Thursday, April 27, 2017

Streets: London 2012

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Streets: London 2012.

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एक आधी खुली खिड़की: महात्मा गांधी के जन्मस्थान पोरबंदर में

एक आधी खुली खिड़की: महात्मा गांधी के जन्मस्थान पोरबंदर में । उनके घर के पहली मंजिल पर जहां जाने के लिये आपको काठ की सीढियां बेहद सावधानी से चढ़कर जाना होगा। आधी खुली खिड़की जिससे महात्मा के घर कोई भी फांदकर आने की जहमत क्योंकर करे? कोई भी आ जाये और इस घर को बहुत परिचित ही बताने लगे। आखिर हर किसी का हक भी तो ठहरा।पर, फिर भी तारीख की कवायद से पड़े यह खिड़की ताकीद करती रहेगी कि वह आधी ही खुली थी।
देर से: मेरी एक प्यारी सी भतीजी है लखनऊ में रहती है और पता नहीं कब कैसे पर बापू से बहुत लगाव है उसे। पोरबंदर आने का उसका बहुत मन है और संयोग बन नहीं पा रहा। तो आज जब हमें पता चला कि सोमनाथ से द्वारका के रास्ते पोरबंदर से गुजरते हैं तब से कीर्ति मंदिर जो गांधी जी का जन्मस्थान हैं वहां तक उस छोटी सी भतीजी का ख्याल उतना ही आह्लादित करता रहा जितना मन गांधी जी को याद कर रहा था। फेसबूक लाइब भी उसी को ध्यान में रखते हुए साझा कर रहा था। बहुत कुछ है कहने सुनने को पर एक गली जिससे होकर हम वहां तक पहुंचे, मेरी भतीजी श्रेयसी और इस अधखुली खिड़की के बंद/खुले समय और संभावनाओं के नाम...

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पौने तीन पांतिक गाम

पौने तीन पांतिक गाम

कतेक रास कविता लिख देलक ललटुनमा,
नै भास भेटलै आ नै सोझरौल आखरे,
तैयो लिखैत रहल कविता पर कविता अपने ललटुनमा।
सत्ते कहै छी यैह पिपराही बाली ललमुनिया कनिया'क भातिज, ललटुनमा।
आ वैह दुरुखा कात कोन मे दबकल रहैबला ललटुनमा।
बहुतो बरख सं पढैत रहल ओ कविता आ चौपाई
दोहा आ सोरठा अप्पन गाम पर
लिखलाहा आखर लेकिन अनकर
बताह जेंका ओना मासी धंगैत तकैत रहल महराजी पोखैर परहक भालसरिक छाहैर तर सुसताइत बहलमान आ
पूबरिया महार पर नदी फिरैत ननकिरबीक फोटो
शाह पसीन दिस तकैत ललटुनमाक नोरैल आंखि जाहि सं दहो बहो गंगा जमुना बहैत अप्पनहिके तकैत रहल गामनामक कवित्त मे
लेकिन नै भेटबाक जे
शाह पसीन होय या अप्पन गाम
नहिये ने सुझाइत छैक।
बहुत रास लिख देला सं यदि भेटैक रहितै त
कनटोपा लॉटसाहेब के
भेट गेल रहितैक सौंस गाम।
अधहो आखर नै बेसी नै कम
भेटलै पौने तीन पांतिक गाम।
( कविता दिवस पर)

स्मृति शेष: जैक्सन हॉस्टल, पटना कालेज

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वही पुरानी राहदरी, वही इश्क इधर से उधर फिरते रहने का। 
बेमतलब, बेकाम तो नहीं रहा होगा कमरे के बाहर भटकते रहना उन दोपहरियों में जब भुबन का रेखा से हुए छुअन को पढ़ा होगा और कमरे से निकल ख्वावों का दरिया सिंचा होगा , ठीक यही इसी छत के नीचे । 
यहीं कहीं रह गयी होगी तुम भी तो शशि।


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विदा पूर्व दिशा, विदा पाटलिपुत्र, विदा मगध की सीढियां और भविष्य की गंध से मादित खंडहर रास्ते जहां वास है मेरी स्मृतिय़ां और मेरे प्रेमिका की हँसी।
वहीं उस सीढी पर उसी कोने में पसरी फुसफुसाहटों और तेज चलती सांसों को अपने झोले में डाल निकल पड़ा था जब, कहां अहसास रहा होगा कि सांसों की भी भला कोई गठरी हो सकती है? किसी ने सिखाया भी तो नहीं कि रास्ते कहीं ले कर नहीं जाते पथिक को। रास्ते आत्म मुग्ध हुआ करते हैं। रास्ते जानते हैं मायावी विद्या। या यों कहें कि रास्ते ही मायावी सुंदरी का एक दुसरा रुप है। वे आपको भ्रम देते हैं कि वे महज माध्यम हैं, एक जरिया भर गंतब्य तक पहुंचाने का जिम्मा भर है उनका। पर, असल में मगध में महज सीढियों का ही वास है। इन्हीं के कोने में बायें से सवा चार आंगुर पर नीचे से गमछे भर उंचाई पर ठीक मध्य में जो सिंदूर बिंदु है वहीं तुम्हारी सांसो को सजोये खड़ी है सीढियां। बुलाती है पास कुछ इस आस से कि वे बेचैन हैं तुम्हें तुम्हारी अमानत सौंप देने को। मानों जो सांस तुमने साथ ले ली थी वह अब भी वहीं उस मायावी ने बड़े जतन से संजोये हुई है। कोने न हुई मुआ कोई एटीएम हो जैसे।

