Monday, October 12, 2015

मिनाक्षी और जे की हरी भरी कला

मिनाक्षी और जे की हरी भरी कला दुनियॉं

मिनाक्षी जे एक कलाकार हैं और जे सुशील
उनके पति पेशे से पत्रकार. इस दम्पति से मेरा परिचय फेसबूक के माध्यम से ही हुआ जब ये दोनो बिहार और झाड़खंड के अंदरूनी ईलाकों में अपनी फटफटिया पर सबार एक अनोखी यात्रा पर थे. इस बात के छह आठ महिने तो हो गये होंगे. ये दोनो प्राणी गॉव, देहात, कस्बा जहां भी जाते किसी के घर रूकते और वहां केस्कूल, पुलिस स्टेशन, संथाल टोले, जैसे गैर व्यक्तिगत जगहों पर किसी दीवाल को चुन कर वहीं के लोगों की मदद से पेंटिग किया करते. फिर, इस अनुठे अनुभव को इसके फोटू को अपने ब्लाग आर्टोलॉग पर और फेसबूक जैसे माध्यम से इंटरनेट पर शेयर करते. इन सुंदर चित्रों को इनके मेजवान भी फेसबूक आदि पर चिपकाते. और रंग बिरंगी दिवारों की दुनियॉं हमारे सामने तैरने लगी. ये उन्हीं दिनों की बात है जब क्या देश और क्या बिदेश, क्या सोशल मीडिया क्या मेन स्ट्रीम मीडिया हर जगह एक दूसरी किस्म का बिहारी दीवाल चक्कर लगा रहा था, लोगों की जुबान पर चढ़ा अस्मिता की राजनीति एवं पिछड़ेपन की छौंक लगा रहा था. वह दीवार बिहार राज्य के किसी स्कूल के परीक्षा भवन की थी जिसपर परिजन जद्दोजहद के साथ लटके हमें शिक्षा प्रणाली के खोखलेपन से रूबरू करा रहे थे. वह दीवार भले ही बिहार के किसी जगह की रही हो पर मीडिया में तैरते ये अक्स शिक्षा प्रणाली की बदहाली, इस बाबत हमारे अविश्वास और इसे सवभर्ट करने की सार्वभौमिक इक्छा के वाहक के रूप में तैर रहे थे. साइकोलॉजी में एक शव्द है प्रोजेक्शन. लोग अपनी दमित इक्छाओं के अक्स के रूप में बाह्य हकीकत को रूपांतरित कर संसार को आंकते है.
खैर, तो उन्हीं दिनों मिनाक्षी और जे की सुंदर तथा अंतर्दृष्टि से भरी दीवारों से मेरा परिचय हुआ था, इसी आभासी दुनिया में.
इनके कला के सौंदर्यबोध की बात मैं यहां नहीं करूंगा पर दो बातें खास तौर पर ध्यान खिंचती है. पहला तो इसका सझिया स्वरूप जो मूलत: और अपनी समग्रता में गैर-व्यक्तिगत है. अंग्रेजी का सहारा लेकर कहें तो पार्टिसीपेटरी एंड पब्लिक आर्ट. ऐसी बात नहीं कि इस कला की अपनी परंपरा नहीं रही है या इसका आकाश नहीं हो. पर, भारत में इसकी बानगी देखने में नहीं मिलती. यहां गैर व्यक्तिगत कला को या तो लोक कला के रूप में हम चर्चा करते हैं या फिर, किसी बड़े सामाजिक संकट बाली घटना के समय किये गये राजनीति प्रेरित कला की अभिव्यक्ति के तौर पर. यदि हम अपनी दृष्टि को थोड़ा विस्तार देने की जहमत उठायें तो सड़क पर दिखाई देती साईनबोर्ड, सिनेमा के पोस्टर, विग्यापन और मजदूरों के बच्चों के हाथों कभी पेंसिल से , कभी सूर्खी से, कभी ईंट से या कभी चॉक से बनायी आड़ी तिरछी रेखाओं में कला का गैर व्यक्तिगत चेहरा देख लेते हैं. पर, मिनाक्षी और जे के प्रयोग इनसे परे जाते हैं. यह लोक कला तो नहीं है पर भागेदारी के स्तर पर सझिया है, लोक तांत्रिक है.  यह सिनेमा का पोस्टर नहीं  पर पब्लिक आर्ट है. राजनीतिक घटना के चौखटे में बंधा हुआ तो नहीं पर हमारी स्थापित मान्यताओं और समझ के साथ सीधे सीधे साक्षातकार करता उसे झंकझोड़ने को मुखातिब जरूर है. इस रूप में स्थापित दावों को तोड़ता नये प्रतिदावों को आकार देती कला.
दूसरी खास बात है इस कला का धरातल. कलाकार दम्पत्ति दिल्ली बासी हैं पर,  अपनी जमात के कलाकारों और पब्लिक आर्ट् के प्रेक्टिसनर्स से भिन्न इनके कला का संदर्भ और जमीन महानगरीय समाज और उसकी अभिजात्यता में सिमटा हुआ नहीं है. यहां गॉव देहात, कस्बे और छोटे शहर सब बसते हैं. यहां इन समाजों और  इनकी समकालीनता महज चित्रों में ही नहीं है यहां शब्द और चित्र दोनों हैं. अनुभव और रंग, आप और हम, लकीर और फकीर, आज और कल.सब एक दूसरे से मिले, हर एक अपने वजूद के साथ सांस लेता.
यदि आप दिल्ली या इसके आसपास हैं तो आज कल इस दम्पत्ति के साथ इनके कला यात्रा में भागेदारी कर सकते हैं, लोधी रोड स्थित इंडिया हैबीटेट सेंटर में जहां इनकी अनोखी कला प्रदर्शिनी अक्टूबर भर चलेगी, आपकी शिरकत के लिये. मैंने फेसबूक पर बहुतेरे परिजनो और उनके बच्चों को चहकते देखा है.

Thursday, September 24, 2015

उन्हीं दिनों की बात है जब गर्मियों की छुट्टी में, दुर्गा पुजा में और दिसंबर मे वार्षिक परीक्षा के बाद हम लोग दरभंगा से अपने गाम जाया करते. महज 29-30 किलोमीटर की यात्रा. भीड़ भरे बस, 1753, 2153... और एसी ही अनेकों 53 प्रत्यय वाली लाल मुंह की बसें. वहां गर्मी में सुबह अंघेरे आम तुड़बाने जाया करते, दलान में सोते, छोटी छोटी कपों में चाय पीया करते वह भी भोर होने से पहले. यहां यह जोड़ देना जरुरी है कि दरभंगा डेरा पर मां का चाय पर पहड़ा हुआ करता और हम बच्चों को चाय नहीं मिलता. पर गाम में मेरे पितामह, हमारे बबा का दलान मॉ की पहुंच से बहुत दुर हुआ करता. जब तक सुर्योदय होता हम लोग गाछी से लौट भी रहे होते. फिर आम का पाल लगाया जाता, घूप लगाया जाता और छंटनी होती. मोहनजी भाईजी के नेतृत्व में, बांकी सब उनके अस्सिटेंट हुआ करते. अबतक, मॉ की तरफ से तैयार होने का और जलखई करलेने का दबाब बढ़ने लगता और हम सब घर के ही छोटे पोखर का रूख कर रहे होते. पूरा दिन खेल, शोर शरावा. दिन भर इधर से उधर बौआना, कभी मोछ की चटनी तो कभी कच्चे आम का झक्का. मौलवी सहाब की दुकान से बंसी और तरैला लाना और बुढ़िया कब्बडी का खेल. लेकिन यह सब तो गाम पहुंचने के कुछ देर बाद या फिर अगले दिन शुरु होता. गाम में बस रुकते ही गोसौन को गोड़ लगने और बड़ों का आशिर्वाद लेने के ठीक बाद या शायद उससे भी पहले सबसे पहले भाग कर छत पर चढ़ जाते. पहली मंजिल पर एक खाली चौकोर कमरा महज एक चारपायी निवासी. अंगूर की बेलें और खट्टी खट्टी लेकिन बेहद रसीली गहरे रंग की अंगूर. पर मंजिल तो अभी आगे हुआ करता, उस एकाकी छत वाले कमरे के छत पर जाना. लकड़ी की एक सुरूची पूर्ण सीढी हुआ करती और हम उसे चढ़ ऊपर सबसे ऊंचे छत पर चढ़ जाते. जालीदार खुबसुरत रेलिंग की सुरक्षा में सामने पूरा पसरा हुआ पूब. बाल मन में किसी का कहा बात घर कर चुका था कि साफ आसमान में हमारे गाम के उस छत से हिमालय की वर्फ भरी चोटियॉं दिखती थी. दूर तक पसरे पूब और ऊत्तर की कोण में मैं कभी यह तय नहीं कर पाता कि जो दख रहा होता वह उजले नीले वादल हुआ करते या सचमुच हमारी किस्मत हमारी साथ दे रही होती और हिमालय ही के दर्शन हो रहे होते. सत्य को किसने देखा. विग्यान जिसने इस सत्य को देख लेने का दावा किया, उन दिनों मुझसे तो दूर ही था. हिमालय पहाड़ या उजले नीले वादल तुम जो भी थे मुझे पसंद थे. एक उत्तर बिहार में पलने बाले मन में तुमने हिम आच्छादित पहाड़ देखने की ललक को जगाये रखा.

