Wednesday, December 05, 2018

हाफ सेट चाय और कुछ यूँ ही, वाणी प्रकाशन एवं रजा फाउंडेशन, दिल्ली



वाणी प्रकाशन एवं रजा फाउंडेशन, दिल्ली, 2018
about the book एक रोजनामचा है. यहाँ कल्पना है, अनुभव है. दोस्तों के बीच खुद को बहलाने की कवायद है. गप्पबाजी है और अकेलेपन को बिसरा देने के लिए स्मृतियों कि गठरी है: मैली सी, जहां तहां से फटी हुई सी पर फिर भी ठहरी एक गठरी. दूसरी तरह से कहें तो यात्रा का नाम दिया जा सकता है: भटकाव की डोर थामे चलते चले जाने जैसा कुछ. लेकिन भटकाव का वेग कुछ ऐसा कि एक पगडंडी कहाँ दूसरी में मिलकर पौने तीन कदम पर ही जाने किस तरफ मुड़ जाय. किसी तय राह पर कुछ दूर तक निभा जाने को जैसे असमर्थ हों ये शब्द. पौने तीन या कभी कभी तो ढाई या फिर सवा कदम पर ही राह बदलने को अभिशप्त भटकते शब्द.

" हिंदी‌‌ में औपचारिकता का‌ ऐसा वर्चस्व सा है कि अनौपचारिकता अक्सर जगह नहीं पाता। सदन झा का गद्द यहां से वहां सहज भाव से जाने की विधा है। "अशोक वाजपेयी available on amazon Half Set Chay Aur Kuchh Youn He

Happy to share the news of my recent publication, this time in Hindi. This is a collection of short stories, ramblings and travel notes scribbled intermittently over the past few years. It is titled as 'Half Set Chay aur Kuch Youn hi' and has been published by Vani Prakashan in collaboration with Raza Foundation, Delhi.



Monday, February 05, 2018

पुस्तक समीक्षा: पुष्यमित्र की किताब ‘रेडियो कोसी’

बसंत के भोर के गुनगुनाती धूप और उस पर भी रविवार का अलसायापन। कुछ किताबें बची रह जाती हैं किसी ऐसी ही रविवार के गुनगुनाती धूप का इंतजार करती हुई।

जब वो आपके चौखट पर आती हैं तो आप बहुत उत्साहित होते हैं। आपके सामने वह बार बार किसी न किसी बहाने आती रहती है। आपको अपनी उपस्थिती का अहसास दिलाते हुए। पर, वह छूटी ही रहती चली जाती है। फिर, वह किताब आपके साथ आपकी यात्राओं की साथी बन जाती है। कुछेक हजार किलोमीटर की थकान के बाद यह सिलसिसा भी थम जाता है। एक ही किताब को बार बार यात्रा के सामान के साथ पैक होते देख आखिर पत्नी के धीरज का बांध टूट ही जाता है: ‘यदि पढ़ते नहीं तो हर बार साथ ले जाने का क्या मतलब?’

और, ऐसी ही अनगिनत कष्ट सहने के बाद बसंत के रविवार की गुनगुनाती धूप में वह किताब आपको पसंद करती है। मानो संदेशा दे रही हो कि मैंने तुम्हे अब योग्य पात्र समझ लिया। मानो अब आप उस किताब के लायक हो गये हों। पुष्यमित्र की ‘रेडियो कोसी’ ऐसी ही किताब रही है मेरे लिये। आज बसंत की धूप में उसने मुझे चुना।

एक मुख्यधारा के मीडियाकर्मी के साथ आप कोसी इस अंचल में प्रवेश करते हैं। यहां का पिछड़ापन, गरीबी, जीवन की दुरुहता कुछ ऐसे आपको बांधे रखती है, आपको बिंधती चलती है मानो आप किसी ऐसे भुगोल में जा रहे हैं जो समकालीन होकर भी इतर काल का हो, इतर खण्ड का हो। कोसी के बांधों के भीतर की जिंदगी। अपनी इन्हीं अन्य ता से शापित हो जैसे। कुछ यूं कि वहां का पिछड़ापन, वहां की जीवनशैली सबकुछ मिथकीय लगे, दंशित मिथक।

