Friday, October 30, 2015

दरभंगा, मैथिली और हिंदी: सफर की शुरुआत

मेरा जन्म बिहार के मधुबनी जिला के एक गॉंव सरिसब पाही में हुआ लेकिन बचपन दरभंगा में बीता. उन दिनों दरभंगा मेरे लिये शहर था.  बहुत बाद में जब अपने उस शहर से दूर जाता गया और जब वह सपने में धीरे धीरे अधिकाधिक आने लगा तो उस दरभंगा के लिये  एक छोटे से शहर की अभिव्यक्ति दिमाग में घर कर गयी. पिता प्रोफेसर हुआ करते थे और घर में खुब सारी किताबें हुआ करती थी. अंग्रेजी की दो अखबारें आया करती: एक पटना से प्रकाशित और दूसरी दिल्ली से एक दिन की देरी से आने बाला टाइम्स ऑफ इंडिया. पत्रिका में इलस्ट्रेटेड विकली आया करता और साथ में रिडर्स डायजेस्ट. हिंदी साहित्य की किताबें पिताजी के उस घर में नहीं हुआ करती, मैथिली की उपस्थिती भी छापे की अक्षरों के रूप में होने का याद नहीं ही आता है.लेकिन घर में मैथिली के अतिरिक्त और कोई दूसरी भाषा बोली नहीं जाती.उस लड़कपन के दौर में हिंदी बोलने को  उसी कदर अभिजात्यता की अभिव्यक्ति समझा जाता जैसे बाद के मेरे किशोरवय में अंग्रेजी बोलने को.
घर से भाई बहन स्कूल जाया करते थे. मैं सबसे छोटा था और स्कूल जाने को किसी विशेषाधिकार की मानिंद मानता था. जिद बढ़ने लगी तो बहन अपने साथ मुझे भी स्कूल ले जाने को तैयार हो गयी. अगली जनवरी में मेरे भी विधीवत दाखिले की बात हो गयी. तब तक धाख छुड़ाने के लिये मुझे भेजा जाने लगा. मैं उत्साह से नयी दुनिया जाता,लड़कों के बैंचों की कतार में सबसे पीछे के खाली बैंच पर चुपचाप बैठे टुकुड़ टुकुड़ समय गुजारा करता. घर आकर ढ़ेर सी कहानियां हुआ करती, सबको पड़ेसान करने के लिये. एक हसीन कहानी तो साथ रही अब तलक, उन दिनों की खुबसूरत याद के साथ. पर, उसकी खुबसूरती लिखने की इजाजत नहीं देती. फिर कभी.
पांच साल से तीन महीने पहले प्रेपरेटरी बी में मेरा दाखिला हो गया. पब्लिक स्कूल में. एक ही पब्लिक स्कूल थे शहर में उन दिनों. लहेरिया सराय में 'बड़े घरों के बच्चों' के लिये एक अंग्रेजी स्कूल जरूर था. बाद में जब पब्लिक स्कूलों की संख्या बढ़ी और हमारे स्कूल की एक और शाखा शहर से कुछ दूर बसते नये मोहल्ले बेला में खुली तो हमारे स्कूल को पब्लिक स्कूल, लालबाग या पानी टंकी की पहचान से भी नवाजा गया. पर, वह बाद की बात है.
अभी तो स्कूल में दाखिला से पहले घर में चर्चा का एक कोना यह भी था कि स्कूल में मैथिली से काम नहीं चलेगा. वहां केवल और केवल हिंदी ही बोलना होगा नहीं तो नाम काट दिया जायेगा. .
स्कूल जाने लगा और हिंदी कैसे बोलने लगा यह स्मृति का अंग कभी नहीं बन पाया. इतना तो याद है कि मैथिली से हिंदी बोलने के सफर में किसी मुश्किलात का कभी सामना नहीं करना पड़ा. यह स्वत: ही होगया. वैसे जहां तक हिंदी भाषा लिखने और सीखने की बात है तो वहां कई गतिरोध रहे हैं. आज भी मुझे पूरा अहसास है कि मुझे लिखना नहीं आता. वर्तनी और व्याकरण तो खैर माशा अल्लाह! ह्रस्व इ और दीर्घ ई , उ और ऊ, स्त्रीलिंग और पुलिंग सभी विभाग मेरे लिये युद्ध के मैदान ही अब तक हैं और मैं शुरू से एक थके हारे सिपाही की तरह ही इस मैदान पर रहा. अब भी स्थिती कुछ बदली नहीं. हमेशा ही साहित्य के पर्चे में अंक बहुत कम आये. जब दिल्ली आया और कुछेक अभिजात्यों के साथ काम करने लगा तो वो मेरे श के स कहने का बहुत माखौल भी उड़ाया करते.
खैर, वो मेरी जिंदगी के बहुत शुरूआती दिन थे..  उन दिनों मेरे लिये मैथिली घर परिवार की, दुकान और सड़क की भाषा थी, अंग्रेजी सूचना और ग्यान विग्यान की, और हिंदी शिक्षा एवं स्कूल की भाषा हुआ करती. अभी मेरे लिये एस सी बेदी के साल लपेटे फोटो की मनोज पाकेट बुक्स और बेताल, मैंनड्रेक, बहादुर और फ्लैस गौर्डन जैसे नायकों के इंद्रजाल कॉमिक्स की दुनिया का सफर शेष था...हां,संभव है कि पराग, नंदन, लोटपोट और चंदा मामा बहुत दूर नहीं रहे हों. बहुत बाद, जब थोड़ा बड़ा हो गया तो एक दिन मैने पिताजी से पुछा: हमलोग भी तो मिडिल क्लास ही हुए न?  उन्होनें बहुत स्थिर स्वर में कहा, नहीं लोअर मिडिल क्लास.