Wednesday, September 16, 2015

हॉफ सेट चाय: लाइब्रेरी स्पेशल और तीन मुर्ती


यह उन दिनों की बात है जब लाइब्रेरी स्पेशल चला करता था. दिल्ली विश्वविद्यालय से दोपहर बाद खुलता था और सभी प्रमुख लाइब्रेरी एवं आर्काइब भी जाया करता. इसी लाइब्रेरी
स्पेशल में पहले पहल देखा किया उसे. डी स्कूल के स्टाप पर बस में आयी वह. गहरे कत्थई दुपट्टे और बहुत हल्के क्रीम कलर की सूती सूट. सूट का रंग कुछ यूं कि किसी बहुत बड़े दुध के थार में एक चुटकी भर चंपई मिला दिया गया हो.
ये मेरा उस बस में पहला दिन था. ये मेरा तीन मुर्ती का भी पहला दिन था. अब तक यह सोचा करता हूं कि यह महज संयोग तो न था कि तीन मुर्ती के गेट पर उतरने बाले उस दिन महज हम दोनों ही थे. पहल उसने ही की थी, शायद तकाजे के लिये ही. एक बेहद संतुलित मुस्कान के साथ जो उस खाली बर्तन की तरह जिसमें चाहे आप जितनी कल्पना, जितने सपने भर दें, वह कभी लवरेज नहीं हो.एक ऐसी ही आत्मीय मुस्कान. तीन मुर्ती के विशालकाय एतिहासिकता की ताकीद कराता गेट, उसके अंदर जतन से संवारा गया उतना ही विशाल लॉन और उसके पीछे, नजर के दूसरे छोड़ पर एक भब्य इमारत. नेहरू जी का घर.
मैं मुस्कान को जेहन में लपेटे अपनी संकुचाहट के साथ उसके पीछे हो लिया. मुझे ठीक ठीक याद है वह उस दिन चॉंद का फांसी अंक देख रही थी, पहले फ्लोर पर माइक्रोफिल्म रीडर पर. मैं चुपचाप उत्सुकता से उसे देख आया था. यह कहना मुश्किल कि मैं लाइब्रेरी से रुबरु हो रहा था या फिर यह जानने कि वह क्या कर रही है. यह भी ठीक ठीक नहीं कह सकता कि मैं किस बात से अधिक चमत्कृत था: माइक्रोफिल्म रीडर से या फिर चांद के फांसी अंक की वह तस्वीर जो उस रीडर के पटल पर उस पल अपने धुंधलके में चमक रही थी. यह सिलसिला चल पड़ा. मैं चुपके से देख आया करता कि वह क्या पढ़ रही है. और, धीरे धीरे उस पुस्तकालय के कोनों से लगाव वढ़ने लगा. मैन्युस्क्रीप्ट सैक्शन में जहां मुझे यह विश्वास था कि महज नेहरू और कांग्रेस के दस्तावेज होंगे वहां वह माखन लाल चतुर्वेदी के खतो किताबत में मशरूफ पायी जाती. माइक्रोफिल्म पर सावरकर और मुंजे की हस्तलिखित दस्तावेज में आंख डूबोए मिलती और, ब्रिटिश हुकुमत द्वारा बैन किये प्रतिवंधित साहित्य गदर की गूंज के गुरूमुखी को उतारते हुए भी मुझे वो याद है. ऐसा नहीं कि उसे मेरी चोरी का पता नहीं हो. उसने बहुत बाद में मुझे बताया था कि लड़कियों के पीठ पीछे भी दो आंखे हुआ करती हैं और फिर उसने एक बहुत आश्वस्त करने वाली भाव प्रकट की थी. कुट्टी के कैंटीन के बाहर अहाते में आटम ब्रेक के बाद वह पहला दिन था. हम एक दूसरे से अरसे बाद मिल रहे थे. उसने ही कैंटीन चल चाय पीने का प्रस्ताव रक्खा था. हवा में हल्की रेश्मी ठंडक आ गयी थी. हॉफ सेट चाय टेबल पर आ चुका था. चाय प्याले में उड़ेलते हुए उसने पुछा था कि मैं आजकल क्या पढ़ रहा हूं. फिर, यह भी कहा था कि अगले कुछ सप्ताह वह जेनयु की लाइब्रेरी में दिनमान के साठ के दशक की प्रतियां ओर मारवाड़ी लाइब्रेरी में कुछ समय बिताएगी. फिर हम रघुबीर सहाय और 'शेखर' की बात करने लगे. चाय के बाद उस शाम मैं अपने कमरे देर से लौटा.

Thursday, September 10, 2015

Artists Residency Programme in village Chanka, Purnea, Bihar.

Girindranath Jha is a farmer. Apart from farming, he is a prolific writer on social media and in hindi news papers. He plans to start a residency programme in his village, Chanka ( District Purnea, in the region of Kosi river, Bihar). Those interested in spending some quiet and quality time and pursue creative work, writing, research etc may find his invitation lucrative.
Girindranath Jha is a dynamic young man and quite passionate about his fields and crops. Earlier, he was a journalist with leading hindi news papers but left the urban life style and occupation for his love of farming, region and rural life. He now divides his time between Purnea and his village, Chanka which is located some 25 kms from the small town of Purnea. The residency will be located in the village Chanka.
He may be contacted at girindranath@gmail.com

Below is his write up posted on different social media plateform.
बहुत दिनों से इच्छा थी कि अपनी मन की एक बात यहां सार्वजनिक करूं। बात कहिये या फिर एक किसान की योजना। दरअसल मैं अपने गाँव चनका में एक रेसीडेन्सी प्रोग्राम शुरू करना चाहता हूँ। चनका एक गाँव है जो बिहार के पूर्णिया जिला में स्थित है।
रेसीडेन्सी प्रोग्राम बेहद सामान्य तरीके से आरम्भ करूंगा। जहां कला, साहित्य, पत्रकारिता और अन्य विषयों में रूचि रखने वाले लोग आएं और गाम-घर में वक्त गुजारें। गाँव को समझे-बूझें। खेत पथार, तलाब कुंआ...ग्राम्य गीत..आदि को नजदीक से देखें।
बाबूजी की स्मृति में यह रेसीडेन्सी आरम्भ करने का इरादा है। मेरे पिता वैसे तो एक किसान थे लेकिन  उन्होंने अपना जीवन किसानी के संग रेणु साहित्य और अंचल के लिए समर्पित किया, अब  मैं उनकी यादों के सहारे इस काम को आगे बढ़ाना चाहता हूँ।
इस सम्बन्ध में आपलोगों का सुझाव चाहिए, आखिर कैसे इस काम को आगे बढ़ाया जाए। मैंने 1000 किताबें जमा की है लाइब्रेरी के लिए। दो बेडरूम, एक किचन, डाइनिंग स्पेस , बाथरूम, बरामदा के साथ एक छोटा सा कॉटेज तैयार किया है, जिसे फाइनल टच देना बाँकी है।
पूर्णिया शहर से 25 किलोमीटर की दूरी पर चनका गाँव है। आप सबों से आग्रह है कि सुझाव दें ।
किसानी करते हुए एक नई शुरुआत करना चाहता हूँ। किसानी को इस तरह जीना चाहता हूँ , जिससे आने वाली नई पीढ़ी भी गाँव की तरफ मुड़े। किसानी को भी लोगबाग पेशा समझे। किसानी से लोगों का मोह भंग न हो।
आप सब कुछ सुझाव दें ताकि मैं काम को आगे बढ़ा सकूं।

Saturday, August 15, 2015

तिरंगा, हरा रंग, चक दे इंडिया, तिजा तेरा रंग


"तिजा तेरा रंग था मैं तो, जिया तेरे ढंग से मैं तो।
तुही था मौला तुही आन, मौला मेरे ले ले मेरी जान।।"