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तस्वीर जो मेरे कैमरे ने ली नहीं कभी, कहीं।
चिपक सी गई है दीवार पर कुछ इस तरह जैसे किसी ने फोबीकोल का पीपा उलट दिया हो। उस ढाई फूटे फ्रेम में एक केतली है, रेझकी जमा चार दुअन्नी के
एक सिलबरिया तसला और दबदब उज्जर देह पर झरकल दाग बाले टुकटुक ताकते लिट्टी के सतरह गोले।
इस तस्बीर में सात सोहल लहसून , एक सिलबरिया थारी और छिपली तीन भी वैसे ही टुकुर टुकुर मुंह बाये
हर आनेजाने बालों को हसरत की नजर से देख रहे हैं।
किनारे से जहां तस्वीर का फ्रेम चनक गया है वहां एक अध वयसु महिला की सी आकृति है, शायद झुक कर सुलगती आग की मैनेजमेंट कर रही हो। इस उम्र में देह जान ही जाता बिन आखर के ही आग की दुनियादारी।
सतरहो चिंहती हैं अपनी अपनी गहकियों को। पर, उनके आने में अभी देर है। पहले आयेगा साइकिल पर दुनिया के बोझ तले। घनी चौड़ी रौबदार मूंछों और दबे कंधे पर अपने से सबा गुना लंबा बंदूक लटकाये कप्तान सिंह।
एक पांव को जमीन पर टिकाने का जतन कर बुढ़िया को साइकल के हैंडल में लटका सबा कनमा कड़ुआ तेल दे बिदा हो जाएगा कप्तान सिंह बगैर मुंह से शब्द एक भी निकाले।
फिर, सामने से गुजर जायेगा, ठेला छितन महतो का जिसपर, बैठी उसकी बेटी देखती रह जाएगी अपनी रोज की इन सतरह सहेलियों को।
आस लिये छित्तन के छौड़ी की आंखे, जिसके नजर से नजर मिलाती लिट्टयां हॉय-बॉय करेंगी। इस सबके बहुत बाद आयेगा राम सनेही और उसका लपैक लफंदर ललटून महतो। फचर फचर करता, फन्ने खां समझता।
राम सनेही के लिये दो और फन्ने खां के लिये एक, कुल तीन बिदा हो जाएंगी एक साथ...रह जाएंगी कहने गिनने को कुल जमा चौदह। पर, जो गिनती में नहीं रह पाता उसका क्या? सतरह से चौदह, चौदह से तेरह...नौ...सात...तीन और सबसे अंत में रह जाएगी एक अकेली छुटकी, अगली सुबह तक के लिये।अपनी सतरहो की सझिया आस लिये। यही हर रोज यदि होना तय हो, तो क्यों नहीं बनाती है बुढ़िया सोलह ही?
यही एक सवाल पुछती रहती हर शाम, इतने बरस से। मानो यह कोई सवाल न हो, जीने का सलीका बन गया हो
लिट्टियों के श्राद्ध से जनमा सलीका।
फिर गहरायेगी रात, फिर छिड़ेगी बात चांद की और चांदनी की,
और, गुलमोहर की चुहल पलकों में संजोये सो जाएगी तस्वीर के तीसरे कोने में सतरहो की याद संजोये।

शशि और शेखर

1

सबसे पहले तुम, शशि। 
इसलिये नहीं कि...
इसलिये भी नहीं कि...
और, इसलिये तो नहीं ही कि...
कम परते जाएंगे तैंतीस ऐसे इसलिये 
फिर भी मैंने जिद्द पकड़ ली है। तुमसे ही तो सिखा है मैंने जिद्द करना।
सबसे पहले तुम, शशि।इसलिये कि शेखर शशि नहीं है। शेखर शशि सा भी नहीं हैं। तो शुरुआत इस नकारात्मकता से क्यूंकर आखिर। पर, ऐसा करने बाला भला मैं पहला भी तो नहीं। शेखर शशि सा नहीं, यह मायने नहीं रखता। दो व्यक्तित्व क्यों कर समान हों? लेकिन, शेखर शशि सा होने की कभी इच्छा भी नहीं रखता।शेखर के बनने में शशि को मिट जाना था। इस मिट जाने से शेखर का पुरुष बन पाया। इसमें शशि ने अपने को न्योछावर कर दिया। कतरा कतरा, तिल तिल। शेखर में पुरुष वह सब खोज लेता है जिसकी अभिलाषा उसे होती है। शेखर में शशि ने भी सबकुछ तो पा ही लिया। पर, शेखर तुम नारी नहीं बन पाये। तुम रह गये निरा पुरुष ही।



2


शेखर, तुम स्त्री तो नहीं ही हो सके। शशि सा होने का यत्न तो कर ही सकते थे। पर, नहीं। तब॒ हमने महात्मा को अतीत में धकेलने का जिम्मा जो उठा रक्खा था। तुम, शेखर नेहरु सा बन जाना चाहते थे। कमला, शशि। शशि/ कमला बिमारी में चल बसी।
तुम तो शेखर मुसलमान भी नहीं हुए। तुम हरिजन और दलित भी नहीं हो पाये। तुमने रोमांस और दुख दोनो का अर्जन किया। विरासत में न तो तुम्हें दुख मिला, न ही अपमान। जब तुम अपने लंबे और बेढ़ब हाथ को छुपाने का जतन कर रहे थे, उस समय भी तुम्हारी स्मृतियां निजु ही तो रही। कब तुमने भोगा वह जिसपर तुम्हारा कोई बस नहीं हो? कब तुम्हें मिला तिरस्कार और उपेक्षा थाती में? औपनिवेशिक तिरस्कार की स्म़ति, अपराधी करार दे दिये जाने ने जब तुम्हें दुख और दुख से दृष्टि दी-- विजन, तब क्या तुमने सोचा मुसलमान के बारे में, दलित के बारे में और स्त्री होने की क्या अभिलाषा की कभी तुमने?
तुम एक वैश्विक नर होना चाहते थे। बंधनमुक्त, अपने निजुता में परिपूर्ण। स्वतंत्र। पूर्ण। अंग्रेजी कविताओं और संस्कृत से उर्जा लेते हुए। उपमहाद्वीप के दक्षीण में बचपन से लेकर, गंगा पर बहते हुए स्मृतियों के साथ, पश्चिम से पूरब को लांधते हुए। बोगनबेलिया की डांठ को खोसते हुए कभी कुसुम और चंपा की याद तुम्हें नहीं आयी? क्योंकर, शेखर?
इतिहास और साहित्य और प्रांजल भाषा और नक्शे बाले भूगोल के चौखटे से जरा बाहर तो निकलते। जरा सा करते लोक का पसारा, शेखर।
महज रात ही तो है इक चादर, जो बची रह गयी मेरे देह पर...
मेरे घाव से अब नये पीव भी नहीं आते।
मवाद के बदले रीस रीस कर बहराते हैं शब्द।
वह भी संतुलित, सुरुचिपुर्ण, सुंदर और सोद्देश्य।
अब-तब में न तो अ का डंडा टेढ़ा होता है और न ही ब का पेट बड़ा।
सीघी सी लकीर है सांस लेते जाने की।