Wednesday, October 21, 2015

दरभंगा, भारती भवन और स्टेंडिंग क्लब

भारती भवन हमारे स्कूल से घर वापसी के रास्ते में आता था. यह कभी घर से स्कूल जाने के रास्ते पर नहीं मिला मुझे. हम तब बहुत छोटे रहे होंगे. मैं पब्लिक स्कूल, लालबाग में पढ़ा करता था और पिताजी सी एम कॉलेज में पढ़ाया करते थे. भारती भवन, जो किताबों की दुकान हुआ करती थी, पिताजी और उनके दोस्तों के लिये बहस मुबाहिसों की जगह थी, उन दिनों. दरभंगा के टावर चौक पर जिसे बाद में अरविंद मार्केट के नाम से जाना जाने लगा उसी के एक कोने में दिन भर सुस्त सा सोये रहने वाला एक हॉल नुमा दुकान जिसके दो हिस्से कर दिये गये थे. दाखिल होते ही सामने का बड़ा हिस्सा जिसमें किताबें और कुल दो कार्यरत स्टाफों के बैठने की जगहें थी. भीतर मैनेजर का ऑफिस, पॉल साहेब का कमरा जिसमें पिताजी लोगों की बैठकी लगती. लोगों की संख्या के हिसाब से और उनकी बातचीत के डेसीबल लेबल की अनुपात में जगह छोटा था. पर, बहसों और बैचारिकी के लिये यहां पूरा आकाश हुआ करता, ऐसा उन दिनों भी मेरा मन कहता था और यही अब भी उन बहसों के प्रति मेरी अवधारना है. उन्हीं दिनों उनके बैचारिकी का दूसरा अड्डा टॉवर पर ही सड़क की दूसरी तरफ गली के मुहाने पर की चॉय की दुकान भी हुआ करती थी. लाल रंग की लेमन टी, लंबी लीफ पत्तियों बाली. वहां खड़े होकर बातों का दौर चला करता और नाम पड़ा स्टेंडिंग क्लब.बहुत सालों बाद जब हैवरमॉस का पब्लिक स्फियर पढ़ा उसके कॉफी हॉउस और सेलों के बारे में जाना तो लगा कि यह किताब की दुकान और लाल चाय की दुकान का स्टेंडिंग क्लब बौद्धिक सार्वभौमिक ईतिहास का कितना अंग रहे, उससे कितने दूर रहे.
हम भाई बहन यदा कदा स्कूल से लौटते हुए इसी भारती भवन में पिताजी से मिलने पहंुच जाया करते. उन्होने कभी हमसे अचानक आने का अभिष्ट नहीं पुछा, न ही हमने कभी कुछ मांग रखी. हमेशा हमारे आने पर बिना कुछ पुछे कहे शिवशंकर को याद किया जाता और हम उसी अरविंद मार्केट के और भीतर दरभंगा के उन दिनों के सबसे बेहतरीन रेस्टोरेंट में रसगुल्ले या फिर सिंघारा या वहां की मशहूर दही कचौड़ी की लुत्फ उठाने चल पड़ते.
आज Vidyanand Jha ने भारती भवन का जिक्र कर मन को उसा वैचारिक आकाश की तरफ मोड़ दिया, सच में कितनी जरूरत आज है हमे ऐसे स्टैंडिंग क्लबों की.

Tuesday, October 20, 2015

Review: Redmi 2 Prime 16 GB


I purchased a Redmi 2 Prime 16 GB last month. It was smoothly delivered by Snapdeal with a bill dated 19th of September 2015 ( IMEI No 867935020560040). However, soon I realised that the internet function was not working on the phone. It was, however, working on wifi. I thought this must be either a fault with the sim card or service provider's fault. I contacted my service provider for the mobile data and spent long hour at the shop. The technician said this might be due to outdated software installed in the phone and i should contact the RedMi 2 service center for updating software. On 17th October 2015, i went to the local Red Mi service centre at Surat. After a long and arduous wait for about an hour, my  token number blinked on the digital screen and i was at the counter explaining my problem. the mobile was handed over to the tecnician who declared software issue. Receipt was handed back to me with a request to come back and collect the mobile later. My second trip to the service centre was yesterday (19-10-2015) to collect the phone. The scene at the data centre was pathetic (with net down and customers yelling). we were asked to wait. The wait prolonged. Finally with a lot of request the mobile was handed back to us. After reaching home, we found the problem was not solved. No internet in the phone, no browser opening, no google play store. Basically net function was not working. Today, again went back to the service centre. Again spent more than one and half hours ( 10.00 AM to 111.30 AM) and finally they said the phone will have to be deposited for some motherboard issue. Now, i suppose another one month wait. The experience has been horrible.