कोसी अंचल का नाम पढ़ते ही हिंदी के पाठकों का मन रेणु की तरफ भागता है। स्वभाविक ही है। पर, जिस बांधों के भीतर की बात पुष्यमित्र करते हैं, फरकिया और कुशेसर स्थान की बात, वहां की जिनगी, वह तो रेणु के मैला आंचल और परती परिकथा का अंचल नहीं है। यह तो रेणु के समय सन् पचास में था ही नहीं। कहने का यहां यह मतलब कतई नहीं कि फरकिया नहीं था या वह दंशित नहीं था। परन्तु वह बांध नहीं था जिसने पिछले सत्तर सालों में इस अंचल को शेष विश्व से काटकर रख दिया: बांध के भीतर बनाम् बांध के बाहर का समाज।रेणु बांध को कोसी की प्रताड़ना का समाधान मानते थे। वह समय नेहरु के सपनों के सम्मोहन का था जिससे रेणु अछुते नहीं थे। यही बात रेणु साहित्य को अपनी तमाम परतों के होते हुए भी युटोपियन बना देती है। उन्हें बांध की थोड़ी सी आलोचना भी सन् पचास के दशकों में नागवार लगा करती। जैसे रेणु के समय दुई पाटन के बीच का समाज बना नहीं था, उसी प्रकार पुष्यमित्र के दुई पाटन के बीच युटोपियन कैनवॉस कहीं नजर नहीं आता। यह एक डिस्टोपिक लैंडस्केप है। रेणु का कोसी अंचल पुराने पुर्णिया जिले में पसरा है। पुष्यमित्र के समय तक यह दरभंगा जिले में भी फैल चुका है। रेणु का समाज, भुगोल और कैनवास जमीन से देखे जाते, धरती पर खिंचे जाते रेखाओं और रंगो से बना रचा है। पुष्यमित्र के यहां इस कैनवॉस में, इसके भुगोल में और इस समाज में सुखी धरती और पानी का मिश्रण कुछ यूं कि आप यह फरक नहीं कर सके कि भू-गोल में भू कितना और जल कितना। मचान पर जिंदगी गुजारते समाज का भूगोल आखिर धरती से ही तो मुक्कमल तौर से लिखा नहीं जा सकता। इसलिये रेणु के पन्नों में मल्लाह बनते किसान भी नहीं मिलते।

रेणु के साथ तुलनात्मकता अनुचित है। शिल्प की बात और भी बहुत कुछ है जिसकी बात करनी होगी। साहित्य और पत्रकारिता के बीच के तारों पर बातें करनी होगी।पर, क्या करें कोसी अंचल की बात हो तो रेणु की तरफ मन मुड़ ही जाता है।

खैर, सच कहुं तो रेडियो कोसी पढ़ते वक्त जितनी याद रेणु की आयी उससे कम अमिताभ घोष की भी नहीं। अमिताव घोष एक दफे रेणुपुर नामक रहस्यमय जगह का उल्लेख करते है। कलकत्ता से ट्रेन लेकर दरभंगा होते हुए इस रहस्यमय जगह पहुंचा गया। हां, हमेशा कि तरह घोष महज घटना, इतिहास के साथ ही नहीं बरन् दूरी और भूगोल से भी खेलते हैं। खैर, घोष के भुतहा रेणुपुर को पढ़ते हुए मुझे बार बार साहित्यकार रेणु की ही याद आई थी। क्या यह संयोग रहा होगा कि घोष ने इस भुतहा और रहस्यमय और जलाप्लावित टीसन का नाम रेणुपुर रख दिया या फिर इस हेटरोटोपिक से जगह को रचते हुए वे रेणु के कोसी अंचल को जेहन में रखे हुए थे।

पर, अमिताव घोष के रेणुपुर पढ़ते हुए मुझे एक और ख्याल आया। वह यह कि हम हमेशा रेणु के कोसी अंचल में हिंदी प्रांत, उत्तर प्रदेश और बिहार के पश्चिमी इलाके से गुजर कर ही पहुंचते हैं। गंगा जमुनी थाती और हिंदी के साहित्यिक धरातल से होते हुए रेणु के पूर्णिया जाने के हम यूं अभ्यस्त हो चुके हैं कि कभी हमने यह सोचा ही नहीं कि कोसी अंचल में पहुंचने के दूसरे रास्ते भी हो सकते हैं। जैसे हम कलकत्ते से भी कोसी अंचल जा सकते हैं। बंगाली साहित्यिक थाती के जरिये भी रेणु और उनके प्रयोगों को उनके धरातल को समझ सकते हैं। मैंने अन्य कहीं कलोल आंदोलन और रेणु साहित्य को समझने के लिये इस आंदोलन से निकलते सूत्रों को पकड़ने की बात कही है। पर, रेणु के अंचल की यात्रा पूरब से, बंगाल और असम की तरफ से और जिवानंददास के बरक्स करने की कबायद रोचक हो सकती है।

