining my problem. the mobile was handed over to the tecnician who declared software issue. Receipt was handed back to me with a request to come back and collect the mobile later. My second trip to the service centre was yesterday (19-10-2015) to collect the phone. The scene at the data centre was pathetic (with net down and customers yelling). we were asked to wait. The wait prolonged. Finally with a lot of request the mobile was handed back to us. After reaching home, we found the problem was not solved. No internet in the phone, no browser opening, no google play store. Basically net function was not working. Today, again went back to the service centre. Again spent more than one and half hours ( 10.00 AM to 111.30 AM) and finally they said the phone will have to be deposited for some motherboard issue. Now, i suppose another one month wait. The experience has been horrible.
Tuesday, October 20, 2015
Review: Redmi 2 Prime 16 GB
I purchased a Redmi 2 Prime 16 GB last month. It was smoothly delivered by Snapdeal with a bill dated 19th of September 2015 ( IMEI No 867935020560040). However, soon I realised that the internet function was not working on the phone. It was, however, working on wifi. I thought this must be either a fault with the sim card or service provider's fault. I contacted my service provider for the mobile data and spent long hour at the shop. The technician said this might be due to outdated software installed in the phone and i should contact the RedMi 2 service center for updating software. On 17th October 2015, i went to the local Red Mi service centre at Surat. After a long and arduous wait for about an hour, my token number blinked on the digital screen and i was at the counter explaining my problem. the mobile was handed over to the tecnician who declared software issue. Receipt was handed back to me with a request to come back and collect the mobile later. My second trip to the service centre was yesterday (19-10-2015) to collect the phone. The scene at the data centre was pathetic (with net down and customers yelling). we were asked to wait. The wait prolonged. Finally with a lot of request the mobile was handed back to us. After reaching home, we found the problem was not solved. No internet in the phone, no browser opening, no google play store. Basically net function was not working. Today, again went back to the service centre. Again spent more than one and half hours ( 10.00 AM to 111.30 AM) and finally they said the phone will have to be deposited for some motherboard issue. Now, i suppose another one month wait. The experience has been horrible.
Monday, October 12, 2015
मिनाक्षी और जे की हरी भरी कला
मिनाक्षी और जे की हरी भरी कला दुनियॉं
मिनाक्षी जे एक कलाकार हैं और जे सुशील
उनके पति पेशे से पत्रकार. इस दम्पति से मेरा परिचय फेसबूक के माध्यम से ही हुआ जब ये दोनो बिहार और झाड़खंड के अंदरूनी ईलाकों में अपनी फटफटिया पर सबार एक अनोखी यात्रा पर थे. इस बात के छह आठ महिने तो हो गये होंगे. ये दोनो प्राणी गॉव, देहात, कस्बा जहां भी जाते किसी के घर रूकते और वहां केस्कूल, पुलिस स्टेशन, संथाल टोले, जैसे गैर व्यक्तिगत जगहों पर किसी दीवाल को चुन कर वहीं के लोगों की मदद से पेंटिग किया करते. फिर, इस अनुठे अनुभव को इसके फोटू को अपने ब्लाग आर्टोलॉग पर और फेसबूक जैसे माध्यम से इंटरनेट पर शेयर करते. इन सुंदर चित्रों को इनके मेजवान भी फेसबूक आदि पर चिपकाते. और रंग बिरंगी दिवारों की दुनियॉं हमारे सामने तैरने लगी. ये उन्हीं दिनों की बात है जब क्या देश और क्या बिदेश, क्या सोशल मीडिया क्या मेन स्ट्रीम मीडिया हर जगह एक दूसरी किस्म का बिहारी दीवाल चक्कर लगा रहा था, लोगों की जुबान पर चढ़ा अस्मिता की राजनीति एवं पिछड़ेपन की छौंक लगा रहा था. वह दीवार बिहार राज्य के किसी स्कूल के परीक्षा भवन की थी जिसपर परिजन जद्दोजहद के साथ लटके हमें शिक्षा प्रणाली के खोखलेपन से रूबरू करा रहे थे. वह दीवार भले ही बिहार के किसी जगह की रही हो पर मीडिया में तैरते ये अक्स शिक्षा प्रणाली की बदहाली, इस बाबत हमारे अविश्वास और इसे सवभर्ट करने की सार्वभौमिक इक्छा के वाहक के रूप में तैर रहे थे. साइकोलॉजी में एक शव्द है प्रोजेक्शन. लोग अपनी दमित इक्छाओं के अक्स के रूप में बाह्य हकीकत को रूपांतरित कर संसार को आंकते है.