Monday, October 12, 2015

मिनाक्षी और जे की हरी भरी कला

मिनाक्षी और जे की हरी भरी कला दुनियॉं

मिनाक्षी जे एक कलाकार हैं और जे सुशील
उनके पति पेशे से पत्रकार. इस दम्पति से मेरा परिचय फेसबूक के माध्यम से ही हुआ जब ये दोनो बिहार और झाड़खंड के अंदरूनी ईलाकों में अपनी फटफटिया पर सबार एक अनोखी यात्रा पर थे. इस बात के छह आठ महिने तो हो गये होंगे. ये दोनो प्राणी गॉव, देहात, कस्बा जहां भी जाते किसी के घर रूकते और वहां केस्कूल, पुलिस स्टेशन, संथाल टोले, जैसे गैर व्यक्तिगत जगहों पर किसी दीवाल को चुन कर वहीं के लोगों की मदद से पेंटिग किया करते. फिर, इस अनुठे अनुभव को इसके फोटू को अपने ब्लाग आर्टोलॉग पर और फेसबूक जैसे माध्यम से इंटरनेट पर शेयर करते. इन सुंदर चित्रों को इनके मेजवान भी फेसबूक आदि पर चिपकाते. और रंग बिरंगी दिवारों की दुनियॉं हमारे सामने तैरने लगी. ये उन्हीं दिनों की बात है जब क्या देश और क्या बिदेश, क्या सोशल मीडिया क्या मेन स्ट्रीम मीडिया हर जगह एक दूसरी किस्म का बिहारी दीवाल चक्कर लगा रहा था, लोगों की जुबान पर चढ़ा अस्मिता की राजनीति एवं पिछड़ेपन की छौंक लगा रहा था. वह दीवार बिहार राज्य के किसी स्कूल के परीक्षा भवन की थी जिसपर परिजन जद्दोजहद के साथ लटके हमें शिक्षा प्रणाली के खोखलेपन से रूबरू करा रहे थे. वह दीवार भले ही बिहार के किसी जगह की रही हो पर मीडिया में तैरते ये अक्स शिक्षा प्रणाली की बदहाली, इस बाबत हमारे अविश्वास और इसे सवभर्ट करने की सार्वभौमिक इक्छा के वाहक के रूप में तैर रहे थे. साइकोलॉजी में एक शव्द है प्रोजेक्शन. लोग अपनी दमित इक्छाओं के अक्स के रूप में बाह्य हकीकत को रूपांतरित कर संसार को आंकते है.
खैर, तो उन्हीं दिनों मिनाक्षी और जे की सुंदर तथा अंतर्दृष्टि से भरी दीवारों से मेरा परिचय हुआ था, इसी आभासी दुनिया में.
इनके कला के सौंदर्यबोध की बात मैं यहां नहीं करूंगा पर दो बातें खास तौर पर ध्यान खिंचती है. पहला तो इसका सझिया स्वरूप जो मूलत: और अपनी समग्रता में गैर-व्यक्तिगत है. अंग्रेजी का सहारा लेकर कहें तो पार्टिसीपेटरी एंड पब्लिक आर्ट. ऐसी बात नहीं कि इस कला की अपनी परंपरा नहीं रही है या इसका आकाश नहीं हो. पर, भारत में इसकी बानगी देखने में नहीं मिलती. यहां गैर व्यक्तिगत कला को या तो लोक कला के रूप में हम चर्चा करते हैं या फिर, किसी बड़े सामाजिक संकट बाली घटना के समय किये गये राजनीति प्रेरित कला की अभिव्यक्ति के तौर पर. यदि हम अपनी दृष्टि को थोड़ा विस्तार देने की जहमत उठायें तो सड़क पर दिखाई देती साईनबोर्ड, सिनेमा के पोस्टर, विग्यापन और मजदूरों के बच्चों के हाथों कभी पेंसिल से , कभी सूर्खी से, कभी ईंट से या कभी चॉक से बनायी आड़ी तिरछी रेखाओं में कला का गैर व्यक्तिगत चेहरा देख लेते हैं. पर, मिनाक्षी और जे के प्रयोग इनसे परे जाते हैं. यह लोक कला तो नहीं है पर भागेदारी के स्तर पर सझिया है, लोक तांत्रिक है.  यह सिनेमा का पोस्टर नहीं  पर पब्लिक आर्ट है. राजनीतिक घटना के चौखटे में बंधा हुआ तो नहीं पर हमारी स्थापित मान्यताओं और समझ के साथ सीधे सीधे साक्षातकार करता उसे झंकझोड़ने को मुखातिब जरूर है. इस रूप में स्थापित दावों को तोड़ता नये प्रतिदावों को आकार देती कला.
दूसरी खास बात है इस कला का धरातल. कलाकार दम्पत्ति दिल्ली बासी हैं पर,  अपनी जमात के कलाकारों और पब्लिक आर्ट् के प्रेक्टिसनर्स से भिन्न इनके कला का संदर्भ और जमीन महानगरीय समाज और उसकी अभिजात्यता में सिमटा हुआ नहीं है. यहां गॉव देहात, कस्बे और छोटे शहर सब बसते हैं. यहां इन समाजों और  इनकी समकालीनता महज चित्रों में ही नहीं है यहां शब्द और चित्र दोनों हैं. अनुभव और रंग, आप और हम, लकीर और फकीर, आज और कल.सब एक दूसरे से मिले, हर एक अपने वजूद के साथ सांस लेता.
यदि आप दिल्ली या इसके आसपास हैं तो आज कल इस दम्पत्ति के साथ इनके कला यात्रा में भागेदारी कर सकते हैं, लोधी रोड स्थित इंडिया हैबीटेट सेंटर में जहां इनकी अनोखी कला प्रदर्शिनी अक्टूबर भर चलेगी, आपकी शिरकत के लिये. मैंने फेसबूक पर बहुतेरे परिजनो और उनके बच्चों को चहकते देखा है.

Thursday, September 24, 2015

उन्हीं दिनों की बात है जब गर्मियों की छुट्टी में, दुर्गा पुजा में और दिसंबर मे वार्षिक परीक्षा के बाद हम लोग दरभंगा से अपने गाम जाया करते. महज 29-30 किलोमीटर की यात्रा. भीड़ भरे बस, 1753, 2153... और एसी ही अनेकों 53 प्रत्यय वाली लाल मुंह की बसें. वहां गर्मी में सुबह अंघेरे आम तुड़बाने जाया करते, दलान में सोते, छोटी छोटी कपों में चाय पीया करते वह भी भोर होने से पहले. यहां यह जोड़ देना जरुरी है कि दरभंगा डेरा पर मां का चाय पर पहड़ा हुआ करता और हम बच्चों को चाय नहीं मिलता. पर गाम में मेरे पितामह, हमारे बबा का दलान मॉ की पहुंच से बहुत दुर हुआ करता. जब तक सुर्योदय होता हम लोग गाछी से लौट भी रहे होते. फिर आम का पाल लगाया जाता, घूप लगाया जाता और छंटनी होती. मोहनजी भाईजी के नेतृत्व में, बांकी सब उनके अस्सिटेंट हुआ करते. अबतक, मॉ की तरफ से तैयार होने का और जलखई करलेने का दबाब बढ़ने लगता और हम सब घर के ही छोटे पोखर का रूख कर रहे होते. पूरा दिन खेल, शोर शरावा. दिन भर इधर से उधर बौआना, कभी मोछ की चटनी तो कभी कच्चे आम का झक्का. मौलवी सहाब की दुकान से बंसी और तरैला लाना और बुढ़िया कब्बडी का खेल. लेकिन यह सब तो गाम पहुंचने के कुछ देर बाद या फिर अगले दिन शुरु होता. गाम में बस रुकते ही गोसौन को गोड़ लगने और बड़ों का आशिर्वाद लेने के ठीक बाद या शायद उससे भी पहले सबसे पहले भाग कर छत पर चढ़ जाते. पहली मंजिल पर एक खाली चौकोर कमरा महज एक चारपायी निवासी. अंगूर की बेलें और खट्टी खट्टी लेकिन बेहद रसीली गहरे रंग की अंगूर. पर मंजिल तो अभी आगे हुआ करता, उस एकाकी छत वाले कमरे के छत पर जाना. लकड़ी की एक सुरूची पूर्ण सीढी हुआ करती और हम उसे चढ़ ऊपर सबसे ऊंचे छत पर चढ़ जाते. जालीदार खुबसुरत रेलिंग की सुरक्षा में सामने पूरा पसरा हुआ पूब. बाल मन में किसी का कहा बात घर कर चुका था कि साफ आसमान में हमारे गाम के उस छत से हिमालय की वर्फ भरी चोटियॉं दिखती थी. दूर तक पसरे पूब और ऊत्तर की कोण में मैं कभी यह तय नहीं कर पाता कि जो दख रहा होता वह उजले नीले वादल हुआ करते या सचमुच हमारी किस्मत हमारी साथ दे रही होती और हिमालय ही के दर्शन हो रहे होते. सत्य को किसने देखा. विग्यान जिसने इस सत्य को देख लेने का दावा किया, उन दिनों मुझसे तो दूर ही था. हिमालय पहाड़ या उजले नीले वादल तुम जो भी थे मुझे पसंद थे. एक उत्तर बिहार में पलने बाले मन में तुमने हिम आच्छादित पहाड़ देखने की ललक को जगाये रखा.