गाने हमारी जन चेतना के आधार स्तंभ हुआ करते हैं, कुछ उसी तरह जैसे प्रेस, जैसे पाठ्य पुस्तक, जैसे क्रिकेट, जैसे टेलिविज़न और जैसे पिछले कुछ वर्षों में फ़ेसबुक, ट्विटर और व्हाट्स अप। जयदीप साहनी के सीधे दिल को छनने बाले बोल, 2007 की फ़िल्म 'चक दे इंडिया' का यह गीत जिसे कृष्णा और सलीम मर्चेंट ने गाया और सलीम- सुलेमान की जोड़ी ने संगीत से नवाज़ा है  ऐसा ही एक गीत है। हमारी चेतना को ताक़ीद कराता, एक हूक है एक लंबी तान।
मैं तेरा तीसरा रंग था, मैंने तो अपनी ज़िंदगी तेरे ही साँचे में जिया...
इसे ऐसे भी तो पढ़ सकते हैं: तिरंगे, मैं तेरा ही रंग था...
अच्छे गाने, कविता या फिर पेंटिंग की यही ख़ासियत होती है। अर्थों की अधिकता। बोलों के बीच आपकी कल्पना को आकाश मिलता है। आपका मन बंध जाता। रस्सियाँ खुल जाती हैं। गिरह गाँठ ढीली।
हरा, हमारे तिरंगे का तीसरा रंग। धरती के ख़ुशहाली का आवरण, नवयुवतियों की धानी चुड़ियो की चमक, उल्लास का रंग, सुख और समृद्धि का रंग, पर्यावरण का रंग और पैग़म्बर मोहम्मद साहब के झंडे का पवित्र रंग। 
कबीर खान पैनल्टी स्ट्रोंग को गोल में तब्दील नही कर पाते और इंडिया पाकिस्तान से हाकी में हार जाता है। कबीर खान हीरो से ग़द्दार क़रार दे दिये जाते हैं। सिनेमा स्क्रीन पर हूक उठती है, मैं तो तुम्हारा ही रंग था, तुझसा ही तो ढाला मैंने अपने होने को। तुम्हें ही तो माना मैंने मौला, फिर ये कैसी ज़िल्लत? अब और क्या यह जान ही ले ले। यह जान भी तुम्हारी।
कबीर खान का दर्द एक समुदाय की आवाज़ अख़्तियार करता है, कानों में। एक बहुत ही भिन्न रूप में मर्सिया सा है यह गीत। वही मर्सिया जो एक ज़माने में 'मुस्लिम सोशल' का एक अहम हिस्सा हुआ करती थी। हरा, कबीर खान, मुसलमान समुदाय, समुदाय की पीड़ा। कौन सुने यह, किससे साझा करे यह दर्द? आख़िर तिरंगा ही तो उसका अपना है। वही तो साझेदार है, राज़दार है।
समुदाय और रंग का सीधा समीकरण हमारी राजनैतिक जन चेतना में प्रमुखता से रहा है।संविधान सभा और स्कूल के किताबों में तिरंगे के रंगों को सार्वभौमिक मुल्यों से ही नवाज़ा गया है लेकिन जन संस्कृति के अपने धरातल रहे हैं। और फिर यह समीकरण भी नया तो नहीं। 
महात्मा गांधी जब 1921 में पिंग्ली बेंकैया के चार साल के अथक प्रयास के बाद एक झंडे की अहमियत पर राज़ी हुये तो उनके मन में भी यह समीकरण स्पष्ट था। सबसे ऊपर सुफेद हिंदुस्तान के अल्प संख्यक समुदायों के लिए. उसके नीचे हरा मुसलमान समुदाय के लिये और सबसे नीचे  लाल हिंदु समुदाय के लिये। लेकिन इन सबके बाबजुद महात्मा के लिये झंडा तभी मुकम्मल हुआ जब लाला हंसराज ने बीच में चर्खे डालने का सुझाव दिया। बग़ैर चर्खे का झंडा, गांधी जी को मंज़ूर न था।
स्वराज झंडा, सुराज झंडा, गांधीजी का झंडा, राष्ट्रीय झंडा, कांग्रेस का झंडा, असहयोग का झंडा जितनी मुँह उतनी बातें। चर्खा और टोपी तो कुछ साल पहले से आ ही गये थे लेकिन झंडा ने आते ही जनता के बीच अपनी ख़ास जगह बना ली। तभी तो कुछ ही समय में  पहले जबलपुर फिर नागपुर में 1922 और फिर 1923 में इस नवोदित झंडे की प्रतिष्ठा में पूरे पाँच महीने का मार्च से अगस्त तक झंडा सत्याग्रह चला। ग़ौर तलब हो कि गांधी जी ने 1922 के फरबरी के शुरू में ही चौरी चौरा की घटना से व्यथित हो असहयोग-ख़िलाफ़त आंदोलन को वापस ले लिया था। ऐसे में झंडा ऑंदोलन स्थानीय नेताओं ने ही शुरु की थी। यहाँ भी प्रांत के हिंदी भाषी और मराठी भाषी नेताओं में भी मतभेद और गुटबंदी थी। इन सबके बाद भी सत्याग्रह चला, हर दिन सत्याग्रहियों का एक दल एडमिंनिस्ट्रेशन के आदेश का अत्यंत शांतिपूर्ण तरीके से उल्लंघन करता हाथों में स्वराज झंडे को लिये सिविल साइंस से गुज़रने की कोशिश करता और गिरफ़्तार कर लिया जाता। सत्याग्रह की बात फैली, अन्य इलाक़ों से जत्थे आने लगे और कांग्रेस के आलाओं ने भी सुध ली। ख़ैर, पाँच महीने के बाद प्रशासन ने थक कर प्रतिबंध हटा लिये और सत्याग्रहियों को झंडे के साथ जाने की अनुमति मिली। सत्याग्रह समाप्त हुआ। झंडा और भी मुखर हुआ।
महिमा बढ़ी तो दाबे भी बढ़े। बीस के दशक के उत्तरार्ध में सिक्ख समुदाय के एक वर्ग ने अपने पवित्र पीले रंग को झंडे में शामिल करने का दबाव बनाया।  इन वर्षों में देश सांप्रदायिक दंगों का भी शिकार बना। पहली दफ़ा दंगों ने उप महाद्विपीय विस्तार लिया था। इन परिस्थितियों में कांग्रेस के नेतृत्व के पास विकल्प साफ़ थे। वे झंडे की लोकप्रियता का लाभ उठाना चाहते थे। पर सांप्रदायिकता से बचाव के साथ। गांधी जी का झंडा लोकप्रिय था लेकिन कांग्रेस का यह अभी तक औपचारिक पार्टी चिन्ह नहीं था। समुदाय और रंग के दावे से भी चिन्ता थी। तो, 1931 में कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर झंडे को अपनाया। लंबी प्रक्रिया से गुज़रे। लब्बो लुबाब यह कि नये झंडे में लाल की जगह केसरी ने ली। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि रंगों के चयन के पीछे आधार धार्मिक समुदाय न होकर ऐसे मुल्यबोध हैं जो व्यापक और सार्वभौमिक आकार के हैं। कुल मिलाकर यह व्यवस्था सन् सैंतालिस में भी जारी रही जब संविधान सभा ने सर्व सम्मति से 22 जुलाई 1947 कोस्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज पारित किया। एक अहम बदलाव चर्खे के बदले अशोक चक्र के रूप में आया जो नीले रंग में है। गांधी जी का चर्खा जो आम आदमी के जद्दोजहद का प्रतीक था, बुढी बिधवाओं की सखी हुआ करती थी उसे इतिहास के चिन्ह से बदल दिया गया। गांधी जी कहा करते कि वह देश सुखी है जिसका इतिहास नहीं है। वही इतिहास अखाड़ा बन बैठा है। हममें से कोई अतीत की बात नहीं कहता, हम बिज्ञान की भाषा में लिप्टे निरपेक्ष इतिहास को पूरी साप्ताहिक से एक दूसरे पर आरोपित करने को आमदा हैं। गांधीजी कहते थे इतिहास में खुन ख़राबे और युद्ध अटे पड़े हैं। अतित सुकून देता है।मनोचिकित्सक भी आपको अपने अतित में झाँकने को कहता है आपको स्मृति और विस्मरण के आग़ोश में ले जाता इतिहास याद करने की सलाह नहीं देता। 
ख़ैर, कबीर खान अपनी और दर्शकों की इन्हीं साझी विरासत इसी सम्मिलित स्मृति के बल पर फ़िल्म कथा में एक बार फिर महानायक का शक्ल अख़्तियार करता है। देश की गरिमा को कुछ ऐसे पुन:स्थापित करता है जो कल्पनातीत ही तो था। सवाल है कि हम उसे इस जद्दोजहद में कितने साथ हैं। हमारे लिये हरा कितना पवित्र है?


https://www.youtube.com/watch?v=n36CAYMKOd4&sns=em







Monday, June 29, 2015

रीगल होटल, दरभंगा

नजारथ (Nazareth) या नसरथ उत्तरी इस्राइल का सबसे बड़ा शहर है जिसे इस्राइल की अरब राजधानी भी माना जाता है. न्यू टेस्टामेंट के अनुसार इसी शहर में जिसस क्राइस्ट का वचपन गुजरा. इसे मैरी का घर और ईशा मसीह का जन्म स्थल भी माना गया है. यह संभव है कि अपनी इन पवित्र कारणों से बाद की सदियों में नजारथ एक पवित्र टाइटल में बदल गया हो. आखिर पुरानी अरबी और कबीलाई परंपरा में स्थान और क्षेत्रियता का नाम से सीधा रिश्ता तो बनता ही था और ईशा मसीह को जिसस आफ नजारथ के नाम से भी जाना जाता है. यह भी संभव है कि यहां से माइग्रेट करने बाले परिबारों ने नजारथ को एक टाइटल के रुप में अपने साथ रख लिया हो.
जॉन नजारथ एक ऐसा ही नाम है. गोवा के जॉन नजारथ के हाथों में जादु था जो भी इनके हाथ का बना एक बार चख लेता इनका दीवाना हो जाता. बिहार के मुख्यमंत्री सच्चिदानंद सिंहा इस सूची में शामिल थे. जॉन इनके यहां प्रधान कुक हो गये. सच्चिदा बाबु के यहां दरभंगा महाराज का आना जाना रहता ही होगा और वहीं डिनर टेबुल पर किसी रात महाराज ने जॉन के खाने की तारीफ भी की हो और सच्चिदा बाबु से जॉन को दरभंगा के लिये मॉंग भी लिया हो. आखिर आलिशान यूरोपीयन गेस्ट हॉउस के लिये उन्हे एक योग्य कुक की तलाश भी तो थी ही. और, जॉन नजारथ महाराज के साथ दरभंगा आ गये, युरोपीयन गेस्ट हाउस.
समय गुजरा, महाराज भी गुजर गए. युरोपीयन गेस्ट हॉउस की हालात बदली और समय क्रम में अन्य धरोहरों के साथ यह गेस्ट हाउस भी युनिवर्सीटी का हिस्सा हो गया. जो हुनरमंद थे उन्होने बदलते समय और शहर का रुख किया. जो स्वाद महज महाराज, मुख्य मंत्री और युरोपीय मेहमानों तक सीमित था अब शहर का हिस्सा हुआ. जॉन ने उत्तर भारत के पहले लाइसेंसी पब की शुरुआत टावर चौक से सटे लालबाग में की. यहां उम्दा ड्रिंक के साथ लजीज खाना और छोटा सा बेकरी भी रक्खा जिसे जॉन और उनकी मेहनती एवं जुझारु पत्नी चलाया करते. नाम रक्खा 'रीगल'. इसके चिमनी से निकलने वाली खुश्बु को फैलते देर न लगी. लोग चोरी छुपे वहां ड्रिंक्स लेने जाते, नव मध्य वर्ग अपने दोस्तों या नव विवाहिता के साथ बहुत हिम्मत दिखाते हुए रीगल के कटलेट्स और मुर्गा या अंडा करी का लुतफ उठाने जाते. प्रगतिशील परिवार जो बाहर डिनर लेने की हद तक रैडिकल नहीं हो पाये थे, उन हमारे जैसे घरों में रीगल नर्म और ताजे पॉंव रोटी तथा मिट्टी की हांडियों में आने वाले अंडा कड़ी और लजीज मुर्गा के लिये जाना जाता. मुझे यदि कुछ याद है तो साइकल पर बैठकर सिढ़ियॉं चढ उस लाल ईंटो के मकान में जाना, पपरी उदरती उसकी दीवार. शाम में ब्रेड की ताजी खेप निकलती. वहां अंडा करी के और मुर्गा को मटके में भरे जाने में लगे समय तक का वो इंतजार जो माहौल के अनोखेपन के कारण खुशगवार हुआ करता. और घर आकर डाइनिंग टेबुल पर मटके के खुलते ही अंडाकरी की वो खुशवु. हो भी क्यों नहीं, आखिर उस मटके में नजारथ से लेकर गोवा तक के रिश्ते जो बसते थे. ऐसे रिश्ते जिसकी गर्माहट दरभंगा अघिक दिन समेटे सहेजे रख न सका.

Wednesday, November 19, 2014

Dharma Path: Laws and Law seers of India by Late Dr. Ushakar Jha





My father's book is finally here:
http://pothi.com/pothi/book/dr-ushakar-jha-dharma-path.


Dharma Path: Laws and Law seers of India 
Late Dr. Ushakar Jha

About the book
 The book provides an overview of the Hindu Philosophy of Dharma. The notion of Dharma is extraordinarily vast. It is best summarised as the ruling force, the harmonising principle and the foundation of social order in India. It has been conceptualised as a normative frame to conduct day to day life. It is both the goal of life and the core value for organising one's behaviour.
The book offers a synoptic view of the sacred literature that constitutes the foundation of Dharma (or the law as we know it in the contemporary context) and the seers who have shaped this corpus. The word Dharma has passed through several transitions of meaning. The most prominent among them comes in the form of privileges, duties and obligations of a man, his standard of conduct as an individual belonging to a certain caste and as a person at a particular stage of life. Dharma includes law and morals, service and sacrifice to Gods, obedience to state, love towards family and the purity of social life. It has been the crown of the social structure under divine dispensation and is identical with the abstract principle of truth.
The book deals with various aspects of Dharma including its meaning, foundational principles as well as goals, relationship between Dharma and Dandaniti and the manner in which it worked in and through Vidyasthana (abode of knowledge) and Dharmasthana (abode of Dharma).The second half of the book catalogues a wide range of authorities and their works that have shaped the tradition of knowledge on Dharma since the time of Vedas.