खैर, तो उन्हीं दिनों मिनाक्षी और जे की सुंदर तथा अंतर्दृष्टि से भरी दीवारों से मेरा परिचय हुआ था, इसी आभासी दुनिया में.
इनके कला के सौंदर्यबोध की बात मैं यहां नहीं करूंगा पर दो बातें खास तौर पर ध्यान खिंचती है. पहला तो इसका सझिया स्वरूप जो मूलत: और अपनी समग्रता में गैर-व्यक्तिगत है. अंग्रेजी का सहारा लेकर कहें तो पार्टिसीपेटरी एंड पब्लिक आर्ट. ऐसी बात नहीं कि इस कला की अपनी परंपरा नहीं रही है या इसका आकाश नहीं हो. पर, भारत में इसकी बानगी देखने में नहीं मिलती. यहां गैर व्यक्तिगत कला को या तो लोक कला के रूप में हम चर्चा करते हैं या फिर, किसी बड़े सामाजिक संकट बाली घटना के समय किये गये राजनीति प्रेरित कला की अभिव्यक्ति के तौर पर. यदि हम अपनी दृष्टि को थोड़ा विस्तार देने की जहमत उठायें तो सड़क पर दिखाई देती साईनबोर्ड, सिनेमा के पोस्टर, विग्यापन और मजदूरों के बच्चों के हाथों कभी पेंसिल से , कभी सूर्खी से, कभी ईंट से या कभी चॉक से बनायी आड़ी तिरछी रेखाओं में कला का गैर व्यक्तिगत चेहरा देख लेते हैं. पर, मिनाक्षी और जे के प्रयोग इनसे परे जाते हैं. यह लोक कला तो नहीं है पर भागेदारी के स्तर पर सझिया है, लोक तांत्रिक है. यह सिनेमा का पोस्टर नहीं पर पब्लिक आर्ट है. राजनीतिक घटना के चौखटे में बंधा हुआ तो नहीं पर हमारी स्थापित मान्यताओं और समझ के साथ सीधे सीधे साक्षातकार करता उसे झंकझोड़ने को मुखातिब जरूर है. इस रूप में स्थापित दावों को तोड़ता नये प्रतिदावों को आकार देती कला.
दूसरी खास बात है इस कला का धरातल. कलाकार दम्पत्ति दिल्ली बासी हैं पर, अपनी जमात के कलाकारों और पब्लिक आर्ट् के प्रेक्टिसनर्स से भिन्न इनके कला का संदर्भ और जमीन महानगरीय समाज और उसकी अभिजात्यता में सिमटा हुआ नहीं है. यहां गॉव देहात, कस्बे और छोटे शहर सब बसते हैं. यहां इन समाजों और इनकी समकालीनता महज चित्रों में ही नहीं है यहां शब्द और चित्र दोनों हैं. अनुभव और रंग, आप और हम, लकीर और फकीर, आज और कल.सब एक दूसरे से मिले, हर एक अपने वजूद के साथ सांस लेता.
यदि आप दिल्ली या इसके आसपास हैं तो आज कल इस दम्पत्ति के साथ इनके कला यात्रा में भागेदारी कर सकते हैं, लोधी रोड स्थित इंडिया हैबीटेट सेंटर में जहां इनकी अनोखी कला प्रदर्शिनी अक्टूबर भर चलेगी, आपकी शिरकत के लिये. मैंने फेसबूक पर बहुतेरे परिजनो और उनके बच्चों को चहकते देखा है.
Thursday, September 24, 2015
Wednesday, September 16, 2015
हॉफ सेट चाय: लाइब्रेरी स्पेशल और तीन मुर्ती
यह उन दिनों की बात है जब लाइब्रेरी स्पेशल चला करता था. दिल्ली विश्वविद्यालय से दोपहर बाद खुलता था और सभी प्रमुख लाइब्रेरी एवं आर्काइब भी जाया करता. इसी लाइब्रेरी
स्पेशल में पहले पहल देखा किया उसे. डी स्कूल के स्टाप पर बस में आयी वह. गहरे कत्थई दुपट्टे और बहुत हल्के क्रीम कलर की सूती सूट. सूट का रंग कुछ यूं कि किसी बहुत बड़े दुध के थार में एक चुटकी भर चंपई मिला दिया गया हो.