यह कुछ वैसा है जैसे पुष्यमित्र के रेडियो कोसी में फरकिया के घमहरा के कात्यायनी मंदिर के पास बलकुंडा की दुर्घटना ने बरबस ही अमिताव घोष के भुतहा रेणुपुर की याद दिला दी। यह कल्पना, साहित्य और सत्य के एक दूसरे गुत्थम गुत्थ होने की ऐसी धरातल है जो है तो आपके पड़ोस में ही, जो बसता है आप ही की समकालीनता में पर जो किसी दूसरी बहुत पहले के सदी की बात लगती है। पाटने के लिहाज से नामुमकिन सी लगती मिथकीय दूरी का अहसास देती। एक ऐसा समाज जहां के रोजमर्रा को समझने के लिये महज एक ही तरीका है: ट्यून इन करें एफ एम के 82.7 पर रेडियो कोसी।


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Thursday, October 19, 2017

#me too / मी टू ( मैं भी)

आजकल वैश्विक स्तर पर 'me too' (मैं भी) अभियान चल रहा है। लड़कियां, महिलाएं, यौन अल्पसंख्यक तथा यौनउत्पीड़ित पुरुष हर कोई अपने साथ हुई यौन हिंसा को बेबाकी से, सार्वजनिक रुप में दर्ज कर रहे हैं। अपने ऊपर हुए हिंसा की स्वीकृति दरअसल एक सार्वभौमिक समुदाय का रुप अख्तियार कर रहा है।

अन्य प्रगतिशील कदमों की ही तरह यह पहल भी स्त्रियों की तरफ से ही आया है। परन्तु जैसा कि इस मुहिम में शामिल लिख भी रहे हैं कि यौन हिंसा के शिकार स्त्री पुरुष दोनो ही हुआ करते हैं। ऐसे में एक बेहतर और सुरक्षित समाज के निर्माण के लिये यह आवश्यक है कि हमारा लिंग चाहे जो भी हो, हमारी इच्छाओं का रंग जो भी, हम चाहे जिस सामाजिक पायदान पर हो और जिस किसी भौगोलिक धरातल पर खड़े हों वहीं से इस मुहिम में शामिल हों। 

इस मुहिम का हिस्सा बनने से अपने ऊपर हुई हिंसा की आत्म स्वीकृति से इतना तो तय है कि हममें उस हिंसा से उपजे डर का सामना करने की हिम्मत जगती है। चुपचाप सहते जाने से जो अंधकार का माहौल बनता है वह टूटता है।हम दुनिया के साथ अपने आत्म को यह संदेश देते हैं कि हमारे साथ जो हुआ वह गलत तो था ही पर, साथ ही वहीं उस लम्हे जिंदगी खत्म नहीं हो जाती। कि हम वहीं अटक कर, थमकर नहीं रह गये। कि हमारे यौन हत्यारे हमारी हत्या करने की तमाम घिनौनी करतुतों के बाद भी हमारे वजूद को नेस्तनाबूत करने में नाकामयाब रहे। कि उनके तमाम मंशाओं को मटियामेट करता मेरा देह और मेरा मन मेरा ही है। इस आत्म अभियक्ति और मुहिम का हिस्सा बनने से इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि हमारा चेतन भविष्य में दूसरे के प्रति यौन हिंसा का पाप करने से हमें रोके। 

जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा 'मी टू' हमें अपनी जिंदगी के अंधकार का सामना करने में मदद करता है। हम उन शक्तियों के खिलाफ एकजूट होते हैं जो इस अंधेरे का निर्माण करते हैं। जो अंधकार को संजोये रखना चाहते। ये अंधेरे के पुजारी हमारे चारो तरफ पसरे होते हैं। इनकी शक्तियां कुछ कदर संक्रामक हुआ करती है कि हमें पता भी नहीं चलता और कि कब यह हिंसा हमारे भीतर उग आता है। हम शोषित से शोषक हो जाते हैं। इस कायांतरण से बचने के लिये भी 'मी टू' मददगार हो सकता है। 