Wednesday, September 16, 2015

हॉफ सेट चाय: लाइब्रेरी स्पेशल और तीन मुर्ती


यह उन दिनों की बात है जब लाइब्रेरी स्पेशल चला करता था. दिल्ली विश्वविद्यालय से दोपहर बाद खुलता था और सभी प्रमुख लाइब्रेरी एवं आर्काइब भी जाया करता. इसी लाइब्रेरी
स्पेशल में पहले पहल देखा किया उसे. डी स्कूल के स्टाप पर बस में आयी वह. गहरे कत्थई दुपट्टे और बहुत हल्के क्रीम कलर की सूती सूट. सूट का रंग कुछ यूं कि किसी बहुत बड़े दुध के थार में एक चुटकी भर चंपई मिला दिया गया हो.
ये मेरा उस बस में पहला दिन था. ये मेरा तीन मुर्ती का भी पहला दिन था. अब तक यह सोचा करता हूं कि यह महज संयोग तो न था कि तीन मुर्ती के गेट पर उतरने बाले उस दिन महज हम दोनों ही थे. पहल उसने ही की थी, शायद तकाजे के लिये ही. एक बेहद संतुलित मुस्कान के साथ जो उस खाली बर्तन की तरह जिसमें चाहे आप जितनी कल्पना, जितने सपने भर दें, वह कभी लवरेज नहीं हो.एक ऐसी ही आत्मीय मुस्कान. तीन मुर्ती के विशालकाय एतिहासिकता की ताकीद कराता गेट, उसके अंदर जतन से संवारा गया उतना ही विशाल लॉन और उसके पीछे, नजर के दूसरे छोड़ पर एक भब्य इमारत. नेहरू जी का घर.
मैं मुस्कान को जेहन में लपेटे अपनी संकुचाहट के साथ उसके पीछे हो लिया. मुझे ठीक ठीक याद है वह उस दिन चॉंद का फांसी अंक देख रही थी, पहले फ्लोर पर माइक्रोफिल्म रीडर पर. मैं चुपचाप उत्सुकता से उसे देख आया था. यह कहना मुश्किल कि मैं लाइब्रेरी से रुबरु हो रहा था या फिर यह जानने कि वह क्या कर रही है. यह भी ठीक ठीक नहीं कह सकता कि मैं किस बात से अधिक चमत्कृत था: माइक्रोफिल्म रीडर से या फिर चांद के फांसी अंक की वह तस्वीर जो उस रीडर के पटल पर उस पल अपने धुंधलके में चमक रही थी. यह सिलसिला चल पड़ा. मैं चुपके से देख आया करता कि वह क्या पढ़ रही है. और, धीरे धीरे उस पुस्तकालय के कोनों से लगाव वढ़ने लगा. मैन्युस्क्रीप्ट सैक्शन में जहां मुझे यह विश्वास था कि महज नेहरू और कांग्रेस के दस्तावेज होंगे वहां वह माखन लाल चतुर्वेदी के खतो किताबत में मशरूफ पायी जाती. माइक्रोफिल्म पर सावरकर और मुंजे की हस्तलिखित दस्तावेज में आंख डूबोए मिलती और, ब्रिटिश हुकुमत द्वारा बैन किये प्रतिवंधित साहित्य गदर की गूंज के गुरूमुखी को उतारते हुए भी मुझे वो याद है. ऐसा नहीं कि उसे मेरी चोरी का पता नहीं हो. उसने बहुत बाद में मुझे बताया था कि लड़कियों के पीठ पीछे भी दो आंखे हुआ करती हैं और फिर उसने एक बहुत आश्वस्त करने वाली भाव प्रकट की थी. कुट्टी के कैंटीन के बाहर अहाते में आटम ब्रेक के बाद वह पहला दिन था. हम एक दूसरे से अरसे बाद मिल रहे थे. उसने ही कैंटीन चल चाय पीने का प्रस्ताव रक्खा था. हवा में हल्की रेश्मी ठंडक आ गयी थी. हॉफ सेट चाय टेबल पर आ चुका था. चाय प्याले में उड़ेलते हुए उसने पुछा था कि मैं आजकल क्या पढ़ रहा हूं. फिर, यह भी कहा था कि अगले कुछ सप्ताह वह जेनयु की लाइब्रेरी में दिनमान के साठ के दशक की प्रतियां ओर मारवाड़ी लाइब्रेरी में कुछ समय बिताएगी. फिर हम रघुबीर सहाय और 'शेखर' की बात करने लगे. चाय के बाद उस शाम मैं अपने कमरे देर से लौटा.