ये मेरा उस बस में पहला दिन था. ये मेरा तीन मुर्ती का भी पहला दिन था. अब तक यह सोचा करता हूं कि यह महज संयोग तो न था कि तीन मुर्ती के गेट पर उतरने बाले उस दिन महज हम दोनों ही थे. पहल उसने ही की थी, शायद तकाजे के लिये ही. एक बेहद संतुलित मुस्कान के साथ जो उस खाली बर्तन की तरह जिसमें चाहे आप जितनी कल्पना, जितने सपने भर दें, वह कभी लवरेज नहीं हो.एक ऐसी ही आत्मीय मुस्कान. तीन मुर्ती के विशालकाय एतिहासिकता की ताकीद कराता गेट, उसके अंदर जतन से संवारा गया उतना ही विशाल लॉन और उसके पीछे, नजर के दूसरे छोड़ पर एक भब्य इमारत. नेहरू जी का घर.
मैं मुस्कान को जेहन में लपेटे अपनी संकुचाहट के साथ उसके पीछे हो लिया. मुझे ठीक ठीक याद है वह उस दिन चॉंद का फांसी अंक देख रही थी, पहले फ्लोर पर माइक्रोफिल्म रीडर पर. मैं चुपचाप उत्सुकता से उसे देख आया था. यह कहना मुश्किल कि मैं लाइब्रेरी से रुबरु हो रहा था या फिर यह जानने कि वह क्या कर रही है. यह भी ठीक ठीक नहीं कह सकता कि मैं किस बात से अधिक चमत्कृत था: माइक्रोफिल्म रीडर से या फिर चांद के फांसी अंक की वह तस्वीर जो उस रीडर के पटल पर उस पल अपने धुंधलके में चमक रही थी. यह सिलसिला चल पड़ा. मैं चुपके से देख आया करता कि वह क्या पढ़ रही है. और, धीरे धीरे उस पुस्तकालय के कोनों से लगाव वढ़ने लगा. मैन्युस्क्रीप्ट सैक्शन में जहां मुझे यह विश्वास था कि महज नेहरू और कांग्रेस के दस्तावेज होंगे वहां वह माखन लाल चतुर्वेदी के खतो किताबत में मशरूफ पायी जाती. माइक्रोफिल्म पर सावरकर और मुंजे की हस्तलिखित दस्तावेज में आंख डूबोए मिलती और, ब्रिटिश हुकुमत द्वारा बैन किये प्रतिवंधित साहित्य गदर की गूंज के गुरूमुखी को उतारते हुए भी मुझे वो याद है. ऐसा नहीं कि उसे मेरी चोरी का पता नहीं हो. उसने बहुत बाद में मुझे बताया था कि लड़कियों के पीठ पीछे भी दो आंखे हुआ करती हैं और फिर उसने एक बहुत आश्वस्त करने वाली भाव प्रकट की थी. कुट्टी के कैंटीन के बाहर अहाते में आटम ब्रेक के बाद वह पहला दिन था. हम एक दूसरे से अरसे बाद मिल रहे थे. उसने ही कैंटीन चल चाय पीने का प्रस्ताव रक्खा था. हवा में हल्की रेश्मी ठंडक आ गयी थी. हॉफ सेट चाय टेबल पर आ चुका था. चाय प्याले में उड़ेलते हुए उसने पुछा था कि मैं आजकल क्या पढ़ रहा हूं. फिर, यह भी कहा था कि अगले कुछ सप्ताह वह जेनयु की लाइब्रेरी में दिनमान के साठ के दशक की प्रतियां ओर मारवाड़ी लाइब्रेरी में कुछ समय बिताएगी. फिर हम रघुबीर सहाय और 'शेखर' की बात करने लगे. चाय के बाद उस शाम मैं अपने कमरे देर से लौटा.
Thursday, September 10, 2015
Artists Residency Programme in village Chanka, Purnea, Bihar.
Girindranath Jha is a dynamic young man and quite passionate about his fields and crops. Earlier, he was a journalist with leading hindi news papers but left the urban life style and occupation for his love of farming, region and rural life. He now divides his time between Purnea and his village, Chanka which is located some 25 kms from the small town of Purnea. The residency will be located in the village Chanka.
He may be contacted at girindranath@gmail.com
Below is his write up posted on different social media plateform.