आजकल हम भारत में दीपों का उत्सब मना रहे हैं। तमसो मा ज्योर्तिगमय कहते हमारी जिह्वा कभी थकती नहीं। पर, क्या हमें अहसास है कि ऐसे त्योहारों और खुशियों के मौके पर कितने ही हिंसक पशु अपने शिकार की तलाश में जुगत लगाये रहते हैं? हमें देह, नेह और गेह को इनसे सुरक्षित रखने की जरुरत है। इस दीपाबली और उसके परे भी हमें अपने अंदर उग आये अंधकार का प्रतिकार करने की जरुरत है। 

यह दुखद है कि जहां वैश्विक स्तर पर इतना कुछ हो रहा है हिंदी जगत और मीडिया की दुनिया इसको तबज्जो नहीं दे रहा। पर, हम औरों की परबाह करे क्यों? वहां जो अंधकार के पुजारियों का कब्जा है उनसे उम्मीद भी कितनी रखें? हम खुद ही तो सक्षम हैं यह कहने को कि 'मी टू'।

Thursday, April 27, 2017

Streets: London 2012

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Streets: London 2012.

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एक आधी खुली खिड़की: महात्मा गांधी के जन्मस्थान पोरबंदर में

एक आधी खुली खिड़की: महात्मा गांधी के जन्मस्थान पोरबंदर में । उनके घर के पहली मंजिल पर जहां जाने के लिये आपको काठ की सीढियां बेहद सावधानी से चढ़कर जाना होगा। आधी खुली खिड़की जिससे महात्मा के घर कोई भी फांदकर आने की जहमत क्योंकर करे? कोई भी आ जाये और इस घर को बहुत परिचित ही बताने लगे। आखिर हर किसी का हक भी तो ठहरा।पर, फिर भी तारीख की कवायद से पड़े यह खिड़की ताकीद करती रहेगी कि वह आधी ही खुली थी।
देर से: मेरी एक प्यारी सी भतीजी है लखनऊ में रहती है और पता नहीं कब कैसे पर बापू से बहुत लगाव है उसे। पोरबंदर आने का उसका बहुत मन है और संयोग बन नहीं पा रहा। तो आज जब हमें पता चला कि सोमनाथ से द्वारका के रास्ते पोरबंदर से गुजरते हैं तब से कीर्ति मंदिर जो गांधी जी का जन्मस्थान हैं वहां तक उस छोटी सी भतीजी का ख्याल उतना ही आह्लादित करता रहा जितना मन गांधी जी को याद कर रहा था। फेसबूक लाइब भी उसी को ध्यान में रखते हुए साझा कर रहा था। बहुत कुछ है कहने सुनने को पर एक गली जिससे होकर हम वहां तक पहुंचे, मेरी भतीजी श्रेयसी और इस अधखुली खिड़की के बंद/खुले समय और संभावनाओं के नाम...

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पौने तीन पांतिक गाम

पौने तीन पांतिक गाम

कतेक रास कविता लिख देलक ललटुनमा,
नै भास भेटलै आ नै सोझरौल आखरे,
तैयो लिखैत रहल कविता पर कविता अपने ललटुनमा।
सत्ते कहै छी यैह पिपराही बाली ललमुनिया कनिया'क भातिज, ललटुनमा।
आ वैह दुरुखा कात कोन मे दबकल रहैबला ललटुनमा।
बहुतो बरख सं पढैत रहल ओ कविता आ चौपाई
दोहा आ सोरठा अप्पन गाम पर
लिखलाहा आखर लेकिन अनकर
बताह जेंका ओना मासी धंगैत तकैत रहल महराजी पोखैर परहक भालसरिक छाहैर तर सुसताइत बहलमान आ
पूबरिया महार पर नदी फिरैत ननकिरबीक फोटो
शाह पसीन दिस तकैत ललटुनमाक नोरैल आंखि जाहि सं दहो बहो गंगा जमुना बहैत अप्पनहिके तकैत रहल गामनामक कवित्त मे
लेकिन नै भेटबाक जे
शाह पसीन होय या अप्पन गाम
नहिये ने सुझाइत छैक।
बहुत रास लिख देला सं यदि भेटैक रहितै त
कनटोपा लॉटसाहेब के
भेट गेल रहितैक सौंस गाम।
अधहो आखर नै बेसी नै कम
भेटलै पौने तीन पांतिक गाम।
( कविता दिवस पर)