Thursday, September 10, 2015

Artists Residency Programme in village Chanka, Purnea, Bihar.

Girindranath Jha is a farmer. Apart from farming, he is a prolific writer on social media and in hindi news papers. He plans to start a residency programme in his village, Chanka ( District Purnea, in the region of Kosi river, Bihar). Those interested in spending some quiet and quality time and pursue creative work, writing, research etc may find his invitation lucrative.
Girindranath Jha is a dynamic young man and quite passionate about his fields and crops. Earlier, he was a journalist with leading hindi news papers but left the urban life style and occupation for his love of farming, region and rural life. He now divides his time between Purnea and his village, Chanka which is located some 25 kms from the small town of Purnea. The residency will be located in the village Chanka.
He may be contacted at girindranath@gmail.com

Below is his write up posted on different social media plateform.
बहुत दिनों से इच्छा थी कि अपनी मन की एक बात यहां सार्वजनिक करूं। बात कहिये या फिर एक किसान की योजना। दरअसल मैं अपने गाँव चनका में एक रेसीडेन्सी प्रोग्राम शुरू करना चाहता हूँ। चनका एक गाँव है जो बिहार के पूर्णिया जिला में स्थित है।
रेसीडेन्सी प्रोग्राम बेहद सामान्य तरीके से आरम्भ करूंगा। जहां कला, साहित्य, पत्रकारिता और अन्य विषयों में रूचि रखने वाले लोग आएं और गाम-घर में वक्त गुजारें। गाँव को समझे-बूझें। खेत पथार, तलाब कुंआ...ग्राम्य गीत..आदि को नजदीक से देखें।
बाबूजी की स्मृति में यह रेसीडेन्सी आरम्भ करने का इरादा है। मेरे पिता वैसे तो एक किसान थे लेकिन  उन्होंने अपना जीवन किसानी के संग रेणु साहित्य और अंचल के लिए समर्पित किया, अब  मैं उनकी यादों के सहारे इस काम को आगे बढ़ाना चाहता हूँ।
इस सम्बन्ध में आपलोगों का सुझाव चाहिए, आखिर कैसे इस काम को आगे बढ़ाया जाए। मैंने 1000 किताबें जमा की है लाइब्रेरी के लिए। दो बेडरूम, एक किचन, डाइनिंग स्पेस , बाथरूम, बरामदा के साथ एक छोटा सा कॉटेज तैयार किया है, जिसे फाइनल टच देना बाँकी है।
पूर्णिया शहर से 25 किलोमीटर की दूरी पर चनका गाँव है। आप सबों से आग्रह है कि सुझाव दें ।
किसानी करते हुए एक नई शुरुआत करना चाहता हूँ। किसानी को इस तरह जीना चाहता हूँ , जिससे आने वाली नई पीढ़ी भी गाँव की तरफ मुड़े। किसानी को भी लोगबाग पेशा समझे। किसानी से लोगों का मोह भंग न हो।
आप सब कुछ सुझाव दें ताकि मैं काम को आगे बढ़ा सकूं।

Saturday, August 15, 2015

तिरंगा, हरा रंग, चक दे इंडिया, तिजा तेरा रंग


"तिजा तेरा रंग था मैं तो, जिया तेरे ढंग से मैं तो।
तुही था मौला तुही आन, मौला मेरे ले ले मेरी जान।।"