About the author
 Dr. Ushakar Jha (13 April 1938-20 June 2006) was a Professor of Political Science. Born and brought up in Sarisab Pahi, Bihar, he completed his college and university education from Patna College and University. An excellent teacher loved by his students and academic fraternity, he spent most of his life in Chandradhari Mithila College and Lalit Narayan Mithila University, Darbhanga. As a respected academician, administrator and a committed intellectual, Dr. Ushakar Jha possessed catholic taste for reading books in particular and also for his approach to life in general. He had traveled widely and made presentations as well as chaired sessions at major academic platforms in the field of Political Science which includes conferences of the International Political Science Association held at Washington D.C. and Paris. This book is a testimony of his wide intellectual canvas as well as his open mind that neither hesitated to welcome ideas nor faltered even once to judge them critically. Following his retirement he moved back to his village sarisab Pahi where he died in 2006.

Saturday, August 30, 2014

आज फेस बुक से पता चला कि प्रो. बिपन चन्द्र नहीं रहे. कुछ दिन पहले ही कि तो बात है जब ऐसे ही एक बहुत ही आम से दिन इसी फेस बुक ने इत्तिला दी कि अनंतमूर्ति गुजर गए. खैर, दोपहर को भोजन करने गया तो एक सहकर्मी से इस दुखद समाचार साझा किया तो उन्होंने स्वतः ही कहा आजकल कई ऐसे लोग गुजर गए हैं पता नहीं...(अगला शव्द क्यों) शायद अनुतरित ही रह गया या फिर उसे तार्किक सोच ने जुबाँ पर आने से रोक दिया. 
प्रो. बिपन चन्द्र को एक ही बार सुनने का मौका मिला. मैं अपना याददास्त दुरुस्त करता हूँ...नहीं, दो बार. लेकिन दुसरे दफे कि स्मृति पता नहीं क्यों धूमिल है. बहरहाल, यह महत्वपूर्ण नहीं. 
किशोरावस्था में जब से इतिहास से मोह हुआ (कुछ तो क्वीज प्रतियोगिता के कारण, कुछ अपने पिताजी के किताबों की आलमारी के कारण और कुछ बड़े भाई के प्रतियोगिता परीक्षा में इतिहास लेने के कारण उनके उत्साहित बात चित के कारण) तब से बिपन चन्द्र का नाम सुनता ही रहा. हाँ बहुत बाद में जाना कि नाम दरअसल बिपन चन्द्र है न कि बिपिन चन्द्र. यह नाम वैसे ही जेहन का हिस्सा था जैसे रोमिला थापर, डी. डी. कौसम्बी, राम शरण शर्मा, के. के दत्त (बिहार की पृष्ठिभूमि जो थी), ए.एल. बाशम, पर्सिवल स्पीयर, डी. एन. झा, टॉयनवी और एच जी. वेल्स. कुल मिलाकर ये नाम थे जिन्हें इतिहासकार के नाम से जानता था. बाद में नामों की लिस्ट बढती चली गयी और स्मृति के नामों में भीषण फेर बदल तो होना ही था. सुमित सरकार का नाम बहुत बाद में सुना. लेकिन जब से दिल्ली विश्वविद्यालय की परम्परा (यदि वास्तव में ऐसा कुछ है भी) का हिस्सा बना तो अपने को सुमित सरकार बनाम बिपन चन्द्र के प्रचलित नूरा कुश्ती में भी दोनों को आंकते हुए पाया. उन दिनों दो दल हुआ करते थे एक जो रोमिला थापर को महान इतिहासकार मानते और दूसरा जो राम शरण शर्मा को बेहतर. एक जो बिपन चन्द्र को सर्वश्रेष्ट और दुसरे जो सुमित सरकार को. बहरहाल, समय के साथ दोनों को पढ़ा और दोनों की अहमियत भी जानी. 
इतिहासकारों या लेखकों को देखने का उनसे मिलने का उमंग पता नहीं क्यों पहले भी नहीं रहा और आज भी इसे बेहूदा ही मानता हूँ. लेकिन जिन्हें पढ़ा हो उन्हें सुनने का चाव था. तो, जब बी. ए. के दौरान एक दिन पता चला कि पास के हिन्दू कालेज में बिपन चन्द्र बोलने बाले हैं तो भला यह मौका कैसे छोड़ता. एक छोटे कद के ( यदि वे लम्बे थे तो मुझे माफ़ करें, पर मैंने उन्हें सभागार में जो देख था और जो छवि याद है उसमें वे छोटे ही थे कद में), सौम्य व्यक्तित्व. उन्हें हिन्दू कालेज फेसिलितेत कर रहा था. वे हिन्दू कालेज में प्राध्यापक थे. उन्होंने अपने प्रिय शिक्षकों के बारे में बातें की. कुल ढाई लोगों को वे शिक्षक मानते थे. उन्होंने नाम गिनाये जो मेरे लिए अनजान थे और मेरे स्मृति का हिस्सा नहीं बने. लेकिन जिस तरह से उन्होंने उन ढाई लोगों को सामने रखा वह काबिले तारीफ़ थी. ये ढाई लोग उनके इतिहासकार बनने में निर्णायक रहे थे.फिर उन्होंने कहा कि यदि आप इतिहासकार हैं, आप एक शिक्षक हैं तो आप अपनी किसी भी पसंदीदा हाबी को साथ साथ निभा भी सकते हैं. आप एक साथ इतिहासकार, शिक्षक, कवि, खिलाड़ी, सब कुछ हो सकते हैं. साथ साथ गिटार भी बजा सकते हैं और संगीत के शौक को भी तरजीह दे सकते हैं. इतिहास और शिक्षण आपको इसकी जमीन और समय मुहैय्या कराता है. यह उन्होंने अपने इन्ही ढाई शिक्षकों में से एक से सिखा था. यह बात मेरे जेहन में बनी रही.



Thursday, June 05, 2014

सन्यासी शब्द

आज बहुत दिनों बाद एक बार फिर से अपने ब्लॉग की याद आई, मामूलीराम के ख़यालात.
कुछ मुख्तसर से,कुछ अपने वजूद को ढूंढते फिरते... कुछ यूँ ही आवारगी करते... उनमें से कईयों ने कहा क्यों कहते हो क्यों मुझे अपने से जुदा करते हो? कैसा लगता है जब तुम मुझे तलाशते हो अपने कहने के लिए
फिर जब इतनी जद्दो जहद के बाद मैं तुम्हे मिल जाता हूँ तो क्या तनिक भी नहीं सोचते कलम से श्याही से की-बोर्ड से पन्नो पर, स्क्रीन पर, ब्लॉग पर उकेरते हुए? क्या यह नहीं लगता कि मैं तुम्हारे जेहन से एक बार निकल जाने के बाद फिर तुम्हारा नहीं रह जाऊँगा? फिर से तुम्हे अगली बार उतनी ही या शायद उससे भी अधिक मेहनत करना परे... फिर से मैं नखरे दिखाऊं और यह भी तो हो सकता है की मैं खो जाऊं दुनिया के भीड़ में... यदि भविष्य ऐसा भी हो सकता है तो फिर लिख डालने का या आत्म विश्वास कैसा? कहीं तुम यह तो नहीं सोचते की शब्द की नियति लिखे जाने से ही है? इस भुलावे में मत रहना...
सन्यासी शब्द कब आओगे मेरी दुनिया में,
खड़े रहोगे वहीँ कच्चे रास्ते पर, शहर से दूर
या फिर
बस्ती में भरे बाजार इतराते फिरोगे...         

Sunset, Narmada bank at Kabir Bad, Gujarat 2014


movie: Mastram

yesterday watched a recently released movie Mastram written and directed by Akhilesh Jaiswal.Sometimes back, there was Miss Lovely, a film on c-grade movies by Ashim Ahluwalia. While Mastram is a fictionalised bio-pic on the mystical magical unknown author of Hindi porn booklets with which we (and various generations) grew up Miss Lovely weaves complex web of business, sleazy sex-horror films that form the deep underbelly that has sustained mumbai film industry. Mastram is unknown as the author figure has not been identified with or claimed by any individual so far (see the link below). In the film the authorial figure is given a face and a location. The face is of an individual named Rajaram (essayed brilliantly on the screen by Rahul Bagga) who aspired to go to JNU to pursue M.Phil but was lured by his mama to get married to 'the most beautiful girl of Himachal' and who aspired to be recognised as a man of letters, who adored personalities like Tagore and Premchand as their portraits completed the mise en scene of his study. The location is of a small nondescript town in Himachal in the proximity of Manali as we often come across Manali in written fonts on the walls whenever mastram travels in search of a publisher). He wanted to move to Delhi but remained in his muffasil town seduced by the charm of his wife and his padosan bhabhi. The narrative is non aggressive yet gripping and also attempts to map shifting contours of this genre called mastram with the change in the language, sexual vocabulary and metonymic figures (i.e. Sabita bhabhi). At this level, the bio-pic goes beyond and tries to capture the spirit rather than stays true to the world created in the pages of mastram. I here assume that Sabita bhabhi and mastram are two different constituencies of hindi porn world. I may be wrong entirely. Precisely at this stage, the question pertaining to the figure of an individual author crops up. We are often condemned to think about mastram through an individual writer yet, we can not separate it from the genre. This was a series without a given printer line. The writer directed says that it started as a journey to search this author. This may be a genuine impulse of a reader. Many of us wanted to meet and know about the author Mastram and his world from which characters emerged. We transposed these characters from our own environment to enter into the world of desire and pleasure. In this way we were also writing an obituary declaring the death of the author mastram in Barthes sense of the term. But, many of us also created our own porn stories and shared them with friends in high schools and college hostels. I remember those having 'experiences' were always respected in such gatherings and those who did not often took shelter in their creativity and imagination to impress upon our friends. The golden rule though was to make imagination look like real experience yet hotter and larger than a lived experience. A story that can be located and identified but that had to transcend the confinements and trappings of social world, that had to transcend here and now...opening a world imbued with bodies which can be made naked for the imagination. Do we need to remind that this was essentially a male field of imagination? Sabita bhabhi, i tend to believe offers an alternate terrain though. https://in.news.yahoo.com/why-i-went-in-search-of-the-erotica-writer-mastram-075627987.html?fb_action_ids=10152346840795266&fb_action_types=og.recommends&fb_ref=facebook_cb