टुटलाहा हवाई चप्पल

हवाई चप्पल त अखनो खियैत हतैक।
फित्ता त अखनो टुटैत हेतैक।
घसटैत पैर सं टुटल फित्ता बला चप्पल हाथ मे नेने मुरली अखनो सुन्नेरि क सामने मुंह नुकबैत अप्पसयांत होईत हैत।
नकटी गली क मोड़ पर टुटलाही चट्टी क फित्ता सेहो ओहिना गंहाईत हेतैक।
सोंहगर, गुंहगर।

अपराजिता

बांये कान के ठीक ऊपर, करीब एक कंगुरिया उंगरी छोड़ कर संतो की नवकनिया ने अपने बालों में एक अधखुली अपराजिता खोंस ली।
 ...'धत पगली कहीं की! ई फूल कहीं केस में कौई ख़ोपे है?', पिलखुआर बाली अपनी जईधीं पर झिरकते बोली।
' ऊ का है कि राधे के पप्पा को ईहे फूल बाली छापी की साड़ी बहुते पसिन है। त हमनी सोची कि एगो कली केस में खोंस लें। आप कहती हैं तो हम हटा लेते हैं।'

मेरे हॉस्टल का कमरा और दुपहरी यादें

उन्हीं दोपहरियों में जब आंखे कमरे की लंबाई नाप कर 
इसी दरबाजे के पोरों और कुंडी तक दबे पांव आती। 
और फिर, उल्टे पांव तेजी से वापस लौट आती, 
अपने में ही सिमट जाते जाने के लिये.

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Tuesday, December 27, 2016

Bhagat Singh: Why I am an Atheist

Listen to Bhagat Singh: Why I am an Atheist by Sadan Jha #np on #SoundCloud https://soundcloud.com/sadan-jha/bhagat-singh-why-i-am-an