स्मृति शेष: जैक्सन हॉस्टल, पटना कालेज

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वही पुरानी राहदरी, वही इश्क इधर से उधर फिरते रहने का। 
बेमतलब, बेकाम तो नहीं रहा होगा कमरे के बाहर भटकते रहना उन दोपहरियों में जब भुबन का रेखा से हुए छुअन को पढ़ा होगा और कमरे से निकल ख्वावों का दरिया सिंचा होगा , ठीक यही इसी छत के नीचे । 
यहीं कहीं रह गयी होगी तुम भी तो शशि।


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विदा पूर्व दिशा, विदा पाटलिपुत्र, विदा मगध की सीढियां और भविष्य की गंध से मादित खंडहर रास्ते जहां वास है मेरी स्मृतिय़ां और मेरे प्रेमिका की हँसी।
वहीं उस सीढी पर उसी कोने में पसरी फुसफुसाहटों और तेज चलती सांसों को अपने झोले में डाल निकल पड़ा था जब, कहां अहसास रहा होगा कि सांसों की भी भला कोई गठरी हो सकती है? किसी ने सिखाया भी तो नहीं कि रास्ते कहीं ले कर नहीं जाते पथिक को। रास्ते आत्म मुग्ध हुआ करते हैं। रास्ते जानते हैं मायावी विद्या। या यों कहें कि रास्ते ही मायावी सुंदरी का एक दुसरा रुप है। वे आपको भ्रम देते हैं कि वे महज माध्यम हैं, एक जरिया भर गंतब्य तक पहुंचाने का जिम्मा भर है उनका। पर, असल में मगध में महज सीढियों का ही वास है। इन्हीं के कोने में बायें से सवा चार आंगुर पर नीचे से गमछे भर उंचाई पर ठीक मध्य में जो सिंदूर बिंदु है वहीं तुम्हारी सांसो को सजोये खड़ी है सीढियां। बुलाती है पास कुछ इस आस से कि वे बेचैन हैं तुम्हें तुम्हारी अमानत सौंप देने को। मानों जो सांस तुमने साथ ले ली थी वह अब भी वहीं उस मायावी ने बड़े जतन से संजोये हुई है। कोने न हुई मुआ कोई एटीएम हो जैसे।

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तस्वीर जो मेरे कैमरे ने ली नहीं कभी, कहीं।
चिपक सी गई है दीवार पर कुछ इस तरह जैसे किसी ने फोबीकोल का पीपा उलट दिया हो। उस ढाई फूटे फ्रेम में एक केतली है, रेझकी जमा चार दुअन्नी के
एक सिलबरिया तसला और दबदब उज्जर देह पर झरकल दाग बाले टुकटुक ताकते लिट्टी के सतरह गोले।
इस तस्बीर में सात सोहल लहसून , एक सिलबरिया थारी और छिपली तीन भी वैसे ही टुकुर टुकुर मुंह बाये
हर आनेजाने बालों को हसरत की नजर से देख रहे हैं।
किनारे से जहां तस्वीर का फ्रेम चनक गया है वहां एक अध वयसु महिला की सी आकृति है, शायद झुक कर सुलगती आग की मैनेजमेंट कर रही हो। इस उम्र में देह जान ही जाता बिन आखर के ही आग की दुनियादारी।
सतरहो चिंहती हैं अपनी अपनी गहकियों को। पर, उनके आने में अभी देर है। पहले आयेगा साइकिल पर दुनिया के बोझ तले। घनी चौड़ी रौबदार मूंछों और दबे कंधे पर अपने से सबा गुना लंबा बंदूक लटकाये कप्तान सिंह।
एक पांव को जमीन पर टिकाने का जतन कर बुढ़िया को साइकल के हैंडल में लटका सबा कनमा कड़ुआ तेल दे बिदा हो जाएगा कप्तान सिंह बगैर मुंह से शब्द एक भी निकाले।
फिर, सामने से गुजर जायेगा, ठेला छितन महतो का जिसपर, बैठी उसकी बेटी देखती रह जाएगी अपनी रोज की इन सतरह सहेलियों को।
आस लिये छित्तन के छौड़ी की आंखे, जिसके नजर से नजर मिलाती लिट्टयां हॉय-बॉय करेंगी। इस सबके बहुत बाद आयेगा राम सनेही और उसका लपैक लफंदर ललटून महतो। फचर फचर करता, फन्ने खां समझता।
राम सनेही के लिये दो और फन्ने खां के लिये एक, कुल तीन बिदा हो जाएंगी एक साथ...रह जाएंगी कहने गिनने को कुल जमा चौदह। पर, जो गिनती में नहीं रह पाता उसका क्या? सतरह से चौदह, चौदह से तेरह...नौ...सात...तीन और सबसे अंत में रह जाएगी एक अकेली छुटकी, अगली सुबह तक के लिये।अपनी सतरहो की सझिया आस लिये। यही हर रोज यदि होना तय हो, तो क्यों नहीं बनाती है बुढ़िया सोलह ही?
यही एक सवाल पुछती रहती हर शाम, इतने बरस से। मानो यह कोई सवाल न हो, जीने का सलीका बन गया हो
लिट्टियों के श्राद्ध से जनमा सलीका।
फिर गहरायेगी रात, फिर छिड़ेगी बात चांद की और चांदनी की,
और, गुलमोहर की चुहल पलकों में संजोये सो जाएगी तस्वीर के तीसरे कोने में सतरहो की याद संजोये।