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Sadan Jha
Associate Professor,
Centre for Social Studies.
Vir Narmad South Gujarat University Campus. Udhna-Magdalla Road.
Surat.395007 Gujarat. India.
blog: mamuliram.blogspot.com
http://www.css.ac.in/sadan_jha.html

rain water, a corner of an open plot, neighbourhood in Surat 2013


For the Sake of a Single Poem by Rainer Maria Rilke

 Ah, poems amount to so little when you write them too early in your life. You ought to wait and gather sense and sweetness for a whole lifetime, and a lone one if possible, and then, at the very end, you might perhaps be able to write ten good lines. For poems are not, as people think, simply emotions (one has emotions early enough)—they are experiences. For the sake of a single poem, you must see many cities, many people and Things, you must understand animals, must feel how birds fly, and know the gesture which small flowers make when they open in the morning. You must be able to think back to streets in unknown neighborhoods, to unexpected encounters, and to partings you had long seen coming; to days of childhood whose mystery is still unexplained, to parents whom you had to hurt when they brought in a joy and you didn’t pick it up (it was a joy meant for somebody else—); to childhood illnesses that began so strangely with so many profound and difficult transformations, to days in quiet, restrained rooms and to mornings by the sea, to the sea itself, to seas, to nights of travel that rushed along high overhead and went flying with all the stars, and it is still not enough to be able to think of all that.You must have memories of many nights of love, each one different from all the others, memories of women screaming in labor, and of light, pale, sleeping girls who have just given birth and are closing again. But you must also have been beside the dying, must have sat beside the dead in the room with the open window and the scattered noises. And it is not yet enough to have memories. You must be able to forget them when they are many, and you must have the immense patience to wait until they return. For the memories themselves are not important. Only when they have changed into our very blood, into glance and gesture, and are nameless, no longer to be distinguished from ourselves—only then can it happen that in some very rare hour the first word of a poem arises in their midst and goes forth from them.

For the sake of a Single Poem

—Rainer Maria Rilke, from The Notebooks of Malte Laurids Brigge in The Selected Poetry of Rainer Maria Rilke, edited and translated by Stephen Mitchell (Vintage International, 1989)
 
To write about here and now has always been difficult and cherished. The familiar verse (for me) is obviously "tum mere paas hote ho dusaraa nahi hota". Just read this poem and in simplicity of words and arrangement of thoughts led me to share it.
अप्रत्यक्ष के लिए
प्रत्यक्ष को अनदेखा कर
अप्रत्यक्ष को संवारने चले हैं
इस जन्म का पता नहीं

आत्मालाप
http://kavita-aatmalaap-anupamajha.blogspot.in/2014/02/blog-post.html?spref=fb
 

Thursday, August 30, 2012

Friday, May 25, 2012

"Why is she wearing blue?"
"Ahhh, may be she's going to meet her boyfriend. Blue is the colour of love. You see blue, it has its own smell, it even has a sound! It can be cool or hot--just like Love." from "Indigo: In Search of the Colour that Seduced the World" by Catherine McKinley
...a seductive reading in the spirit of its title.
"It's a saying. You see, the thing you desire with all your heart---well, don't rush for it. Don't force. You will likely find that it is not the very thing you are looking for." (from the same book).

Wednesday, May 23, 2012

आज भी फेसबुक पर उसने लाईक बटन नहीं दबाया. अब तो उम्मीद भी छुट गयी. यह सोचते जैसे ही दरभंगा के राम चौक पर छज्जू हलवाई के दूकान पर गरमा गरम सिंघारे और इमरती के दोने से अपनी आँख उठाई कि ठीक सामने उसकी वही आंखें थी. बातूनी नजर, दोष देती, झगडा करती, नोक झोंक से लब डब, अशांत, अबूझ, अनंत और अद्भुत.दुनिया की सारी मासूमियत को समेटे. बगल के पान के दूकान पर भांग के गोलों से भरी स्टील की चमचमाती ट्रे के साथ रखे रेडियो पर 'गाम घर' में खुरखुर भाई की आवाज खनक रही थी " एं येई चानो दाई हमरा ई कहू जे अहाँ कहियो फेसबुक ईमेल देखलियई की अखैन तक गोईठे पैथ रहल छी". चानो दाई छुटिते ठाई पर ठाई दग्लीह: "अहाँ के की लागैयेह जे इन्टरनेट खाली पुरुख'क बपौती छियैक. हम त ट्विटर आ माइक्रो- ब्लॉग्गिंग सेहो करैत छी, फेसबुक आ ईमेल त आब तनकपुर वाली सेहो करैत छथि. हँ..." मुहँ में फंसे सिंघारा को किसी तरह गले के अन्दर ठूंसते आँखों ने बस यही पूछा--लेकिन क्यों तुमने अचानक यह सिलसिला क्यों बंद, क्या मजबूरी, एक बार कह कर तो... उसके ओंठ हिले, "मेरा सारा का सारा एकाउंट हेक हो गया है. आई कांट एक्सेस एनी थिंग".
( रवीश और गिरीन्द्र से प्रेरित)

Tuesday, May 15, 2012

राजनैतिक कार्टून लोकतंत्र की एक कविता है

किसी भी अन्य राजनैतिक इकाई कि तरह दलितों का यह हक़ बनता है कि वे उस बात का बिरोध करें जिससे उनकी सामूहिक मानसिकता पर चोट पहुंची हो. यहाँ यह भी जोड़ देना लाजिमी हो जाता है कि दलित को या अल्प-संख्यक को किसी भी अन्य सामूहिकता के रूप में समझना भी भारतीय समाज और राजनीति को सरलीकृत करना होगा. भारतीय प्रजातंत्र में, इसके विकास में व्यक्ति और समुदाय का वही स्थान नहीं है जिस तरह वे पाश्चात्य प्रजातांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं में है. यहाँ दलितों को व्यक्ति और समुदाय के रूप में अपनी पहचान बनाने में समय लगा है. इसके लिए जूझना पडा है. सैद्धान्तिक समता के वादे के बाबजूद, यहाँ कि धरती पर हर कोई समान नहीं है. इतिहास ने और वर्ण व्यवस्था ने हर किसी को समान अतीत नहीं दिया, न ही सपने दिखने के लिए वर्तमान कि समतल जमीन. ऐसे में रास्ट्र के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह दलितों का अल्प संख्यक का उनके मान का ख्याल रखे. यदि चंद बड़े वाकिया को नजर अंदाज कर दें तो कमो-वेश भारतीय रास्ट्र राज्य अपनी ऐसे छवि पेश करने में सफल होता नजर भी आता है जहां वह दलितों और अल्प संख्यक के रक्षक कि भूमिका में आये.
यह छवि भ्रामक है या सत्य यह मेरे ज्ञान के बाहर कि बात है. लेकिन यह छवि मन मोहक है, मध्य वर्ग के लिए, भद्र लोक के लिए. और, यही सरकार के लिए, लीडरानो के लिए इक्छित भी है. उनके सहूलियत के लिए, सरकार चलाने कि सहूलियतों के लिए. व्यंग इसमें मारक साबित होता है.
यह दो-धारी तलवार नहीं है. यह कुछ ऐसा अनाम हथियार है जो अलग अलग दिशाओं में आघात करता है. इसके अर्थ अक्सर ही दिशा हीन हुए बिना ही अनेक तरफ से मार करते हैं. व्यंग कि मार बहुत घातक होती है. कई दफे तो बे-आवाज होती है. शायद यह कारण भी व्यंग जातियों पर नियंत्रण रखने का एक पुराना और असरदार तरीका रहा है भारत में. अनेकों निचली जातियों और सामजिक पायदान पर नीचे के वर्गों के लिए तरह तरह के जातीय पहेलियाँ और दोहे रहे हैं जिनमें उन्हें नीचा दिखाया जाता रहा है, व्यंग के माध्यम से. यहाँ उनपर विस्तार से जाना अवांछित होगा लेकिन जो इतिहास जानते हैं और भारत में जातियों पर हुए काम से, लोक मुहावरों से जुड़े दस्तावेजों से वाकीफ हैं उनके लिए यह कोइ नयी बात नहीं. व्यंग में सामजिक वर्ग को मुर्ख के रूप में, हंसी के पात्र कि भूमिका में दिखाए जाने का रिवाज आज भी जम कर प्रचालन में है. आधुनिकता और नगरीकरण के दौर में  इनमें से अधिकतर माइग्रेंट समुदायों पर होता है सरदार के उपर, बिहारी के ऊपर. शहर में गाँव से आये हुए के ऊपर और गाँव में शहर से आये हुए लाट साहब के ऊपर.
भारतीय समाज में व्यंग कि राजनीति को समझने के लिए यह सामाजिक पृष्ठभूमि मानीखेज हो जाता है. बिना इस ओर गौर किये हम दलितों के उस बिरोध को नहीं समझ सकते हैं जिसके कारण सरकार को यह एलान करना पडा कि वह एन सी ई आर टी पाठ्य पुस्तक से शंकर के बनाए एक ख़ास कार्टून को हटा दे. इसी सामाजीक पृष्ठभूमि के कारण मैं उनसे भी सहमत नहीं जो इस पुरे प्रकरण को चुनावी राजनीति और संख्याओं के जोड़-तोड़ का हिस्सा भर देखते हैं जहां दलित महज संख्या भर हैं और कांग्रेस का मायावती के रुख पर प्रतिक्रया देना चुनावी गणित भर.
राजनीति के दाँव-पेंच और पार्लियामेंट में सत्ता पक्ष के जबाव के पीछे झांकती लाचारगी और दलित समाज को खुश करने के सच्चे इरादे जैसे तर्कों से बाहर निकलने में व्यंग का यह सामजिक पक्ष हमे मदद करता है. यह हमे उस तरफ ले जाता है जहां से हम देख सकते हैं कि दलित जो सदैब ही उपेक्छित रहे हैं उन्हें अपने सबसे बड़े नेता का कार्टून में परिवर्तन क्यों कर नागवार गुजरा.
लेकिन सवाल महज इस एकलौती घटना का नहीं है. सवाल यह भी नहीं कि शंकर के उक्त कार्टून का अर्थ वही है या नहीं जिसे २०१२ में दलित बिचारक या राजनेता लगा रहे हैं. आखिर कौन तय करेगा कि कार्टून का अर्थ क्या हो? एक बड़े प्रख्यात विश्लेषक ने चित्र को देखते हुए सवाल किया था कि 'चित्र क्या चाहती है?' तो यह कौन कहेगा कि फलां कार्टून क्या चाहता है? यदि इस सवाल को अनंत काल तक टाल  भी दें तो भी यह तो दिखता ही है कि हाल कि यह घटना कोई असम्पृक्त उदहारण तो है नहीं. कुछ ही दिन पहले ममता बनर्जी इसी तरह आहत हुई थी और एक प्रोफेस्सर के बिरुद्ध कार्रवाही कि खबर मीडिया में विचरती रही. उससे थोड़े पहले कि बात है जब नरेन्द्र मोदी के कार्टून के कारण एक और कार्टूनिस्ट को मुश्किलों का सामना करना पडा था. यदि चंद बरस पीछे जाएँ तो मोहम्मद साहेब के कार्टून के कारण बहुत बबाल खडा हुआ था. ये सभी अलहदा से लगने वाले राजनैतिक चौखटों से आने वाले प्रकरण हैं. यदि कुछ जोड़ता है तो वह है कार्टून के प्रति बढती असहिष्णुता.
यह आज के समय में राजनीति के प्रकृति कि तरफ भी हमे ले जाता है जहां पवित्रता के नए मानक गढ़े जा रहे हैं. जहां एक ओर आज गणेश और बाल हनुमान अपने अनगिनत कार्टून छवियों में बच्चों के दोस्त बन चुके हैं वहीं एक भी राजनैतिक का हमारे जीबन से मनो-विनोद का नाता नहीं है. चाचा नेहरु भी तो बहुत अरसे से बच्चों के चाचा नहीं रहे. राजनीति में पवित्रता को लेकर एक भय का माहौल है, एक किस्म कि कमजोरी जाहिर करता या फिर उन्माद का रवैया. यह सहज तो बिलकुल ही नहीं. अबोध होने का तो खैर सवाल ही नहीं उठता.   
एक समाज विज्ञानी ने कहा है कि हम ऐसे समय में रह रहे हैं जिसे समाज विज्ञानं का 'पिक्टोरिअल टर्न' कहा जा सकता है. हमारे दैनिक जीवन में दृश्य की, चित्र की भागेदारी असीम रूप से बढ़ चुकी है और इसी सन्दर्भ में उन्होंने समाज विज्ञान के समकालीन रुझान कि ओर हमारा ध्यान दिलाया. यहाँ गौर तलब हो कि सत्तर का दशक समाज विज्ञानं के भाषी रुझान के लिए जाना जाता है.
खैर जो भी हो, एक बात तो यह साफ़ उभर कर आती है कि दृश्य के संभाव्य को लेकर हमारे विद्वान् इतने लापरवाह क्यों कर हो गए. या फिर इस संभाव्य को महज बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया है. लेकिन यहाँ यह ध्यान रखना होगा कि व्यंग और कार्टून हमेशा ही अर्थों के बाहुल्य से परिभाषित होता है. तो ऐसे में इस बाहुल्यता का कोई कितने हद तक अंदाज लगा सकता है. राज्य और सरकार के लिए यह एक दुसरे तरह कि चुनौतियां लाता है. विद्वानों ने बताया है कि आधुनिक राज्य और विज्ञान दोनों एक दुसरे पर निर्भर होते हैं. दोनों के लिए जानकारियों की, ज्ञान की, अर्थों की साफगोई, एकरूपता, सर्व-भौमिकता और परि गुनन्ता ( क्वान्तिफिकेसन) जरूरी है. इसके बिना आधुनिक प्रशासन, राज्य-निति नहीं चल सकती. तो ऐसे में जब कार्टून वांग का ऐसा रूप लेकर आता है जिसको नियंत्रित नहीं किया जा सके तो जाहिर है वह सत्ता को विचलित तो करेगा ही. दृश्य के जादू से पूरी तरह अवगत इस वर्ग के लिये कार्टून व्यंग और चित्र का ऐसा अनोखा नुकशा बनकर आता है जिसका इलाज उन्हें एक मात्र सेन्सर शिप और कार्टूनकारों पर डंडे बरसाने में नजर आता है. वे यह नहीं समझते कि राजनैतिक कार्टून लोकतंत्र की एक कविता है. जिसतरह कविता में अनुभव का वह हिस्सा भी शेष रह जाता है जिसे विज्ञानं छटपटाते रह जाने के बाबजूद भी ज्ञान में प्रवर्तित नहीं कर पाता. उसी तरह कार्टून वह चित्र है जहां व्यंग को सत्ता और सरकार भिन्नता की (डिसेंट की) जानकारी के रूप में सरलीकृत नहीं कर सकते. यह गवर्नेंस के तर्कों से परे जाता है. अपने अर्थों के बाहुलता में अपने डिसेंट के धार दार औजार  के कारण लोकतंत्र के समृद्धि कि पहचान है कार्टून.