Monday, December 19, 2016

अनुपम मिश्र: एक श्रधांजलि

कुछ कृतियाँ ऐसी होती हैं कि मन पर एक पक्की लकीर खींच कर रख देती है. किताब के पन्ने, उसमें निहित जानकारियां, उसका भूगोल और उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि सब कुछ किताब पढ़ जाने के बहुत अरसे बाद तक भी आपके साथ चलते हैं. सरल शब्द बृहत् आकार ले लेते हैं. किताब का समाज आपको अपना ही समाज लगने लगता है. किताब के उत्स का भूगोल अपनी सीमाओं को लांघ कर आपके होने में रच बस जाता है. साथ ही साथ रहता है उसका लेखक. उसकी अदृश्यता में आप अपने होने के प्रति आश्वस्त बने रहते हैं. कि आपको यह लगता है कि वे हैं तो आपकी संवेदना बची हुई है. वे हैं तो आपके समय में कुछ ऐसा स्पर्श शेष है जो आदमी को आदमी बनाये हुए है. मशीन में तब्दील होने से, प्रगति, आधुनिकता और विज्ञान के अंधाधुंध गोलीबारी से एक तिनका भर प्राण तत्व को बचाए रखने का झूठा सच्चा सकून दिलाता एक सरल व्यक्तित्व.
अनुपम मिश्र कुछ ऐसी ही सख्सियत थे. वे आज हमारे बीच नहीं हैं.
मैं उनसे एक दो ही बार मिला. मिलना भी क्या महज दो चार पल की औपचारिकता. यह कहना अधिक बेहतर होगा कि एक दो बार ही उनको देखा. पर, उनकी उपस्थिति सदैब बनी रही तब से ही जब से उनकी किताबें पढ़ी. उन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के मानसरोवर हॉस्टल में रहा करता था. सीनियर प्रभात रंजन इनके बारे में बताया करते. फिर उन्हीं के मार्फ़त अनुपम जी की दो किताबें पढ़ी: राजस्थान की रजत बूंदें और आज भी खड़े हैं तालाब. फिर, रहा न गया. प्रभात जी ही की मदद से इन दोनों किताबों को ख़रीदा. सहेज कर रखने के लिए, गाहे बगाहे किताबों को फिर फिर से पढने के लिए. पर, यह हो न सका. ऐसी किताबें भला यदि एक जगह टिक सकती तो फिर मैं ही कहाँ पढ़ पाता इन्हें. मैं भी तो पहली दफ़ा किसी और ही की किताब पढ़ी थी. खैर, न तो बढियां किताबें एक जगह टिक पाती है, न ही उनमें पसरा ज्ञान का लोक ही. और, न ही उनके लेखक. वे भी आज नहीं रहे.
अनुपम जी को अधिकतर लोग एक गांधीवादी पर्यावरणविद के रूप में जानते हैं. उन्होंने जिस सरलता से और जिस संवेदना से राजस्थानी परिवेश में, भाषा से समाज से, शिल्प और विज्ञान से जोड़कर जल और जीवन की बात कही वहाँ पर्यावरण महज एक सामजिक एक्टिविज्म  की एक कैटेगरी नहीं रह जाती. यह नहीं कि प्रयावरण पर व्याख्यान सुनना है तो हाल संख्या दो बटे चार पर जाएँ और अर्थव्यवस्था पर बहस के लिए हाल संख्या तीन गुणे नौ की तरफ मुड़े. अनुपम जी के लिए यह एक जीवन पद्धति रहा. एक ऐसी समग्र दृष्टि जहां आप पानी को भाषा से व्यवहार से जैसे ही अलग किये और चौबीस घंटे पाईप वाटर सप्लाई के महानगरीय आधुनिकता के छलाबे में जैसे ही पड़े वैसे ही आपका बंटाधार.
इसलिए पानी को केंद्र में रखने के बाद भी अनुपम जी के लिए यह न तो एक असंपृक्त ईकाई रही और न ही महज एक प्राकृतिक संसाधन.
बहुत सी बातें हैं कहने की और लिखने की. सबकुछ न तो लिखा जा सकता न ही कहा. हाँ जैसे उनकी किताबें थी. जिस तरह की सुरुचिपूर्ण सजाबट थी. जिस सरलता से कही गयी थी बेहद गूढ़ बातें. जिस गहरे दृश्यबोध का परिचय देती थी उनके किताबों की तस्वीरें, वो उन दिनों मेरे जैसे अबोध हिंदी पाठक के लिए बेहद आश्चर्य में डालने बाला भी था. पर, इसका यह कतई मतलब नहीं था कि उनका सौन्दर्य बोध प्रकाशन की, ज्ञान की राजनीति के प्रति ज़रा भी लापरवाह था. उन्होंने अपनी किताबों के कॉपी राइट अधिकार को मुक्त रखा. यह उन दिनों मेरे लिए एक सुखन जानकारी तो थी ही पर, आज के माहौल में भी सोचता हूँ तो यह एक बड़ी और समय से आगे की बात लगती है.
अनुपमजी की राजनीति अबोध भाव लिए थी. एकदम सरलता से सौम्यता से क्लिष्ट तार उनकी उलझी गांठें सुलझाकर बेबाकी से सामने रख देने बाली. करीब पंद्रह बीस साल तो हो ही गए होंगे उनको मसूर दाल और सामाजिक विकलांगता पर सुने हुए. दिल्ली विश्वविद्यालय में ही किसी ग्रुप ने बुलाया था. आज भी मृदु लहजे मे धीरे धीरे कहे गए उनका भाषण दिमाग में किसी डंके की भांति बज रहा है. बाद में, एक दफे मैं भी उनको पानी और शहर के ऊपर वक्तब्य देने के लिए आमंत्रित किया. वे मुझे नहीं जानते थे, पर स्वीकृति देने में जरा भी कोताही नहीं की. जिस माहौल में यह समायोजन था वह कई तरह से अभिजात्य होने का आभास भी देता था और इससे वे कुछ असहज भी रहे, ऐसा मेरा अनुमान है. यह बहुत लाजिमी भी था. वे अंग्रेजीदां के बजाय आम लोगों के बीच अधिक सहज रहा करते, ऐसा मेरा अनुमान है.  
अनुपम जी के बारे में यदा कडा कुछ पढने कुछ सुनने को भी मिला जिनसे चम्बल की बीहरों में जयप्रकाश नारायण के साथ उनके द्वारा डाकुओं के सामुहिक आत्म समर्पण की जमीन तैयार करने में उनकी भूमिका का कुछ पता चला. पर, एक विस्तृत रपट इस बाबत शायद लिखा जाना शेष ही है. वैसे भी वे संकोची स्वाभाव के व्यक्ति थे और लोग बाग भी इसे भूल ही गए हों, यह भी मुमकिन है.
खैर, जो भी हो, हमने आज समाज के बेहद शांत चित्त ऐसे स्तम्भ को खोया है जितने बड़े  सामजिक कार्य कर्ता थे उतने ही अद्भुत लेखक और वैसे ही कहनकार.  
उनका आज चले जाना बहुत से अर्थों में मेरे लिए गांधीवादी व्यक्तित्व के अंत का संकेत है. 

Sunday, October 30, 2016

Regal hotel, Darbhanga रीगल हॉटल, दरभंगा

Listen to Regal hotel, Darbhanga रीगल हॉटल, दरभंगा by Sadan Jha #np on #SoundCloud https://soundcloud.com/sadan-jha/regal-hotel-darbhanga