शशि और शेखर

1

सबसे पहले तुम, शशि। 
इसलिये नहीं कि...
इसलिये भी नहीं कि...
और, इसलिये तो नहीं ही कि...
कम परते जाएंगे तैंतीस ऐसे इसलिये 
फिर भी मैंने जिद्द पकड़ ली है। तुमसे ही तो सिखा है मैंने जिद्द करना।
सबसे पहले तुम, शशि।इसलिये कि शेखर शशि नहीं है। शेखर शशि सा भी नहीं हैं। तो शुरुआत इस नकारात्मकता से क्यूंकर आखिर। पर, ऐसा करने बाला भला मैं पहला भी तो नहीं। शेखर शशि सा नहीं, यह मायने नहीं रखता। दो व्यक्तित्व क्यों कर समान हों? लेकिन, शेखर शशि सा होने की कभी इच्छा भी नहीं रखता।शेखर के बनने में शशि को मिट जाना था। इस मिट जाने से शेखर का पुरुष बन पाया। इसमें शशि ने अपने को न्योछावर कर दिया। कतरा कतरा, तिल तिल। शेखर में पुरुष वह सब खोज लेता है जिसकी अभिलाषा उसे होती है। शेखर में शशि ने भी सबकुछ तो पा ही लिया। पर, शेखर तुम नारी नहीं बन पाये। तुम रह गये निरा पुरुष ही।



2


शेखर, तुम स्त्री तो नहीं ही हो सके। शशि सा होने का यत्न तो कर ही सकते थे। पर, नहीं। तब॒ हमने महात्मा को अतीत में धकेलने का जिम्मा जो उठा रक्खा था। तुम, शेखर नेहरु सा बन जाना चाहते थे। कमला, शशि। शशि/ कमला बिमारी में चल बसी।
तुम तो शेखर मुसलमान भी नहीं हुए। तुम हरिजन और दलित भी नहीं हो पाये। तुमने रोमांस और दुख दोनो का अर्जन किया। विरासत में न तो तुम्हें दुख मिला, न ही अपमान। जब तुम अपने लंबे और बेढ़ब हाथ को छुपाने का जतन कर रहे थे, उस समय भी तुम्हारी स्मृतियां निजु ही तो रही। कब तुमने भोगा वह जिसपर तुम्हारा कोई बस नहीं हो? कब तुम्हें मिला तिरस्कार और उपेक्षा थाती में? औपनिवेशिक तिरस्कार की स्म़ति, अपराधी करार दे दिये जाने ने जब तुम्हें दुख और दुख से दृष्टि दी-- विजन, तब क्या तुमने सोचा मुसलमान के बारे में, दलित के बारे में और स्त्री होने की क्या अभिलाषा की कभी तुमने?
तुम एक वैश्विक नर होना चाहते थे। बंधनमुक्त, अपने निजुता में परिपूर्ण। स्वतंत्र। पूर्ण। अंग्रेजी कविताओं और संस्कृत से उर्जा लेते हुए। उपमहाद्वीप के दक्षीण में बचपन से लेकर, गंगा पर बहते हुए स्मृतियों के साथ, पश्चिम से पूरब को लांधते हुए। बोगनबेलिया की डांठ को खोसते हुए कभी कुसुम और चंपा की याद तुम्हें नहीं आयी? क्योंकर, शेखर?
इतिहास और साहित्य और प्रांजल भाषा और नक्शे बाले भूगोल के चौखटे से जरा बाहर तो निकलते। जरा सा करते लोक का पसारा, शेखर।
महज रात ही तो है इक चादर, जो बची रह गयी मेरे देह पर...
मेरे घाव से अब नये पीव भी नहीं आते।
मवाद के बदले रीस रीस कर बहराते हैं शब्द।
वह भी संतुलित, सुरुचिपुर्ण, सुंदर और सोद्देश्य।
अब-तब में न तो अ का डंडा टेढ़ा होता है और न ही ब का पेट बड़ा।
सीघी सी लकीर है सांस लेते जाने की।