Saturday, December 17, 2011

भीड़, जनसमुदाय और राजनीति: अन्‍ना के बहाने

अरे रे राष्ट्रियश्‍यालक! एह्येहि स्‍वस्‍याविनयस्‍य फलमनुभव। (तत: प्रविशति पुरूषैरधिष्ठित: पश्चाद्‍बाहुबद्ध: शकार:।) {अरे, राजा के शाले! आओ आओ, अपनी धूर्तता का फल भोगो। इसके बाद लोगों द्वारा पकड़ा गया, पीछे बन्धे हुये हाथों वाला शकार प्रवेश करता है।)} दशम् अंक, शूद्रक कृत मृच्‍छकटिकम्, अनुवाद, जयशंकरलाल त्रिपाठी।

02261550789 is no Pe ap miss cal dijiye. ye kiran bedi ka lokpal bill implement krne k liye vote h. 25 crore pple support chahiye Received: 10:53:20am 20-08-2011 From (no name) +919015456543


मृच्‍छकटिकम् का संस्‍कृत के नाट्य-साहित्‍य में अद्वितीय स्‍थान है। चारूदत्त और वसंतसेना के प्रेम के लिये विख्‍यात इस नाटक को कम लोग राजनैतिक ऊथल-पुथल के उस पृष्ठभूमि के लिये याद रखते हैं जो नेपथ्य में चलता है। साथ ही, प्राकृत का आधिक्य इस नाटक के भाषा को अत्यंत स्‍वाभाविक रुप से समकालीन जन-मानस से जोड़ता है। किसी भी दूसरे संस्‍कृत नाटक में शायद ही इतने प्रकार की प्राकृत का उपयोग हुआ हो। किंचित ही समाज के भिन्‍न-भिन्‍न तबकों का इस कदर प्रतिनिधित्‍व हुआ हो। मृच्‍छकटिकम् में शकार राजा का बिलासी, भ्रष्‍ट और आततायी साला है जिसे ऊपर उल्‍लिखित दशमे अंक में लोगों (पुरुषैरधिष्‍ठित) ने पकड़ा है। मेरे लिये यह दृश्य मानीखेज है। यूं तो राजा को मारने में शार्विलक, जो एक चोर है, का साहस और पराक्रम काम आता है लेकिन लोगों की भीड़ ने ही शकार को पकड़ा। मुझे और कोई नामचीन उद्धरण का ध्‍यान नही आता जब प्राचीन भारत में या फिर मध्‍यकाल में भी लोगों, जनता को सत्‍ता समीकरण बदलने में सक्रिय भूमिका अदा करते दिखाया गया हो। यही मृच्‍छकटिकम् को राजनीति के अध्‍ययन के लिये महत्‍वपूर्ण बनाता है।
मेरे लिये सवाल यह है कि लोगों के इस भीड़ को कैसे देखें? दूसरे शब्‍दों में हम किसी जन-समुदाय के राजनीतिक चरित्र का आकलन किन रुपों मे करें? यह अटपटा लग सकता है कि जहां एक ओर राजनैतिक इतिहास षडयंत्रों, बगावत, क्रांति, विद्रोह और आंदोलनों से भरा परा है बहुत कम लोगों ने जनता के इस समुह की ओर ध्‍यान दिया है। अधिकांशत: विद्वानों ने सामुहिकता को विचारधारा के इतिहास या फिर उसके धार्मिक उन्‍मादों के तराजू से ही तौला है। ऐसे में एक इतिहासकार जिसका जो अपनी जमात से अलग नजर आता है वह है जार्ज रुदे। फ्रांसिसी क्रांति के समय के भीड़ के अध्‍ययन से इन्‍होने यह खंडित किया कि भीड़ सदैव ही किसी बाह्य कारकों या उद्देश्‍यों के प्रभाव में आकर क्रांति में हिस्‍सा लेती है। यहां गौरतलब है कि इनसे पहले विद्वानों की एक पूरी जमात भीड़ को नकारात्‍मक अंदाज में ही देखती रही। जैसे कि एडमंड बूर्के ने 1789 में वर्साय के किले पर हल्‍ला बोलने वाली भीड़ को हत्‍यारों, अपराधियों और रक्त-पिपासू लफंगों का मिला-जुला रुप कहा था।
भीड़ का नकारात्‍मक चरित्र महज फ्रांसिसी विद्वानों या क्रांति के पृष्ठभूमि तक सीमित हो ऐसा नहीं है। भीड़ को लगभग हर देश में गलत नजरिये से ही देखा जाता रहा है। इसके दो मुख्‍य कारण हैं। पहला भीड़ के प्रति हमारी अज्ञानता को लेकर है। हम भीड़ के बारे में बहुत कम जानते हैं। भीड़ के बारे में सदैव ही हमसे अधिक हमारी सरकारें और प्रशासन जानती है और हम अक्‍सर ही उनके बताये सूचनाओं और उनके सुझाये नजरिये पर बिना सवालिया निशान लगाये अपना लेते हैं। यह हमारे लिये सुविधाजनक भी होता है। इसलिये भी शायद भीड़ के अध्‍ययन को कमोबेश इतिहासकारों ने भी नजर अंदाज किया है। रुदे ने भी कहा है कि लीडरानों और वैचारिक अगुओं के विपरीत ( जो अपने पीछे लिखित पोथियां, लेख और दस्‍तावेज छोड़ जाते हैं) इतिहास में भीड़ अपने पीछे शायद ही कुछ लिखित इबारत छोड़ता था। यदि कुछ बचा रह जाता तो वह था पुलिसिया दस्‍तावेज जिनको नये सिरे से पढ़ने की जरुरत शेष रह जाती है। औपनिवेशिक भारत के संदर्भ में इन्‍ही दस्‍तावेजों के अनूठे विश्‍लेषणों के द्वारा उपाश्रयित इतिहास के अध्‍येताओं जैसे रंजित गुहा ( संथाल विद्रोहों के संवंध में) और शाहिद अमीन (चौरी-चौरा के ऊपर) ने भीड़ को देखने का नया अंदाज प्रदान किया जिसपर चर्चा करना इस छोटे से आलेख में संभव नहीं है।
भीड़ के प्रति नकारात्‍मकता का दूसरा कारण ( जो पहले से बहुत मिलता है) है भीड़ का भय। गौर तलब हो कि यह इस खौप का स्रोत भीड़ की गतिविधियों और उसकी कारगुजारियों के बजाय उसके तथाकथित उन्‍मादी सामर्थ्‍य में निहित होता है। इस रुप में भीड़ का परिचय अक्‍सर ही उसके संभाव्‍य, उसके कर-गुजरने की क्षमता से तय होता है दूसरे शव्‍दों में भीड़ के उपर हमेशा ही आशंकाओं के बादल चिपके रहते हैं जो हमे भीड़ से खौपजदा किये दूर रहने की नसीहत देते रहते हैं। लेकिन खौप किसके लिये? कौन है जो नसीहत देता है हमारे अपने मन की विथियों में छुपकर। यह भय स्‍थापित मान्‍यताओं के रक्षकों, सत्‍ताधारियों और समाज के कुलीनों के द्वारा पैदा की जाती है और वही भीड़ के चाल से पहले ही भीड़ को खलनायक बना डालते हैं। लेकिन यही सत्‍ता विरोध भीड़ को मूल रुप में उसका राजनैतिक चरित्र भी प्रदान करती है। यहां भीड़ का समुहवाद लोकवाद(populism) और राजनैतिकता(political) दोनो की सीमाओं को एक दूसरे से जोड़ता है.भीड़, लोकवाद और राजनैतिकता के इस घाल-मेल के सहारे मैं हाल के अन्‍ना हजारे के अनशन और जनलोकपाल बिल से संवंधित आंदोलन (अगस्‍त 2011) के कुछ पहलुओं से जुड़े सवालों को रेखांकित भर करने का प्रयास करुंगा। लेकिन आलेख का बृहतर उद्देश्‍य भीड़ के राजनैतिक चरित्र और उस नजरिये की पड़ताल करना है जहां सामुहिकता (खासकर अनियंत्रित) भय का स्रोत बन जाती है।
जैसा कि मैंने उपर जिक्र किया, जन-समुदाय के सामुहिकता के प्रति नकारात्‍मक रुख के पीछे एक बड़ा कारक उसके नियंत्रण का मसला है, बस्‍तुत: शासन का मसला। यहां मिशेल फूको का ग्‍वर्मेंटालिटी के उपर दिये गये प्रख्‍यात लेक्‍चर का उल्‍लेख करना चाहुंगा। इनहोने कहा है कि अठारहवीं सदी से यूरोप में सरकार, जनसंख्‍या और पोलितिकल इकोनोमी तीनों एक दूसरे से गुत्‍थम गुत्‍थ हो गये। ये तीन प्रांत (teritory), जनता और अर्थ-व्‍यवस्‍था के एकीकृत संरचना के रुप में दिखाई पड़ते हैं। फूको के ग्‍वर्मेंटालिटी में तीन बातें हैं:
1. संस्‍था, कार्यविधी, विविचना और टिप्‍पणियां(रेफलेक्‍शनस्),गणना और टैक्‍टिक्‍स का सम्‍मिलन जो सत्‍ता के इस तरह के अनोखे लेकिन संश्‍लिष्‍ट रूप के कार्यान्‍वयण की अनुमति दे, जिसका मुख्‍य टारगेट जनसंख्‍या हो, ज्ञान की मुख्‍य संरचना पालिटिकल इकोनामी हो, और सुरक्षा के तंत्र जिसके प्रधान तकनीकि साधन हों।
2.वह रुझान जिसने, लंबे अरसे से और समूचे पश्‍चिम में, सतत रुप में अन्‍य सभी रुपों ( संप्रभूता, अनुशासन आदि) के उपर ऐसे सत्‍ता रुप का वर्चस्‍व बनाया जिसे सरकार का नाम दिया जा सकता है, जिसके परिणामत: जहां एक ओर खास खास तरह के एक समूचे सरकारी तंत्र की स्‍थापना हुई, वहीं दूसरी ओर, अपनी पूरी संश्‍लिष्‍टिता के साथ ग्‍यान-तंत्रों (saviors) का विकास भी हुआ।
3.वह प्रक्रिया, या फिर प्रक्रियाओं का परिणाम, जिसके द्वारा पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में मध्‍य युगीन न्‍याय प्रशासनिक राज्‍य में तबदील हो गयी और क्रमश: सरकारीकृत (ग्‍वर्मेंटलाइज्‍ड) हो गयी।
फूको से प्राप्‍त अंतर्दृष्‍टि के आधार पर हम कह सकते हैं कि यह लोगों का शासन के ईकाईयों में तबदील हो जाने का इतिहास है। यहां उनका आत्‍म एक सर्वथा नये अवतार में आकार ले रहा है। यह जन-समुदाय का एक ऐसे भीड़ में कायान्‍तरण है जिसका एक ही संदर्भ शेष रह जाता है उसे कैसे नियंत्रित किया जाय( सत्‍ता के अनुरुप या सत्‍ता के विरुद्ध)।