Saturday, October 29, 2016

Tuesday, May 31, 2016

कामेडी, कार्टून और हंसी की राजनीति

तन्मय भट्ट के कमेडी पर सोच रहा हूं. हास्य व्यंग एक मान्य विधा रहा है. कॉमेडी और राजनीति का भी लंगोटिया नाता रहा है. बिरोध की अभिव्यक्ति. चाहे राज सत्ता का हो, चाहे व्यक्ति के देवीय होते जाने की सत्ता हो. दूसरी तरफ यह व्यंग अक्सर ही उसी प्रचलित भाषा, बिंब और स्टिरियोटाईप्स का सहारा लेता है जिससे पारंपरिकता, पुरुष सत्ता, जातिवाद, जैसे गंभीर शत्रुओं को फैलने के लिये अधिक आकाश मुहैया हो जाता है. पर, इन तमाम पेचिदगिंयों के बाद भी जो तार कायम रहता है वह यह कि दूसरे किसी कला की भांति कॉमेडी का हर उदाहरण एक स्टेटमेंट होता है. कभी स्पष्ट और मुखर और रैडिकल तो कभी प्रच्छन्न, अप्रत्यक्ष और कन्जरवेटिव. कभी व्यंग (चुटकुले, प्रहसन, कार्टून, कैरिकेचर, कॉमेडी आदि) जो अपनी संकल्पना में ही रिप्रेजेंटेशनल आर्ट ( इतिहास, फोटोग्राफी, पोर्टेट आदि) से भिन्न होता है अपनी माध्यम मात्र के जरिये हमें अपने होने के, अपनी समाज के और अपनी समय को देखने परखने के लिये एक भिन्न नजरिया प्रदान करता है. और, हमारी दृष्टि, आम और खास के प्रति हमारी सोच में किसी न किसी स्तर पर कुछ न कुछ जुड़ जाता है, कुछ घट जाता है. कभी गंभीरता से गुदगुदा जाता है तो कहीं मासुमियत से हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं अपनी ही कहकहों पर ढहर कर सोचने को. शायद यही कारण हो कि व्यंगकार, कॉमेडियन और कार्टूनिस्ट के ऊपर सबसे तीखे हमले हुआ करते हैं. फ्रांस के चार्ली हेब्दो पर हुआ आतंकवादी हमला हो या फिर एनसीईआरटी के पाठ्यपुस्तक में अंबेडकर-नेहरु कार्टून का विवाद हो, नरेंद्र मोदी पर कार्टून बनाने बाले हरिश यादब उर्फ मुशब्बूर को रातो रात इंदौर से गिरफ्तार कर लिया जाता है. प्रोफेसर अम्बिकेश महापात्रा को बंगाल में ममता बनर्जी के कार्टून को महज फार्वर्ड करने के लिये गिरफ्तार होना होता है. या फिर, असीम त्रिवेदी को पार्लियामेंट के कार्टून के लिये लंबी कानूनी जद्दोजगद से गुजरना होता है. क्या आपने किसी फोटोग्राफर या फिर किसी कहानीकार या कवि को हाल के दशकों में इतना प्रताड़ित होते पाया है? (हाँ, यहाँ पत्रकारों की बात अलहदा है, अक्सर उनके मार दिए जाने की उन पर हमले की और उनके ऊपर कानूनी कार्यवाही की खबर आ ही जाती है). पहले के दौर में भी बहुत उदाहरण नहीं मिलेंगे. हां, उपनिवेशिक युग, मशहूर अफसानानिगार मंटो के बहुचर्चित प्रकरणों, इमरजेंसी के दौर की बात तो खैर उल्लेखनीय है ही. फिर, हाल में समाज विज्ञानी, मनोविज्ञानी आशिष नंदी को भी लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी तो पड़ी ही. पर, क्या किसा फोटोग्राफर या एक्टर को उसके फोटो या एक्टिंग के लिये गिरफ्तार होना पड़ा है? हाल में तो नहीं.जो कार्टून हाल में आतंकी हमले या सरकारी तंत्र के चपेट में आये वे कोई बहुत  उम्दा कला के उदाहरण भी नहीं हैं. कोई गहरी राजनीतिक समझ दिखाते भी नहीं मिलते हैं.
तन्मय का सचिन- लता मंगेशकर कॉमेडी फूहड़ और बेपेंदी का है जिसमें गालियॉं और हंसी दोनो ही जबरन ठूंसी गयी हो. मैं, खुद को, अपने बिरोध के तमाम सूरों के, राजनैतिक प्रतिरोध और सत्ता की तमाम आलोचनाओं के बाद भी इस कॉमेडी के साथ खड़ा पाने में अक्षम पाता हूं. पर, कॉमेडियन के गिरफ्तारी की मांग, हर बात को कानून और पुलिस तक ले जाने की राजनीति! यह तो कोई बात नहीं हुई. क्या हम एक ऐसे समय में सॉंस ले रहे हैं जहां हर निर्णय, हमारे विवेक और नैतिकता की हर नब्ज या तो भीड़ तय करती है या पुलिस तय करे. कुछ कला सराहनीय होती है तो बहुत सी नजरअंदाज करने के लिये भी तो होती है. और वहीँ तय होता होता है कि कौन कलाकार उम्दा है और कौन नहीं.