गाने हमारी जन चेतना के आधार स्तंभ हुआ करते हैं, कुछ उसी तरह जैसे प्रेस, जैसे पाठ्य पुस्तक, जैसे क्रिकेट, जैसे टेलिविज़न और जैसे पिछले कुछ वर्षों में फ़ेसबुक, ट्विटर और व्हाट्स अप। जयदीप साहनी के सीधे दिल को छनने बाले बोल, 2007 की फ़िल्म 'चक दे इंडिया' का यह गीत जिसे कृष्णा और सलीम मर्चेंट ने गाया और सलीम- सुलेमान की जोड़ी ने संगीत से नवाज़ा है  ऐसा ही एक गीत है। हमारी चेतना को ताक़ीद कराता, एक हूक है एक लंबी तान।
मैं तेरा तीसरा रंग था, मैंने तो अपनी ज़िंदगी तेरे ही साँचे में जिया...
इसे ऐसे भी तो पढ़ सकते हैं: तिरंगे, मैं तेरा ही रंग था...
अच्छे गाने, कविता या फिर पेंटिंग की यही ख़ासियत होती है। अर्थों की अधिकता। बोलों के बीच आपकी कल्पना को आकाश मिलता है। आपका मन बंध जाता। रस्सियाँ खुल जाती हैं। गिरह गाँठ ढीली।
हरा, हमारे तिरंगे का तीसरा रंग। धरती के ख़ुशहाली का आवरण, नवयुवतियों की धानी चुड़ियो की चमक, उल्लास का रंग, सुख और समृद्धि का रंग, पर्यावरण का रंग और पैग़म्बर मोहम्मद साहब के झंडे का पवित्र रंग। 
कबीर खान पैनल्टी स्ट्रोंग को गोल में तब्दील नही कर पाते और इंडिया पाकिस्तान से हाकी में हार जाता है। कबीर खान हीरो से ग़द्दार क़रार दे दिये जाते हैं। सिनेमा स्क्रीन पर हूक उठती है, मैं तो तुम्हारा ही रंग था, तुझसा ही तो ढाला मैंने अपने होने को। तुम्हें ही तो माना मैंने मौला, फिर ये कैसी ज़िल्लत? अब और क्या यह जान ही ले ले। यह जान भी तुम्हारी।
कबीर खान का दर्द एक समुदाय की आवाज़ अख़्तियार करता है, कानों में। एक बहुत ही भिन्न रूप में मर्सिया सा है यह गीत। वही मर्सिया जो एक ज़माने में 'मुस्लिम सोशल' का एक अहम हिस्सा हुआ करती थी। हरा, कबीर खान, मुसलमान समुदाय, समुदाय की पीड़ा। कौन सुने यह, किससे साझा करे यह दर्द? आख़िर तिरंगा ही तो उसका अपना है। वही तो साझेदार है, राज़दार है।
समुदाय और रंग का सीधा समीकरण हमारी राजनैतिक जन चेतना में प्रमुखता से रहा है।संविधान सभा और स्कूल के किताबों में तिरंगे के रंगों को सार्वभौमिक मुल्यों से ही नवाज़ा गया है लेकिन जन संस्कृति के अपने धरातल रहे हैं। और फिर यह समीकरण भी नया तो नहीं। 
महात्मा गांधी जब 1921 में पिंग्ली बेंकैया के चार साल के अथक प्रयास के बाद एक झंडे की अहमियत पर राज़ी हुये तो उनके मन में भी यह समीकरण स्पष्ट था। सबसे ऊपर सुफेद हिंदुस्तान के अल्प संख्यक समुदायों के लिए. उसके नीचे हरा मुसलमान समुदाय के लिये और सबसे नीचे  लाल हिंदु समुदाय के लिये। लेकिन इन सबके बाबजुद महात्मा के लिये झंडा तभी मुकम्मल हुआ जब लाला हंसराज ने बीच में चर्खे डालने का सुझाव दिया। बग़ैर चर्खे का झंडा, गांधी जी को मंज़ूर न था।
स्वराज झंडा, सुराज झंडा, गांधीजी का झंडा, राष्ट्रीय झंडा, कांग्रेस का झंडा, असहयोग का झंडा जितनी मुँह उतनी बातें। चर्खा और टोपी तो कुछ साल पहले से आ ही गये थे लेकिन झंडा ने आते ही जनता के बीच अपनी ख़ास जगह बना ली। तभी तो कुछ ही समय में  पहले जबलपुर फिर नागपुर में 1922 और फिर 1923 में इस नवोदित झंडे की प्रतिष्ठा में पूरे पाँच महीने का मार्च से अगस्त तक झंडा सत्याग्रह चला। ग़ौर तलब हो कि गांधी जी ने 1922 के फरबरी के शुरू में ही चौरी चौरा की घटना से व्यथित हो असहयोग-ख़िलाफ़त आंदोलन को वापस ले लिया था। ऐसे में झंडा ऑंदोलन स्थानीय नेताओं ने ही शुरु की थी। यहाँ भी प्रांत के हिंदी भाषी और मराठी भाषी नेताओं में भी मतभेद और गुटबंदी थी। इन सबके बाद भी सत्याग्रह चला, हर दिन सत्याग्रहियों का एक दल एडमिंनिस्ट्रेशन के आदेश का अत्यंत शांतिपूर्ण तरीके से उल्लंघन करता हाथों में स्वराज झंडे को लिये सिविल साइंस से गुज़रने की कोशिश करता और गिरफ़्तार कर लिया जाता। सत्याग्रह की बात फैली, अन्य इलाक़ों से जत्थे आने लगे और कांग्रेस के आलाओं ने भी सुध ली। ख़ैर, पाँच महीने के बाद प्रशासन ने थक कर प्रतिबंध हटा लिये और सत्याग्रहियों को झंडे के साथ जाने की अनुमति मिली। सत्याग्रह समाप्त हुआ। झंडा और भी मुखर हुआ।
महिमा बढ़ी तो दाबे भी बढ़े। बीस के दशक के उत्तरार्ध में सिक्ख समुदाय के एक वर्ग ने अपने पवित्र पीले रंग को झंडे में शामिल करने का दबाव बनाया।  इन वर्षों में देश सांप्रदायिक दंगों का भी शिकार बना। पहली दफ़ा दंगों ने उप महाद्विपीय विस्तार लिया था। इन परिस्थितियों में कांग्रेस के नेतृत्व के पास विकल्प साफ़ थे। वे झंडे की लोकप्रियता का लाभ उठाना चाहते थे। पर सांप्रदायिकता से बचाव के साथ। गांधी जी का झंडा लोकप्रिय था लेकिन कांग्रेस का यह अभी तक औपचारिक पार्टी चिन्ह नहीं था। समुदाय और रंग के दावे से भी चिन्ता थी। तो, 1931 में कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर झंडे को अपनाया। लंबी प्रक्रिया से गुज़रे। लब्बो लुबाब यह कि नये झंडे में लाल की जगह केसरी ने ली। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि रंगों के चयन के पीछे आधार धार्मिक समुदाय न होकर ऐसे मुल्यबोध हैं जो व्यापक और सार्वभौमिक आकार के हैं। कुल मिलाकर यह व्यवस्था सन् सैंतालिस में भी जारी रही जब संविधान सभा ने सर्व सम्मति से 22 जुलाई 1947 कोस्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज पारित किया। एक अहम बदलाव चर्खे के बदले अशोक चक्र के रूप में आया जो नीले रंग में है। गांधी जी का चर्खा जो आम आदमी के जद्दोजहद का प्रतीक था, बुढी बिधवाओं की सखी हुआ करती थी उसे इतिहास के चिन्ह से बदल दिया गया। गांधी जी कहा करते कि वह देश सुखी है जिसका इतिहास नहीं है। वही इतिहास अखाड़ा बन बैठा है। हममें से कोई अतीत की बात नहीं कहता, हम बिज्ञान की भाषा में लिप्टे निरपेक्ष इतिहास को पूरी साप्ताहिक से एक दूसरे पर आरोपित करने को आमदा हैं। गांधीजी कहते थे इतिहास में खुन ख़राबे और युद्ध अटे पड़े हैं। अतित सुकून देता है।मनोचिकित्सक भी आपको अपने अतित में झाँकने को कहता है आपको स्मृति और विस्मरण के आग़ोश में ले जाता इतिहास याद करने की सलाह नहीं देता। 
ख़ैर, कबीर खान अपनी और दर्शकों की इन्हीं साझी विरासत इसी सम्मिलित स्मृति के बल पर फ़िल्म कथा में एक बार फिर महानायक का शक्ल अख़्तियार करता है। देश की गरिमा को कुछ ऐसे पुन:स्थापित करता है जो कल्पनातीत ही तो था। सवाल है कि हम उसे इस जद्दोजहद में कितने साथ हैं। हमारे लिये हरा कितना पवित्र है?