इस नजरिये से देखने पर यह बहुत मुश्‍किल नही है कि पूरे औपनिवेशिक काल में जन-आंदोलनो को किस तरह सरकार प्रशासनिक जद्‍दोजहद के तौर पर देखती रही (हालांकी हमे यह ध्‍यान रखना होगा कि उपनिवेश की सरकार और यूरोपीय सरकार के बीच कई आमूल अंतरें हैं जिन्‍हे पाटना सरलीकृत होगा लेकिन जिनके विस्तार में जाना यहां संभव नहीं है)। दूसरी ओर इसी समुदाय का उपयोग राष्‍ट्रवादी नेतागण सरकार के खिलाफ कर रहे थे और इसमे क्रांति की, आजादी की संभावनाओं को सफलतापूर्वक नियोजित किया जा रहा था। नियोजित इसलिये भी कि महात्‍मा के लिये यह कई अर्थों में आत्‍म का नियोजन भी था जिसके बहुतेरे आयाम ऐसे भी थे जो फूको के उस सरकारी आत्‍म से (जिसका विलय ईकाईयों में हो चुका था) दो-चार हाथ करने को उतावले थे और जिन्‍हे पश्‍चिमी योरप के शासन के खांचे से गांधी बाहर लाना चाहते थे। शायद यह भी एक कारण था कि महात्‍मा किसी भी जन-आंदोलन से पहले स्‍वयंसेवकों की तैयारी पर बहुत बल देते थे। लेकिन यहां यह उल्‍लेख कर देना लाजिमी होगा कि अहिंसा के तमाम आग्रहों और तैयारी के बाबजूद भी कोई भी गांधीवादी आंदोलन हिंसक वारदातों से अछूता नहीं रह पाया। खैर, भारत ने आजादी पायी और शुरू के दिनो से ही भीड़ सरकार के लिये सिरदर्द बना रहा। विभाजन के दौरान की हिंसा में इस भीड़ का योगदान दिल-दहला देने वाला रहा। इसे सांप्रदायिक उन्‍माद कह कर हम क्रांतिकारी सैलाव से दूरी बना सकते हैं लेकिन जल्‍द ही यह स्‍पष्‍ट हो गया कि भीड़ का जो परिचय फूकोवादी सरकारी तंत्र पश्‍चिमी योरप अपना रहा था, नवस्थापित भारतीय लोकतंत्र के लिये भी वही अपरिहार्य हो चला था। 1955 के अगस्‍त में पटना में छात्रों के एक दल से बात करते हुये नेहरू ने साफ किया कि गलत हो या सही, राजनीति के नाम पर प्रदर्शनों में भाग लेना और हुड़दंग (hooliganism) मचाना किसी भी देश के विद्दार्थी के लिये उचित नहीं है। मामला एक घटना का था जब अगस्‍त के महीने में ही पटना के बी. एन कालेज के छात्रों और राज्‍य परिवहन विभाग के कर्मचारियों के बीच के छोटे से तनाब ने पूलिस फायरिंग का रुप ले लिया। जबाब में उस साल के स्‍वतंत्रता दिवस उत्‍सव पर राष्‍ट्रीय झंडे की अवमानना की रपटें आयीं, छात्रों और पूलिस के बीच झरपें हुयीं और छपरा, बिहारसरीफ, डाल्‍टेनगंज तथा नवादा में काले झंडे का प्रदर्शन किया गया।
इस घटना को और नेहरु की प्रतिक्रिया को कई तरह से देखा जा सकता हैं। हिंसा की वारदातें, पूलिस और छात्रों के बीच झरप, झंडे का अपमान आदि के ईर्द-गीर्द भीड़ के राजनीतिक स्‍वरुप और राज्‍य के जवाब का आंकलन किया जा सकता है। लेकिन जो तार यहां से निकल कर दूर तक जाते हैं वह है भीड़ के प्रति राज्‍य का असहज रवैया। अन्‍य कई मौकों पर नेहरु ने सत्‍याग्रह, अनशन और धरने के कुछ ही साल पहले के चिर-परिचित तरीकों से साफ तौर पर अपनी असहमति जतायी। उन्‍होने कहा कि यद्दपि वे यह नही कहते कि कोई कभी भी सत्‍याग्रह न करे। लेकिन दैनिक समस्‍याओं को लेकर, चाहे वह राजनैतिक हो या औधोगिक या श्रमिकों का, अनशन या सत्‍याग्रह जायज नहीं है। एक आजाद राष्‍ट्र जो प्रगति के पथ पर है और जो अब नौसिखिया नही रह गया, उसे नये तरह से काम करना होगा। हमें इन तरीकों को छोड़ना होगा। क्‍या हम देश में गृह युद्द (सिविल वार) छेड़ना चाहते हैं। यह बेतुका है।
बहुत अर्थों में नेहरु की ये पंक्तियां आने वाले दशकों में भीड़ के प्रति या किसी आंदोलन के प्रति एक सशक्त स्‍वर के रुप में काम करती दिखती है। अभी हाल के अन्‍ना हजारे के नेतृत्‍व में हुए जनलोकपाल विधेयक लाओ के बहाने भ्रष्‍टाचार बिरोधी आंदोलन की आलोचना में यह नजरिया बहुत प्रमुखता से मुखरित हुआ।
आगे बढ़ने से पहले यह साफ कर देना जरुरी है कि इस लेख का उद्धेश्‍य जनलोकपाल आंदोलन के गुण-दोष का विवेचन करना कतई नहीं है। न ही लेखक सरकार के रवैये का विश्‍लेषण करना चाहता है। इस लेख में आंदोलन की आलोचनाओं के जरिये भीड़ को देखने के नजरिये की पड़ताल भर की गयी है। यह भीड़ रुदे के फ्रांसीसी क्रांति के भीड़ से बहुत भिन्‍न भी है यह जनता औपनिवेषिक काल के जन-समुदाय से भी अलग है। यहां नयी मीडिया के अनेकानेक माध्‍यम इस भीड़ के बनने और इसकी छवियों के निरुपन में सीधे सीधे सक्रिय रहे। इस तरह जहां एक ओर औपनिवेशिक भीड़ के निर्माण में प्रिंट और मौखिक जगत का बड़ा योगदान रहा सन् 2011 के भीड़ में इलेक्‍ट्रानिक माध्‍यमों (यथा टेलीविजन), इंटरनेट पर नया नया विकसित सामाजिक स्‍थान (यथा फेसबूक और ट्‍वीटर) तथा मोवाइल नेटवर्क ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। लेख के आरंभ में उल्‍लिखित एस. एम.एस ऐसी ही नवीन तकनिकियों का एक उदाहरण है।
इन नवीन तकनीकियों के कारण ही आंदोलन के शुरु में सरकार और आंदोलन के आलोचकों का बड़ा वर्ग यह मानता रहा कि जनलोकपाल आंदोलन के समर्थक महज फेसबूक, ट्‍वीटर, टीवी और एस.एम.एस तक ही सीमित रहेंगें। उनके आंकलन में यह भीड़ एक दिजिटल भीड़ के सिवा कुछ न था। लेकिन वे गलत सिद्द हुये। लोग जुटने लगी, भीड़ सुरसा रुप लेने लगी। ऐसे में इतिहास से वाकिफों के लिये यह सोचना लाजिमी ही था कि यह भीड़ जल्‍द ही हिंसक हो उठेगी और हुड़दंग को नियंत्रित करना जहां आंदोलन के कर्ता-धर्ता को असंभव होगा वहीं यह सरकार के लिये नियंत्रण का और आंदोलन को समाप्त करने का आसान तरीका रह जायेगा। पर यह शायद ही किसी को यकीन रहा हो कि भीड़ ने न मात्र डिजिटल सीमाओं का बड़ी तादाद में उल्‍लंघन किया वरन् इस भीड़ ने इतिहास को झुटलाते हुए स्‍वयं को पूर्णत: अहिंसक बनाये रखा, एक एसा उदाहरण जो महात्‍मा के सपनों में था लेकिन जिसे वे भारत में खुद कभी देख नही सके ( हां दक्षिण अफ्रिका में उन्‍होने कु्‌छ हद तक सफलता जरुर पायी थी)।
भीड़ का अहिंसक बने रहना आलोचकों के लिये परेशानी का सबब था। एक ओर जहां नेहरू की भाषा (जिसमे सत्याग्रह और अनशन को खारिज कर देश की प्रगति का बाधक बनाया गया था) की अनुगुंज सुनायी दे रही थी वहीं आंदोलन को संविधान, प्रजातंत्र और संस्‍थान-विरोधी के रुप में देखा जा रहा था। लेकिन शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगो के लिये जनता के समर्थन की मांग को गैर-कानूनी या गैर- संविधानिक करार देना मुश्‍किल था। ऐसे में आलोचना का एक वर्ग खासकर बामपंथी बुद्धिजीवियों के बीच भीड़ के अंदेशे को सामने लेकर आया। यहां भीड़ को उसके मध्‍यवर्गीय चरित्र, उसके शहरी होने और सबसे ऊपर उसके संकुचित उद्धेश्यों को लेकर आलोचना का शिकार बनना पड़ा। जाने माने राजनीतिक विश्‍लेषक पार्थ चटर्जी के अनुसार यह भीड़ उन नौजवानो की थी जिसके परिजन उसी भ्रष्‍ट सरकारी तंत्र के हिस्‍से रहें हैं जिनका विरोध आंदोलन में किया जा रहा है।भारत के भ्रष्‍ट लोग रामलीला मैदान के भीड़ के ही रक्त संवंधी हैं। लेकिन यह कहना बेकार है कि यहां कोई आपको ऐसा मिले जिसे यह स्‍वीकार हो। अर्जुन अप्‍पादुरई के शव्‍दों में यह आंदोलन कुछ हद तक एक क्‍लाशिक माश-फासिस्‍ट फैंटेसी है जहां हमारे पैरेड, युद्ध और भाषण नैतिक रहते हैं लेकिन दुश्‍मन के वैसे ही प्रयास राजनैतिक और शैतानी शक्‍ल अख्तियार कर लेते हैं। यह राजनीति के खिलाफ लड़ाई है लेकिन यह जनता के नाम पर और न मात्र राजनीति के बरन् नौकरशाही के खिलाफ भी लड़ा जा रहा है।लेकिन ऐसे में जब हर किसी का दोस्‍त, सगा-संवंधी नौकरशाही का अंग हो तो यह लड़ाई हमारे खुद के भीतर की हो जाती है जिसे उनके खिलाफ पुन: मंचित(re-staged)किया गया है। ये आलोचनाएँ लोकवाद और राजनैतिकता(पोपुलिस्‍ट और पोलिटिकल) के रोचक संवंधों की ओर ले जाते हैं जिनके विषय में अरनेस्‍ट लकलाउ का लेखन सहायक हो सकता है। पोपुलिस्‍ट और पोलिटिकल के अंतर पर बल देते हुये पार्थ चटर्जी लिखते हैं कि पोपुलिस्‍ट आंदोलन महज इसी कारण स्‍वीकृति के अधिकारी नही बन जाते कि उन्‍होने बड़े जन-मानस का जुगाड़ कर लिया है। यह वक्तव्‍य जहां किसी आंदोलन को उसके निहितार्थ, उद्धेश्‍यों के आधार पर परखने की नसीहत देता है वहीं यह प्रश्‍न भी छोड़ता है कि किसी जन-आंदोलन को, जिसने जनता के बीच खासी लोकप्रियता अर्जित की हो उसे किन आधारों पर आलोचित किया जाय। इस विन्दु पर मुझे लगता है कि इन आलोचनाओं का एक अहम हिस्‍सा एक किस्‍म के भय से ग्रस्‍त दिखता है। यह भय है बहुलतावादी राजनीति का। भीड़ के सांप्रदायिक हो जाने का। यह भय है 1960 के दशक के मराठी मानूस से जुड़े आंदोलनो का, 1992 के बाबरी मश्‍जिद के ध्‍वस्‍त होने के बाद के भीड़ का भय। यह वही भय है जो किसी जन-समुदाय को भीड़ में तबदील कर उसे संदेह के घेरे में डाल देती है। यह भीड़ के बे-काबू हो जाने का भय है। यह भय अकारण नहीं है। लेकिन क्‍या कभी कोई भीड़ किसी एक बिचारधारा में बंधी रही है? शाहिद अमीन ने चौरी-चौरा के अध्‍ययन में दिखाया है कि भीड़ और उसके अक्‍श हमेशा अनेकानेक कारकों से बनी होती है। यह किसी भी सरलीकृत तर्क और एकीकृत वैचारिक चौखटे में नही कसा जा सकता है। ऐसे में भीड़ की आलोचना उनके बैचारिक रुझानों के आधार पर करना कहीं भीड़ में अपनी इच्छाओं की तलाश तो नहीं?