Saturday, August 15, 2015
तिरंगा, हरा रंग, चक दे इंडिया, तिजा तेरा रंग
https://www.youtube.com/watch?v=n36CAYMKOd4&sns=em
Monday, June 29, 2015
रीगल होटल, दरभंगा
जॉन नजारथ एक ऐसा ही नाम है. गोवा के जॉन नजारथ के हाथों में जादु था जो भी इनके हाथ का बना एक बार चख लेता इनका दीवाना हो जाता. बिहार के मुख्यमंत्री सच्चिदानंद सिंहा इस सूची में शामिल थे. जॉन इनके यहां प्रधान कुक हो गये. सच्चिदा बाबु के यहां दरभंगा महाराज का आना जाना रहता ही होगा और वहीं डिनर टेबुल पर किसी रात महाराज ने जॉन के खाने की तारीफ भी की हो और सच्चिदा बाबु से जॉन को दरभंगा के लिये मॉंग भी लिया हो. आखिर आलिशान यूरोपीयन गेस्ट हॉउस के लिये उन्हे एक योग्य कुक की तलाश भी तो थी ही. और, जॉन नजारथ महाराज के साथ दरभंगा आ गये, युरोपीयन गेस्ट हाउस.
समय गुजरा, महाराज भी गुजर गए. युरोपीयन गेस्ट हॉउस की हालात बदली और समय क्रम में अन्य धरोहरों के साथ यह गेस्ट हाउस भी युनिवर्सीटी का हिस्सा हो गया. जो हुनरमंद थे उन्होने बदलते समय और शहर का रुख किया. जो स्वाद महज महाराज, मुख्य मंत्री और युरोपीय मेहमानों तक सीमित था अब शहर का हिस्सा हुआ. जॉन ने उत्तर भारत के पहले लाइसेंसी पब की शुरुआत टावर चौक से सटे लालबाग में की. यहां उम्दा ड्रिंक के साथ लजीज खाना और छोटा सा बेकरी भी रक्खा जिसे जॉन और उनकी मेहनती एवं जुझारु पत्नी चलाया करते. नाम रक्खा 'रीगल'. इसके चिमनी से निकलने वाली खुश्बु को फैलते देर न लगी. लोग चोरी छुपे वहां ड्रिंक्स लेने जाते, नव मध्य वर्ग अपने दोस्तों या नव विवाहिता के साथ बहुत हिम्मत दिखाते हुए रीगल के कटलेट्स और मुर्गा या अंडा करी का लुतफ उठाने जाते. प्रगतिशील परिवार जो बाहर डिनर लेने की हद तक रैडिकल नहीं हो पाये थे, उन हमारे जैसे घरों में रीगल नर्म और ताजे पॉंव रोटी तथा मिट्टी की हांडियों में आने वाले अंडा कड़ी और लजीज मुर्गा के लिये जाना जाता. मुझे यदि कुछ याद है तो साइकल पर बैठकर सिढ़ियॉं चढ उस लाल ईंटो के मकान में जाना, पपरी उदरती उसकी दीवार. शाम में ब्रेड की ताजी खेप निकलती. वहां अंडा करी के और मुर्गा को मटके में भरे जाने में लगे समय तक का वो इंतजार जो माहौल के अनोखेपन के कारण खुशगवार हुआ करता. और घर आकर डाइनिंग टेबुल पर मटके के खुलते ही अंडाकरी की वो खुशवु. हो भी क्यों नहीं, आखिर उस मटके में नजारथ से लेकर गोवा तक के रिश्ते जो बसते थे. ऐसे रिश्ते जिसकी गर्माहट दरभंगा अघिक दिन समेटे सहेजे रख न सका.
Wednesday, November 19, 2014
Dharma Path: Laws and Law seers of India by Late Dr. Ushakar Jha
http://pothi.com/pothi/book/dr-ushakar-jha-dharma-path.
Saturday, August 30, 2014
प्रो. बिपन चन्द्र को एक ही बार सुनने का मौका मिला. मैं अपना याददास्त दुरुस्त करता हूँ...नहीं, दो बार. लेकिन दुसरे दफे कि स्मृति पता नहीं क्यों धूमिल है. बहरहाल, यह महत्वपूर्ण नहीं.