Wednesday, May 18, 2016

British Library /ब्रिटिश लाइब्रेरी


Image: Sitting on History, 1995, Bill Woodrow, British Library, London

देखो तुम्हारा नाम नताशा, जूलिया, जेन, लूसी, मार्ग्रेट या फिर ऐसा ही कोई ब्रिटिश नाम होना चाहिये. प्रोपर ब्रिटिश. नहीं, मुझे गलत नहीं समझो. मुझे तुम्हारा नाम बहुत अच्छा लगता है. पर, शायद मैं जो कहना चाह रहा हूं वह यह कि तुम्हे देख कर फिर तुम्हारा नाम जानकर दोनो से एक ही छवि नहीं बन पाती. किसी बहुत प्लीजेंट सरप्राइज सा लगता है तुम्हारा नाम सुनना. जूनी. 
हम लोग उसी पुराने जगह पर बैठे हैं. सेंट पैंक्रियास, ब्रिटिश लाइब्रेरी. मेजनाइन फ्लोर. बैंच पर. सामने चार्लस डिकेंस के रहस्यमय और अंधविश्वासों की दुनिया पर पिछले पखवारे से एक्जीविशन चल रही है. दोपहर के करीब दो या ढाई बज रहे होंगे. समय का अहसास ही कुंद सा हो गया है, जबसे जूनी से मुलाकात हुई. यहीं इसी जगह, इसी राहदरी में. इसी बैंच पर. यही एक्जीविशन को देखते हुए हम मिले थे. मिले क्या थे? हमारी बातचीत शुरु हुई थी. पहल, जाहिर सी बात है, उसी ने की थी. नहीं तो कहां हो पाता मुझसे बात करना! पर, जब बातों का सिलसिला निकल पड़ा तो कौन कहां रुकने बाला था. मैं तो सोचता कि मैथिल ब्राह्मन से गप्पवाजी में कौन टिक पायेगा. पर, यह ब्रिटिश लड़की तो मुझे मात दे रही थी. या फिर, कह सकते हैं कि उसकी बातें सुनना, चुपचाप रहते जाना अपने कानो के सहारे भाने लगा है.
खैर, उसकी प्रतिक्रिया स्वभाविक रुप से त्वरित आयी.
" ये प्रोपर ब्रिटिश क्या होता है? मुझे नहीं लगता था कि तुम ऐसे शुद्धता वादी नजरिया रखते होगे. अभि भी मेरा वही विश्वास है तुम्हें लेकर. पर, तुम मुझे ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से चौंका देते हो. और, मैं तुम्हारी तरह प्लीजेंटली सरपराइज्ड नहीं हूं. यह निराशाजनित ही है. या फिर उसकी सिमांत पर कहीं. और फिर, तुम तो इतिहास के हो, प्रेक्टिशनर( वो हमेशा यही कहती, शोधकर्ता या छात्र कहना उसे नहीं सुहाता; हां जिस दिन चुहल के मुड में होती तो प्रोफेसर कहती और इठलाकर अपनी पोनी टेल संवारने लगती)."
" देखो जूनी, मेरा दिमाग हमेशा तर्क और ज्ञान की भाषा नहीं बोलता. पता नहीं क्यों मेरे जेहन में जूनी से साउथ इस्ट एशियन छवि या फिर स्पैनिश लैटिन अमेरिकन अहसास होता है. इसकी कोई वजह भी नहीं है. कमसेकम मुझे इसका इल्म नहीं है. पर, ऐसा ही है मेरे साथ. फिर, लंदन और ब्रिटिश समाज के बारे में जानता भी तो कुछ नहीं."
"हुम्म! ये जो तर्क की अपूर्णता और जेहन की भाषा की बात जो कही तुमने वह बेहद ठहरी हुई बात है. " ओठों के किनारे पर आती हुई बहुत सुकुन भरी मुस्कुराहट को संयत करते उसने बात आगे बढ़ायी. " एक राज की बात बताती हूं ब्रिटिश लड़की को अपने नाम पर चर्चा लंबी करने में बेहन गुदगुदी सा अहसास होता है. शायद तुम्हें पता है. पर, छोडो अभी. हम नाम पर फिर कभी जरुर लौट कर समय गुजारेंगे. अभी जो ये तुमने बात से बात निकाल दी तर्क की दुनिया.. ज्ञान और दैनिक व्यवहार में के बीच के फासले ...इसका सत्य.
अपनी आंखे सामने चार्ल्स डिकेंस के रहस्यमय संसार के एक एक्जीविट पर ही टिकाये उसने कहा: जानते हो प्रोफेसर, सत्य को कहां टिका पाओगे? "
जिस अंदाज में सबाल आया यह समझना मुश्किल हो गया कि उसका अभिप्राय मेरी बातों से है या फिर चार्ल्स डिकेंस के इस रहस्यमय दुनिया से जिसकी जमीन सामने चल रही एक्जीविशन तैयार कर रही दिखती है.
" सत्य...सत्य का तर्क से सीधा कोई नाता नहीं. यह तो विज्ञान ने अपनी सहुलियत के लिये तर्क की इमारत खड़ी कर रखी है.
जिस अनुभव पर आपका विश्वास हो और जिसपर आप दुसरों को विश्वास दिला पायें वही सत्य है".
" तो बात दरअसल विश्वास की है." कहते हुए उसने एक गहरी नि:स्वास छोड़ी. पतले गले में हल्की रेशमी हलचल सी उठी हो मानो. दायीं कान पर आ गयी लटों को उंगलियों के पोरों से समेटते हुए पीछे लेते चली गयी, जूनी.

Friday, March 18, 2016

"भारत माता और लडती हुई उसकी सन्तान: श्री कमला Bharat Mata and Her Quarreling Sons, From Shree Kamla (1910-1920)

अभी पुराने फोटो खंगालते वक्त ये मिला:
नीचे की पंक्तियाँ है:
"पुत्र तुम यह क्या करते हाय
हमीं पीलाया दूध सभी को पोसा अन्न खिलाय
आपस में फिर क्यों तुम लड़ते ममता मोर बिहाय
कट मरौ भाई भाई सो अचरज बड़ी लखाय
गले मिलो अबहूँ तो प्यारे हम सन लाखा न जाय"