https://www.youtube.com/watch?v=n36CAYMKOd4&sns=em







Monday, June 29, 2015

रीगल होटल, दरभंगा

नजारथ (Nazareth) या नसरथ उत्तरी इस्राइल का सबसे बड़ा शहर है जिसे इस्राइल की अरब राजधानी भी माना जाता है. न्यू टेस्टामेंट के अनुसार इसी शहर में जिसस क्राइस्ट का वचपन गुजरा. इसे मैरी का घर और ईशा मसीह का जन्म स्थल भी माना गया है. यह संभव है कि अपनी इन पवित्र कारणों से बाद की सदियों में नजारथ एक पवित्र टाइटल में बदल गया हो. आखिर पुरानी अरबी और कबीलाई परंपरा में स्थान और क्षेत्रियता का नाम से सीधा रिश्ता तो बनता ही था और ईशा मसीह को जिसस आफ नजारथ के नाम से भी जाना जाता है. यह भी संभव है कि यहां से माइग्रेट करने बाले परिबारों ने नजारथ को एक टाइटल के रुप में अपने साथ रख लिया हो.
जॉन नजारथ एक ऐसा ही नाम है. गोवा के जॉन नजारथ के हाथों में जादु था जो भी इनके हाथ का बना एक बार चख लेता इनका दीवाना हो जाता. बिहार के मुख्यमंत्री सच्चिदानंद सिंहा इस सूची में शामिल थे. जॉन इनके यहां प्रधान कुक हो गये. सच्चिदा बाबु के यहां दरभंगा महाराज का आना जाना रहता ही होगा और वहीं डिनर टेबुल पर किसी रात महाराज ने जॉन के खाने की तारीफ भी की हो और सच्चिदा बाबु से जॉन को दरभंगा के लिये मॉंग भी लिया हो. आखिर आलिशान यूरोपीयन गेस्ट हॉउस के लिये उन्हे एक योग्य कुक की तलाश भी तो थी ही. और, जॉन नजारथ महाराज के साथ दरभंगा आ गये, युरोपीयन गेस्ट हाउस.
समय गुजरा, महाराज भी गुजर गए. युरोपीयन गेस्ट हॉउस की हालात बदली और समय क्रम में अन्य धरोहरों के साथ यह गेस्ट हाउस भी युनिवर्सीटी का हिस्सा हो गया. जो हुनरमंद थे उन्होने बदलते समय और शहर का रुख किया. जो स्वाद महज महाराज, मुख्य मंत्री और युरोपीय मेहमानों तक सीमित था अब शहर का हिस्सा हुआ. जॉन ने उत्तर भारत के पहले लाइसेंसी पब की शुरुआत टावर चौक से सटे लालबाग में की. यहां उम्दा ड्रिंक के साथ लजीज खाना और छोटा सा बेकरी भी रक्खा जिसे जॉन और उनकी मेहनती एवं जुझारु पत्नी चलाया करते. नाम रक्खा 'रीगल'. इसके चिमनी से निकलने वाली खुश्बु को फैलते देर न लगी. लोग चोरी छुपे वहां ड्रिंक्स लेने जाते, नव मध्य वर्ग अपने दोस्तों या नव विवाहिता के साथ बहुत हिम्मत दिखाते हुए रीगल के कटलेट्स और मुर्गा या अंडा करी का लुतफ उठाने जाते. प्रगतिशील परिवार जो बाहर डिनर लेने की हद तक रैडिकल नहीं हो पाये थे, उन हमारे जैसे घरों में रीगल नर्म और ताजे पॉंव रोटी तथा मिट्टी की हांडियों में आने वाले अंडा कड़ी और लजीज मुर्गा के लिये जाना जाता. मुझे यदि कुछ याद है तो साइकल पर बैठकर सिढ़ियॉं चढ उस लाल ईंटो के मकान में जाना, पपरी उदरती उसकी दीवार. शाम में ब्रेड की ताजी खेप निकलती. वहां अंडा करी के और मुर्गा को मटके में भरे जाने में लगे समय तक का वो इंतजार जो माहौल के अनोखेपन के कारण खुशगवार हुआ करता. और घर आकर डाइनिंग टेबुल पर मटके के खुलते ही अंडाकरी की वो खुशवु. हो भी क्यों नहीं, आखिर उस मटके में नजारथ से लेकर गोवा तक के रिश्ते जो बसते थे. ऐसे रिश्ते जिसकी गर्माहट दरभंगा अघिक दिन समेटे सहेजे रख न सका.

Wednesday, November 19, 2014

Dharma Path: Laws and Law seers of India by Late Dr. Ushakar Jha





My father's book is finally here:
http://pothi.com/pothi/book/dr-ushakar-jha-dharma-path.


Dharma Path: Laws and Law seers of India 
Late Dr. Ushakar Jha

About the book
 The book provides an overview of the Hindu Philosophy of Dharma. The notion of Dharma is extraordinarily vast. It is best summarised as the ruling force, the harmonising principle and the foundation of social order in India. It has been conceptualised as a normative frame to conduct day to day life. It is both the goal of life and the core value for organising one's behaviour.
The book offers a synoptic view of the sacred literature that constitutes the foundation of Dharma (or the law as we know it in the contemporary context) and the seers who have shaped this corpus. The word Dharma has passed through several transitions of meaning. The most prominent among them comes in the form of privileges, duties and obligations of a man, his standard of conduct as an individual belonging to a certain caste and as a person at a particular stage of life. Dharma includes law and morals, service and sacrifice to Gods, obedience to state, love towards family and the purity of social life. It has been the crown of the social structure under divine dispensation and is identical with the abstract principle of truth.
The book deals with various aspects of Dharma including its meaning, foundational principles as well as goals, relationship between Dharma and Dandaniti and the manner in which it worked in and through Vidyasthana (abode of knowledge) and Dharmasthana (abode of Dharma).The second half of the book catalogues a wide range of authorities and their works that have shaped the tradition of knowledge on Dharma since the time of Vedas.