किशोरावस्था में जब से इतिहास से मोह हुआ (कुछ तो क्वीज प्रतियोगिता के कारण, कुछ अपने पिताजी के किताबों की आलमारी के कारण और कुछ बड़े भाई के प्रतियोगिता परीक्षा में इतिहास लेने के कारण उनके उत्साहित बात चित के कारण) तब से बिपन चन्द्र का नाम सुनता ही रहा. हाँ बहुत बाद में जाना कि नाम दरअसल बिपन चन्द्र है न कि बिपिन चन्द्र. यह नाम वैसे ही जेहन का हिस्सा था जैसे रोमिला थापर, डी. डी. कौसम्बी, राम शरण शर्मा, के. के दत्त (बिहार की पृष्ठिभूमि जो थी), ए.एल. बाशम, पर्सिवल स्पीयर, डी. एन. झा, टॉयनवी और एच जी. वेल्स. कुल मिलाकर ये नाम थे जिन्हें इतिहासकार के नाम से जानता था. बाद में नामों की लिस्ट बढती चली गयी और स्मृति के नामों में भीषण फेर बदल तो होना ही था. सुमित सरकार का नाम बहुत बाद में सुना. लेकिन जब से दिल्ली विश्वविद्यालय की परम्परा (यदि वास्तव में ऐसा कुछ है भी) का हिस्सा बना तो अपने को सुमित सरकार बनाम बिपन चन्द्र के प्रचलित नूरा कुश्ती में भी दोनों को आंकते हुए पाया. उन दिनों दो दल हुआ करते थे एक जो रोमिला थापर को महान इतिहासकार मानते और दूसरा जो राम शरण शर्मा को बेहतर. एक जो बिपन चन्द्र को सर्वश्रेष्ट और दुसरे जो सुमित सरकार को. बहरहाल, समय के साथ दोनों को पढ़ा और दोनों की अहमियत भी जानी.
इतिहासकारों या लेखकों को देखने का उनसे मिलने का उमंग पता नहीं क्यों पहले भी नहीं रहा और आज भी इसे बेहूदा ही मानता हूँ. लेकिन जिन्हें पढ़ा हो उन्हें सुनने का चाव था. तो, जब बी. ए. के दौरान एक दिन पता चला कि पास के हिन्दू कालेज में बिपन चन्द्र बोलने बाले हैं तो भला यह मौका कैसे छोड़ता. एक छोटे कद के ( यदि वे लम्बे थे तो मुझे माफ़ करें, पर मैंने उन्हें सभागार में जो देख था और जो छवि याद है उसमें वे छोटे ही थे कद में), सौम्य व्यक्तित्व. उन्हें हिन्दू कालेज फेसिलितेत कर रहा था. वे हिन्दू कालेज में प्राध्यापक थे. उन्होंने अपने प्रिय शिक्षकों के बारे में बातें की. कुल ढाई लोगों को वे शिक्षक मानते थे. उन्होंने नाम गिनाये जो मेरे लिए अनजान थे और मेरे स्मृति का हिस्सा नहीं बने. लेकिन जिस तरह से उन्होंने उन ढाई लोगों को सामने रखा वह काबिले तारीफ़ थी. ये ढाई लोग उनके इतिहासकार बनने में निर्णायक रहे थे.फिर उन्होंने कहा कि यदि आप इतिहासकार हैं, आप एक शिक्षक हैं तो आप अपनी किसी भी पसंदीदा हाबी को साथ साथ निभा भी सकते हैं. आप एक साथ इतिहासकार, शिक्षक, कवि, खिलाड़ी, सब कुछ हो सकते हैं. साथ साथ गिटार भी बजा सकते हैं और संगीत के शौक को भी तरजीह दे सकते हैं. इतिहास और शिक्षण आपको इसकी जमीन और समय मुहैय्या कराता है. यह उन्होंने अपने इन्ही ढाई शिक्षकों में से एक से सिखा था. यह बात मेरे जेहन में बनी रही.