श्री कमला से उद्धृत जो भागलपुर से निकला करता था




Friday, February 05, 2016

सुबह की सैर

आज सुबह सैर से लौटते हुए सड़क के किनारे जहां पक्की का कालापन खत्म होता है वहीं रेत मिट्टी पर दो सिक्के दिख गये. हम उस वक्त पड़ोस के सोसाइटी के गेट के सामने थे. हठाथ ही नजर उस तरफ मुड़ गयी. शायद मन में भय रहा हो कि कहीं कोई सिक्के उठाते देख तो नहीं रहा. शायद इस उम्मीद से कि कोई नजर आये तो पुछ कर उसकी संपत्ति वापस कर एक नैतिक जिम्मेदारी का निर्वहन ही कर लूं. पर, वहां कोई न दिखा. मैंने भी तब तक स्वभाविक रफ्तार में सिक्के उठा लिये थे. अब सबाल था कि इनका क्या किया जाय?
मन स्वत: ही बचपन की ओर मुड़ गया. याद आया हमेशा इस आस में रहना कि क्या गजब हो कि सुबह स्कूल जाते हुए या फिर शाम खेल से लौटते वक्त सड़क के किनारे पैसे मिल जाय. सपने बुने जाते. नैतिकता पहरे लगाती. पेपर में यदा कदा छपी रपटें ताकीद करबाती कि फलाने रिक्सेबाले ने नोटों की गड्डी थाने में जमा करबा कर एक आदर्श उपस्थित किया. खाली समय में दूर के रिश्तेदारों द्वारा पूछे सबाल याद आते --'अच्छा बताओ यदि तुम्हें रास्ते पर चलते हुए कभी नोटों से भरा बैग मिल जाय तो क्या करोगे? ' वो हमे तौलने के लिये यह सबाल पूछते. हम उन्हें अपने मूड के हिसाब से भटकाते. कभी नैतिक चरित्र का परिचय देते. तो, कभी कंज्यूमर संस्कृति की विशालता से अवगत करबाते.
खैर हकीकत में कभी ऐसा कोई बैग मिला नहीं आजतक. न ही कोई खजाने का नक्सा ही. पर, नसीब अपनी इतनी भी गयी गुजरी कभी न रही कि फुटकर पैसे न मिले. दरअसल, हम चाहते भी यही थे. नोटो की गड्डी या बैग मिल भी जाय तो तमाम तरह की पेचिदगियां साथ आने के खतरे हुआ करते. इसलिये आस रखते कि फुतकर सौ पचास के या दस पांच के नोट ही मिलबाना. यह आस यथार्थ के अधिक करीब भी गता और देश-काल की अपनी समझ के धरातल पर प्रोबेबिलिटी के जटिल कैलकुलेशन पर बनते. पर, दस पांच के नोट भी नहीं मिले. सबसे अधिक दफे यदि अपने खाते कुछ आया तो पच्चीस पैसे के सिक्के. गोल गोल, छोटे छोटे. पंच पियाही और बीस पियाही, वही ताम बाला, भी हाथ आये. पर, पचीस पियाही की बात ही निराली. इन बिरले छणों में अक्सर यही होता कि पैसा मिलने की खुशी छण भंगूर हुआ करती. अगले ही पल अहसास होता कि चवन्नी अपनने ही हॉफ पेंट के दांयी जेब के छेद से सरका हुआ अपराधी था.
खैर, वो तो बचपन था. आज जब किसी को आस पास न देखा तो सोचा स्कूल जाते किसी बच्चे की जेब से सरक गया होगा. पर, इन सोसायटी के बच्चे खुदड़े सिक्क् भला क्यूंकर ले जाये? फिर, लगा कि हो न हो यह ऑटो से सुबह सुबह उतरे किसी मजदूर या काम करने बाली केहाथों से फिसल गया हो. मन में कचोट हुआ. दो सिक्के थे, एक दो का और एक एक का. सोचा पास ही किनारे पर रख दूं जिसका खो गया वह खुद आकर ढ़ूढ़ लेगा. पर, मन इसे युक्ति संगत न माना. सोचा आगे किसी सेक्युरिटी गार्ड को देदूंगा. खुश हो जाएंगे. जब अपने सोसायटी के गेट पर आया तो संयोग या दुर्योग से वहां उस वक्त कोई न मिला. कहीं टहलकर बतिया रहे होंगे. हैं तो वे भी इंसान ही, फिर कठीन और लंबी ड्यूटू भी बजानी होती है. इधर उधर ही होंगे. पर, खोजकर महज तीन रूपये देना जंचा नहीं. सोचा आगे अपने बिल्डिंग के टॉवर बाले वॉचमेन को दे देंगे. कुछ ऐसा योग कि वो भी नहीं मिला. तीन रूपये के साथ घर आ गया. लक्ष्मी का आर्शीवाद भला कहीं छूटता है. यदि हाथ से जाना ही लिखा होता तो लक्ष्मी भला इतने में मुझे ही खोजकर ये तीन रूपये क्यों पकड़ाती?

Tuesday, February 02, 2016

गिरीन्द्र नाथ झा, इश्क में माटी सोना. लप्रेक.

जगहों में पदानुक्रम हुआ करता है. ऊंच-नीच, भेद-भाव, अगड़ा-पिछड़ा...जैसे हमारा समाज जाति, धर्म, वर्ग, लिंग आदि खांचों में बंटा है उसी तरह जगहों के अपने खांचे हुआ करते हैं. अपने अपने तयशुदा दड़बों में जिंदगी गुजारने को अभिशप्त.
और, फिर हम यात्रा करते हैं इस शाप से मुक्ति की टोह में. सामाजिक और स्थानजनित भेद को लांघने की जद्दोजगद से लबरेज. एक जगह से दूसरी जगह. एक दायरे से दूसरे में. बृत से त्रिकोण, गुफा से जंगल, जंगल से गांव, फिर कस्बा, मुफस्सिल, शहर, और फिर महानगर. यह गमन एक रेखीय हो यह भी तो नहीं. रास्ते घुमावदार हुआ करते हैं. पेचिदगियां. खयाल की तरह जाते जाना भी और ध्रुपद की तरह सम की अनिवार्यता भी. यात्रा मानसिक धरातल पर हुआ करती है और भौगोलिक पर भी. शब्दो और सुरों की भी, विचारों की भी और पुन्य की तलाश की भी.
यह कतई जरुरी नहीं कि यात्राएं हमेशा जगहों के हाइरार्की को चुनौति ही दें. हममे से अधिकतर भेड़ चाल में यात्रा करते हैं. इससे तो जगहों की तय दादागीरी मजबूत ही होती है. जब हम इस भेड़ चाल से अलग होते हैं तो जगहों के बने बनाये खांचे को चुनौति देते हैं. गिरिन्द्र का लप्रेक, इश्क में माटी सोना कुछ इसी तरह जगहों की पक्की सड़क को लांघता है. पक्की से कच्ची पर लौटते हुए तीसरी कसम का गाड़ीबान "लीक और बैलों पर ध्यान लगाकर बैठ गया. राह काटते हुए गाड़ीबान ने पुछा-'मेला टूट रहा है क्या भाई?'...छत्तापुर- पचीरा कहॉं है? कहीं हो, यह लेकर आप क्या करियेगा?"
मन, बैलगाड़ी के टप्पर से मुक्त निरगुण गाने लगता है -- "अरे, चलु मन,  चलु मन ससुरार जइवे हो रामा,
कि आहो रामा,
नैहरा में अगिया लगायब रे- की••• "
कहीं और ही से पंकज मलिक की तान गुंजती है --'मन रे तु काहे न धीर धरे... ओ निर्मोही..."