About the author
 Dr. Ushakar Jha (13 April 1938-20 June 2006) was a Professor of Political Science. Born and brought up in Sarisab Pahi, Bihar, he completed his college and university education from Patna College and University. An excellent teacher loved by his students and academic fraternity, he spent most of his life in Chandradhari Mithila College and Lalit Narayan Mithila University, Darbhanga. As a respected academician, administrator and a committed intellectual, Dr. Ushakar Jha possessed catholic taste for reading books in particular and also for his approach to life in general. He had traveled widely and made presentations as well as chaired sessions at major academic platforms in the field of Political Science which includes conferences of the International Political Science Association held at Washington D.C. and Paris. This book is a testimony of his wide intellectual canvas as well as his open mind that neither hesitated to welcome ideas nor faltered even once to judge them critically. Following his retirement he moved back to his village sarisab Pahi where he died in 2006.

Saturday, August 30, 2014

आज फेस बुक से पता चला कि प्रो. बिपन चन्द्र नहीं रहे. कुछ दिन पहले ही कि तो बात है जब ऐसे ही एक बहुत ही आम से दिन इसी फेस बुक ने इत्तिला दी कि अनंतमूर्ति गुजर गए. खैर, दोपहर को भोजन करने गया तो एक सहकर्मी से इस दुखद समाचार साझा किया तो उन्होंने स्वतः ही कहा आजकल कई ऐसे लोग गुजर गए हैं पता नहीं...(अगला शव्द क्यों) शायद अनुतरित ही रह गया या फिर उसे तार्किक सोच ने जुबाँ पर आने से रोक दिया. 
प्रो. बिपन चन्द्र को एक ही बार सुनने का मौका मिला. मैं अपना याददास्त दुरुस्त करता हूँ...नहीं, दो बार. लेकिन दुसरे दफे कि स्मृति पता नहीं क्यों धूमिल है. बहरहाल, यह महत्वपूर्ण नहीं. 
किशोरावस्था में जब से इतिहास से मोह हुआ (कुछ तो क्वीज प्रतियोगिता के कारण, कुछ अपने पिताजी के किताबों की आलमारी के कारण और कुछ बड़े भाई के प्रतियोगिता परीक्षा में इतिहास लेने के कारण उनके उत्साहित बात चित के कारण) तब से बिपन चन्द्र का नाम सुनता ही रहा. हाँ बहुत बाद में जाना कि नाम दरअसल बिपन चन्द्र है न कि बिपिन चन्द्र. यह नाम वैसे ही जेहन का हिस्सा था जैसे रोमिला थापर, डी. डी. कौसम्बी, राम शरण शर्मा, के. के दत्त (बिहार की पृष्ठिभूमि जो थी), ए.एल. बाशम, पर्सिवल स्पीयर, डी. एन. झा, टॉयनवी और एच जी. वेल्स. कुल मिलाकर ये नाम थे जिन्हें इतिहासकार के नाम से जानता था. बाद में नामों की लिस्ट बढती चली गयी और स्मृति के नामों में भीषण फेर बदल तो होना ही था. सुमित सरकार का नाम बहुत बाद में सुना. लेकिन जब से दिल्ली विश्वविद्यालय की परम्परा (यदि वास्तव में ऐसा कुछ है भी) का हिस्सा बना तो अपने को सुमित सरकार बनाम बिपन चन्द्र के प्रचलित नूरा कुश्ती में भी दोनों को आंकते हुए पाया. उन दिनों दो दल हुआ करते थे एक जो रोमिला थापर को महान इतिहासकार मानते और दूसरा जो राम शरण शर्मा को बेहतर. एक जो बिपन चन्द्र को सर्वश्रेष्ट और दुसरे जो सुमित सरकार को. बहरहाल, समय के साथ दोनों को पढ़ा और दोनों की अहमियत भी जानी. 
इतिहासकारों या लेखकों को देखने का उनसे मिलने का उमंग पता नहीं क्यों पहले भी नहीं रहा और आज भी इसे बेहूदा ही मानता हूँ. लेकिन जिन्हें पढ़ा हो उन्हें सुनने का चाव था. तो, जब बी. ए. के दौरान एक दिन पता चला कि पास के हिन्दू कालेज में बिपन चन्द्र बोलने बाले हैं तो भला यह मौका कैसे छोड़ता. एक छोटे कद के ( यदि वे लम्बे थे तो मुझे माफ़ करें, पर मैंने उन्हें सभागार में जो देख था और जो छवि याद है उसमें वे छोटे ही थे कद में), सौम्य व्यक्तित्व. उन्हें हिन्दू कालेज फेसिलितेत कर रहा था. वे हिन्दू कालेज में प्राध्यापक थे. उन्होंने अपने प्रिय शिक्षकों के बारे में बातें की. कुल ढाई लोगों को वे शिक्षक मानते थे. उन्होंने नाम गिनाये जो मेरे लिए अनजान थे और मेरे स्मृति का हिस्सा नहीं बने. लेकिन जिस तरह से उन्होंने उन ढाई लोगों को सामने रखा वह काबिले तारीफ़ थी. ये ढाई लोग उनके इतिहासकार बनने में निर्णायक रहे थे.फिर उन्होंने कहा कि यदि आप इतिहासकार हैं, आप एक शिक्षक हैं तो आप अपनी किसी भी पसंदीदा हाबी को साथ साथ निभा भी सकते हैं. आप एक साथ इतिहासकार, शिक्षक, कवि, खिलाड़ी, सब कुछ हो सकते हैं. साथ साथ गिटार भी बजा सकते हैं और संगीत के शौक को भी तरजीह दे सकते हैं. इतिहास और शिक्षण आपको इसकी जमीन और समय मुहैय्या कराता है. यह उन्होंने अपने इन्ही ढाई शिक्षकों में से एक से सिखा था. यह बात मेरे जेहन में बनी रही.