Thursday, June 05, 2014
सन्यासी शब्द
कुछ मुख्तसर से,कुछ अपने वजूद को ढूंढते फिरते... कुछ यूँ ही आवारगी करते... उनमें से कईयों ने कहा क्यों कहते हो क्यों मुझे अपने से जुदा करते हो? कैसा लगता है जब तुम मुझे तलाशते हो अपने कहने के लिए
फिर जब इतनी जद्दो जहद के बाद मैं तुम्हे मिल जाता हूँ तो क्या तनिक भी नहीं सोचते कलम से श्याही से की-बोर्ड से पन्नो पर, स्क्रीन पर, ब्लॉग पर उकेरते हुए? क्या यह नहीं लगता कि मैं तुम्हारे जेहन से एक बार निकल जाने के बाद फिर तुम्हारा नहीं रह जाऊँगा? फिर से तुम्हे अगली बार उतनी ही या शायद उससे भी अधिक मेहनत करना परे... फिर से मैं नखरे दिखाऊं और यह भी तो हो सकता है की मैं खो जाऊं दुनिया के भीड़ में... यदि भविष्य ऐसा भी हो सकता है तो फिर लिख डालने का या आत्म विश्वास कैसा? कहीं तुम यह तो नहीं सोचते की शब्द की नियति लिखे जाने से ही है? इस भुलावे में मत रहना...
सन्यासी शब्द कब आओगे मेरी दुनिया में,
खड़े रहोगे वहीँ कच्चे रास्ते पर, शहर से दूर
या फिर
बस्ती में भरे बाजार इतराते फिरोगे...
movie: Mastram
--
Associate Professor,
Centre for Social Studies.
Vir Narmad South Gujarat University Campus. Udhna-Magdalla Road.
Surat.395007 Gujarat. India.
blog: mamuliram.blogspot.com
http://www.css.ac.in/sadan_jha.html
For the Sake of a Single Poem by Rainer Maria Rilke
For the sake of a Single Poem
—Rainer Maria Rilke, from The Notebooks of Malte Laurids Brigge in The Selected Poetry of Rainer Maria Rilke, edited and translated by Stephen Mitchell (Vintage International, 1989)
अप्रत्यक्ष के लिए
प्रत्यक्ष को अनदेखा कर
अप्रत्यक्ष को संवारने चले हैं
इस जन्म का पता नहीं
आत्मालाप
http://kavita-aatmalaap-anupamajha.blogspot.in/2014/02/blog-post.html?spref=fb
Thursday, August 30, 2012
Friday, May 25, 2012
"Why is she wearing blue?"
"Ahhh, may be she's going to meet her boyfriend. Blue is the colour of love. You see blue, it has its own smell, it even has a sound! It can be cool or hot--just like Love." from "Indigo: In Search of the Colour that Seduced the World" by Catherine McKinley
...a seductive reading in the spirit of its title.
"It's a saying. You see, the thing you desire with all your heart---well, don't rush for it. Don't force. You will likely find that it is not the very thing you are looking for." (from the same book).
Wednesday, May 23, 2012
आज भी फेसबुक पर उसने लाईक बटन नहीं दबाया. अब तो उम्मीद भी छुट गयी. यह सोचते जैसे ही दरभंगा के राम चौक पर छज्जू हलवाई के दूकान पर गरमा गरम सिंघारे और इमरती के दोने से अपनी आँख उठाई कि ठीक सामने उसकी वही आंखें थी. बातूनी नजर, दोष देती, झगडा करती, नोक झोंक से लब डब, अशांत, अबूझ, अनंत और अद्भुत.दुनिया की सारी मासूमियत को समेटे. बगल के पान के दूकान पर भांग के गोलों से भरी स्टील की चमचमाती ट्रे के साथ रखे रेडियो पर 'गाम घर' में खुरखुर भाई की आवाज खनक रही थी " एं येई चानो दाई हमरा ई कहू जे अहाँ कहियो फेसबुक ईमेल देखलियई की अखैन तक गोईठे पैथ रहल छी". चानो दाई छुटिते ठाई पर ठाई दग्लीह: "अहाँ के की लागैयेह जे इन्टरनेट खाली पुरुख'क बपौती छियैक. हम त ट्विटर आ माइक्रो- ब्लॉग्गिंग सेहो करैत छी, फेसबुक आ ईमेल त आब तनकपुर वाली सेहो करैत छथि. हँ..." मुहँ में फंसे सिंघारा को किसी तरह गले के अन्दर ठूंसते आँखों ने बस यही पूछा--लेकिन क्यों तुमने अचानक यह सिलसिला क्यों बंद, क्या मजबूरी, एक बार कह कर तो... उसके ओंठ हिले, "मेरा सारा का सारा एकाउंट हेक हो गया है. आई कांट एक्सेस एनी थिंग".