(यह निवंध लोकमत समाचार के दीपभव में 2011 प्रकाशित हो चुका है)।

Monday, October 10, 2011


Copyright 2008-2011, South Asian American Digital Archive (SAADA) 
Description: The April 1924 issue of the United States of India (Vol. 1, No. 9) published from the headquarters of the "Pacific Coast Hindustani Association" at No. 5 Wood Street, San Francisco featured an article by M.N. Roy, founder of the Socialist Party of Mexico and member of the Comintern. The essay, titled "India and the British Labor Government," traces the effects of the British Labor Party coming into power on India and the rest of the British imperial sphere. The opening editorial draws connections between the U.S. and India: "American history is being repeated in India. Today India is a poor, weak, and subjected country. She is practically England's private property," and later, "Americans, do not think for a moment that it is none of your business if England exploits the heathen Hindoos."
http://www.saadigitalarchive.org/item/20110919-370

Thursday, August 25, 2011

क्या हाल बना रक्खा है मेरे प्रणव दा का!

कहाबत है, "खाए भीम हगे शकुनी" भीम ने तपस्‍या कर यह वरदान मांगा कि मैं जो कुछ भी खाऊँ वह पच जाये लेकिन सुबह अपने मूल रुप में शकुनी के मलद्वार से निकले। तथास्‍तु! फिर क्‍या था भीम भिन्‍न भिन्‍न आकार-प्रकार के पदार्थों को खाने लगे और शकुनी के कराहने का कोई अंत न था। यही हाल अभी है। गलती पर गलती कोई करे और सुलह करने संभालने के लिये बेचारे प्रणव दा को आगे कर दिया जाता है। राजा और कनीमुजी को संरक्षण कहीं और से मिला लेकिन जब संकट गहराया तो प्रणव दा चेन्‍नई भेजे गये, कोलकत्ता भेजे गये।

अर्जुन सिंह जो अस्‍सी के दशक में कर रहे थे अब वह काम प्रणव दा के कंधे पर आ गया है। लेकिन पुरस्‍कार क्‍या मिलेगा? पहली बार जब प्रधान मँत्री बनने की बात आयी तब उन्‍ही से घोषणा करबाया कि मनमोहन देश के कर्ता होंगे। ये तो वही बात हुई कि जिससे जिंदगी भर ईश्‍क किया उसी को दोस्‍त के लिये प्रपोज करना पड़ा। दूसरी बार तो किसी ने पूछा तक नही। अगली दफा तो राहुल के लिये सुरक्षित है।

फिर प्रणव दा की उम्र भी तो हो चली है। कबतक इतना बोझ उठाते रहेंगे। मनमोहन पहले ठोक पीट कर चिट्‍ठी लिख देते हैं फिर कहते हैं कि सुलह करो लेकिन मेरे लिखे लकीर की मर्यादा रखना भी तुम्‍हारा ही काम है। क्या हाल बना रक्खा है मेरे प्रणव दा का!