चनका-पुरेनिया- दिल्ली-चनका. शब्द, स्मृति, अनुभव, उलझने और आस. सब तैरते हैं यहां इस लप्रेक में. ऐसी ही हूक जगाती आस में "उसने धीरे से कहा--अबकी सावन में बारिश के लिये दुआ करूंगी' ".
विक्रम नायक के किरदार इस सुहानी मेघ की कथा कहते हैं, खुबसुरत लकीड़ों और शब्दों की पगडंडी पर हाथ थामे दो नन्हें पैर.
और परती परिकथा का जितेन 'सबकुछ' छोड़कर गांव लौट आता है. शब्द और बीज दोनो के साथ. आस के साथ. स्मृतियों के साथ, जो वहां भी थी. जो यहां भी हैं.
यहां जमीनी हकीकत कच्छपपीठा धरती की तान को सुरसा समान निगलने को मुंह फारे खड़ा है. तो साथ ही कबीराहा मठ की तान और दिल्ली में कॉफी मग की झाग पर गुनगुनाती फेनिल हँसी भी.
यह एक ऐसी सुरीली हँसी है जो दिल्ली के मुखर्जी नगर के कमरे की दीवारों से लेकर चनका के खेत और बंसबिट्टी तक पसरी हुई है... वही बंसबिट्टी जिसे स्नेहा 'बांस की बाड़ी'' ' कहा करती है.
गिरीन्द्र नाथ झा, इश्क में शहर होना ( चित्रांकण, विक्रम नायक), राजकमल, दिल्ली, 2015.

Friday, January 29, 2016

आज अचानक तुम्हारा 'अ' लिखना मन में घर कर गया. और नींद से बोझल आंखों से रात जैसे उचक कर खिड़की के बाहर झांक रही गुलमुहर की साख पर बैठ गयी. अब मनाओ पहले तो उतरूं मैं नीचे. वरना मैं तो खेलती रहूंगी उसी 'अ' की स्मृति से. अब भला मनाऊँ भी तो कैसे? यादें है कोई जोतखी के पतरे से निकला हुआ दिन तो है नहीं कि अमुक अधपहरे और फलाने शेख देख कर आए. ये तो दबे पांव कुछ ऐसे आती है कि जीने चढ़ भी जाये तो भी क्या मजाल कि हवा तक को भनक भी लगे. कुछ उसी कदर आया उसके अ लिखने की याद. पर, इससे मन बेचैन न होता. उलझन का कारण यह कि मुझे उसका 'अ' लिखना तो याद आया पर वह अ भुल गया. दिमाग पर जितना जोड़ डालता उतना ही कन्फ्युज होता जाता. उसकी पतली साफ उंगलियां गोल मुड़ती और जादुई अ बनता. मैं चकित देखा करता. हिंदी डिकटेशन में हमेशा पिछड़ा ही तो रहा. लेकिन गम किसे था. हमेशा सोचता वो भी तो रोशनाई बाली फाउंटेन पेन से ही लिखा करती जनकपुर से आये विल्सन से. फिर मेरी ऊँगली स्याही से बदरंग और उसकी इतनी साफ क्योंकर? जबाब सोचते सोचते उन रातों को कब नींद आ जाती पता ही नहीं चलता. पर, आज की रात? क्या जाने?

Monday, January 11, 2016

My book on Reverence, Resistance and Politics of Seeing the Indian National Flag




Reverence, Resistance and Politics of Seeingthe Indian National Flag 
Cambridge University Press, 2016.
ISBN 978-1-107-11887-4 Hardback. Length: 268+xxvii
www.cambridge.org/9781107118874
About the Book
This book seeks to understand the politics that make the tricolour flag possibly the most revered among symbols, icons and markers associated with nation and nationalism in twentieth-century India. While intertwined narratives of reverence and resistance offer a unique perspective on linkages between the sacred and the political, the emphasis on the flag as a visual symbol aims to question certain dominant assumptions about visuality. Anchored on Mahatma Gandhi’s ‘believing eye’, this study reveals specificities of visual experience in the South Asian milieu. This account begins with a survey of the pre-colonial period, focuses on colonial lives of the flag and moves ahead to explain contemporary dynamics of seeing the flag in India. Delineating such a wide canvas, perspectives from macro history are matched with dense investment on certain key events, debates and elements which have shaped the shades of this history. The Flag Satyagraha of Jubblepore and Nagpur in 1922–23, the adoption of Congress Flag in 1931, the resolution for the future flag in the Constituent Assembly of India in 1947, history of the colour saffron, codes governing the flag as well as the legal cases are few such examples explored in depth in this book.

The tricolour in this history is a symbol of popular aspiration for freedom against colonial rule, a symbol of sovereignty as well as a site where claims of nationhood and citizenship are made, resisted and negotiated. At one level, the dynamics of claim making and resistance appears semiotic, and at another level, it becomes a fight for the participation, supremacy and control over the symbolic arena which is essentially public and visual in nature. The multilayered field is fraught with conflict between the colonial state and nationalist position, between dominant and dominated positions within nationalist domain, between state defined rituals of ‘flag code’ and popular practices and between dominant caste and dalit sarpanchs in post-colonial India, to name a few.

About the author

Sadan Jha is Associate Professor at the Centre for Social Studies, Surat. His research interests include history of visuality, history of symbols and icons like spinning wheel and the Bharat Mata, history of colours, and the contemporary urban experiences of Surat.

Table of Contents

List of Figures vii
Preface xi
Acknowledgements xxv
Introduction 1
1. Rise of the Flag 26
2. Flag on the Hut: Totem and a Political Symbol 52
3. The Indian National Flag as a Site of Daily Plebiscite 91
4. Shades of History: A Case of Saffron Colour 111
5. Visualizing an Ideal Political Order 145
6. A Post-Colonial Symbol 178
7. Gendered Symbol, Communal Politics 207
Epilogue: The Flag as a Sacred Political Symbol 239
Bibliography 247
Index 265

Advance Praise

'Sadan Jha's book is a pioneering and illuminating history of the Indian national flag, the most important icon of the nation. Jha's critical eye helps the reader see not only the contested nature of this symbol but also some important - and usually neglected - visual aspects of the Indian nationalist movement, thus widening our understanding of the scope of the political in the South Asian context. This book should interest all students of modern South Asian history.' Dipesh Chakrabarty, University of Chicago

Advance praise: 'A brilliant multidisciplinary analysis of the development of the Indian national flag and the way in which it came to be seen, appropriated and sacralised by different groups. A must-read for anyone interested in the Indian nationalist movement.' Bhikhu Parekh, University of Westminster