( रवीश और गिरीन्द्र से प्रेरित)
Tuesday, May 15, 2012
राजनैतिक कार्टून लोकतंत्र की एक कविता है
यह छवि भ्रामक है या सत्य यह मेरे ज्ञान के बाहर कि बात है. लेकिन यह छवि मन मोहक है, मध्य वर्ग के लिए, भद्र लोक के लिए. और, यही सरकार के लिए, लीडरानो के लिए इक्छित भी है. उनके सहूलियत के लिए, सरकार चलाने कि सहूलियतों के लिए. व्यंग इसमें मारक साबित होता है.
यह दो-धारी तलवार नहीं है. यह कुछ ऐसा अनाम हथियार है जो अलग अलग दिशाओं में आघात करता है. इसके अर्थ अक्सर ही दिशा हीन हुए बिना ही अनेक तरफ से मार करते हैं. व्यंग कि मार बहुत घातक होती है. कई दफे तो बे-आवाज होती है. शायद यह कारण भी व्यंग जातियों पर नियंत्रण रखने का एक पुराना और असरदार तरीका रहा है भारत में. अनेकों निचली जातियों और सामजिक पायदान पर नीचे के वर्गों के लिए तरह तरह के जातीय पहेलियाँ और दोहे रहे हैं जिनमें उन्हें नीचा दिखाया जाता रहा है, व्यंग के माध्यम से. यहाँ उनपर विस्तार से जाना अवांछित होगा लेकिन जो इतिहास जानते हैं और भारत में जातियों पर हुए काम से, लोक मुहावरों से जुड़े दस्तावेजों से वाकीफ हैं उनके लिए यह कोइ नयी बात नहीं. व्यंग में सामजिक वर्ग को मुर्ख के रूप में, हंसी के पात्र कि भूमिका में दिखाए जाने का रिवाज आज भी जम कर प्रचालन में है. आधुनिकता और नगरीकरण के दौर में इनमें से अधिकतर माइग्रेंट समुदायों पर होता है सरदार के उपर, बिहारी के ऊपर. शहर में गाँव से आये हुए के ऊपर और गाँव में शहर से आये हुए लाट साहब के ऊपर.
भारतीय समाज में व्यंग कि राजनीति को समझने के लिए यह सामाजिक पृष्ठभूमि मानीखेज हो जाता है. बिना इस ओर गौर किये हम दलितों के उस बिरोध को नहीं समझ सकते हैं जिसके कारण सरकार को यह एलान करना पडा कि वह एन सी ई आर टी पाठ्य पुस्तक से शंकर के बनाए एक ख़ास कार्टून को हटा दे. इसी सामाजीक पृष्ठभूमि के कारण मैं उनसे भी सहमत नहीं जो इस पुरे प्रकरण को चुनावी राजनीति और संख्याओं के जोड़-तोड़ का हिस्सा भर देखते हैं जहां दलित महज संख्या भर हैं और कांग्रेस का मायावती के रुख पर प्रतिक्रया देना चुनावी गणित भर.
राजनीति के दाँव-पेंच और पार्लियामेंट में सत्ता पक्ष के जबाव के पीछे झांकती लाचारगी और दलित समाज को खुश करने के सच्चे इरादे जैसे तर्कों से बाहर निकलने में व्यंग का यह सामजिक पक्ष हमे मदद करता है. यह हमे उस तरफ ले जाता है जहां से हम देख सकते हैं कि दलित जो सदैब ही उपेक्छित रहे हैं उन्हें अपने सबसे बड़े नेता का कार्टून में परिवर्तन क्यों कर नागवार गुजरा.
लेकिन सवाल महज इस एकलौती घटना का नहीं है. सवाल यह भी नहीं कि शंकर के उक्त कार्टून का अर्थ वही है या नहीं जिसे २०१२ में दलित बिचारक या राजनेता लगा रहे हैं. आखिर कौन तय करेगा कि कार्टून का अर्थ क्या हो? एक बड़े प्रख्यात विश्लेषक ने चित्र को देखते हुए सवाल किया था कि 'चित्र क्या चाहती है?' तो यह कौन कहेगा कि फलां कार्टून क्या चाहता है? यदि इस सवाल को अनंत काल तक टाल भी दें तो भी यह तो दिखता ही है कि हाल कि यह घटना कोई असम्पृक्त उदहारण तो है नहीं. कुछ ही दिन पहले ममता बनर्जी इसी तरह आहत हुई थी और एक प्रोफेस्सर के बिरुद्ध कार्रवाही कि खबर मीडिया में विचरती रही. उससे थोड़े पहले कि बात है जब नरेन्द्र मोदी के कार्टून के कारण एक और कार्टूनिस्ट को मुश्किलों का सामना करना पडा था. यदि चंद बरस पीछे जाएँ तो मोहम्मद साहेब के कार्टून के कारण बहुत बबाल खडा हुआ था. ये सभी अलहदा से लगने वाले राजनैतिक चौखटों से आने वाले प्रकरण हैं. यदि कुछ जोड़ता है तो वह है कार्टून के प्रति बढती असहिष्णुता.
यह आज के समय में राजनीति के प्रकृति कि तरफ भी हमे ले जाता है जहां पवित्रता के नए मानक गढ़े जा रहे हैं. जहां एक ओर आज गणेश और बाल हनुमान अपने अनगिनत कार्टून छवियों में बच्चों के दोस्त बन चुके हैं वहीं एक भी राजनैतिक का हमारे जीबन से मनो-विनोद का नाता नहीं है. चाचा नेहरु भी तो बहुत अरसे से बच्चों के चाचा नहीं रहे. राजनीति में पवित्रता को लेकर एक भय का माहौल है, एक किस्म कि कमजोरी जाहिर करता या फिर उन्माद का रवैया. यह सहज तो बिलकुल ही नहीं. अबोध होने का तो खैर सवाल ही नहीं उठता.
एक समाज विज्ञानी ने कहा है कि हम ऐसे समय में रह रहे हैं जिसे समाज विज्ञानं का 'पिक्टोरिअल टर्न' कहा जा सकता है. हमारे दैनिक जीवन में दृश्य की, चित्र की भागेदारी असीम रूप से बढ़ चुकी है और इसी सन्दर्भ में उन्होंने समाज विज्ञान के समकालीन रुझान कि ओर हमारा ध्यान दिलाया. यहाँ गौर तलब हो कि सत्तर का दशक समाज विज्ञानं के भाषी रुझान के लिए जाना जाता है.
खैर जो भी हो, एक बात तो यह साफ़ उभर कर आती है कि दृश्य के संभाव्य को लेकर हमारे विद्वान् इतने लापरवाह क्यों कर हो गए. या फिर इस संभाव्य को महज बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया है. लेकिन यहाँ यह ध्यान रखना होगा कि व्यंग और कार्टून हमेशा ही अर्थों के बाहुल्य से परिभाषित होता है. तो ऐसे में इस बाहुल्यता का कोई कितने हद तक अंदाज लगा सकता है. राज्य और सरकार के लिए यह एक दुसरे तरह कि चुनौतियां लाता है. विद्वानों ने बताया है कि आधुनिक राज्य और विज्ञान दोनों एक दुसरे पर निर्भर होते हैं. दोनों के लिए जानकारियों की, ज्ञान की, अर्थों की साफगोई, एकरूपता, सर्व-भौमिकता और परि गुनन्ता ( क्वान्तिफिकेसन) जरूरी है. इसके बिना आधुनिक प्रशासन, राज्य-निति नहीं चल सकती. तो ऐसे में जब कार्टून वांग का ऐसा रूप लेकर आता है जिसको नियंत्रित नहीं किया जा सके तो जाहिर है वह सत्ता को विचलित तो करेगा ही. दृश्य के जादू से पूरी तरह अवगत इस वर्ग के लिये कार्टून व्यंग और चित्र का ऐसा अनोखा नुकशा बनकर आता है जिसका इलाज उन्हें एक मात्र सेन्सर शिप और कार्टूनकारों पर डंडे बरसाने में नजर आता है. वे यह नहीं समझते कि राजनैतिक कार्टून लोकतंत्र की एक कविता है. जिसतरह कविता में अनुभव का वह हिस्सा भी शेष रह जाता है जिसे विज्ञानं छटपटाते रह जाने के बाबजूद भी ज्ञान में प्रवर्तित नहीं कर पाता. उसी तरह कार्टून वह चित्र है जहां व्यंग को सत्ता और सरकार भिन्नता की (डिसेंट की) जानकारी के रूप में सरलीकृत नहीं कर सकते. यह गवर्नेंस के तर्कों से परे जाता है. अपने अर्थों के बाहुलता में अपने डिसेंट के धार दार औजार के कारण लोकतंत्र के समृद्धि कि पहचान है कार्टून.