टुटलाहा हवाई चप्पल

हवाई चप्पल त अखनो खियैत हतैक।
फित्ता त अखनो टुटैत हेतैक।
घसटैत पैर सं टुटल फित्ता बला चप्पल हाथ मे नेने मुरली अखनो सुन्नेरि क सामने मुंह नुकबैत अप्पसयांत होईत हैत।
नकटी गली क मोड़ पर टुटलाही चट्टी क फित्ता सेहो ओहिना गंहाईत हेतैक।
सोंहगर, गुंहगर।

अपराजिता

बांये कान के ठीक ऊपर, करीब एक कंगुरिया उंगरी छोड़ कर संतो की नवकनिया ने अपने बालों में एक अधखुली अपराजिता खोंस ली।
 ...'धत पगली कहीं की! ई फूल कहीं केस में कौई ख़ोपे है?', पिलखुआर बाली अपनी जईधीं पर झिरकते बोली।
' ऊ का है कि राधे के पप्पा को ईहे फूल बाली छापी की साड़ी बहुते पसिन है। त हमनी सोची कि एगो कली केस में खोंस लें। आप कहती हैं तो हम हटा लेते हैं।'

मेरे हॉस्टल का कमरा और दुपहरी यादें

उन्हीं दोपहरियों में जब आंखे कमरे की लंबाई नाप कर 
इसी दरबाजे के पोरों और कुंडी तक दबे पांव आती। 
और फिर, उल्टे पांव तेजी से वापस लौट आती, 
अपने में ही सिमट जाते जाने के लिये.

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Tuesday, December 27, 2016

Bhagat Singh: Why I am an Atheist

Listen to Bhagat Singh: Why I am an Atheist by Sadan Jha #np on #SoundCloud https://soundcloud.com/sadan-jha/bhagat-singh-why-i-am-an

Monday, December 19, 2016

अनुपम मिश्र: एक श्रधांजलि

कुछ कृतियाँ ऐसी होती हैं कि मन पर एक पक्की लकीर खींच कर रख देती है. किताब के पन्ने, उसमें निहित जानकारियां, उसका भूगोल और उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि सब कुछ किताब पढ़ जाने के बहुत अरसे बाद तक भी आपके साथ चलते हैं. सरल शब्द बृहत् आकार ले लेते हैं. किताब का समाज आपको अपना ही समाज लगने लगता है. किताब के उत्स का भूगोल अपनी सीमाओं को लांघ कर आपके होने में रच बस जाता है. साथ ही साथ रहता है उसका लेखक. उसकी अदृश्यता में आप अपने होने के प्रति आश्वस्त बने रहते हैं. कि आपको यह लगता है कि वे हैं तो आपकी संवेदना बची हुई है. वे हैं तो आपके समय में कुछ ऐसा स्पर्श शेष है जो आदमी को आदमी बनाये हुए है. मशीन में तब्दील होने से, प्रगति, आधुनिकता और विज्ञान के अंधाधुंध गोलीबारी से एक तिनका भर प्राण तत्व को बचाए रखने का झूठा सच्चा सकून दिलाता एक सरल व्यक्तित्व.
अनुपम मिश्र कुछ ऐसी ही सख्सियत थे. वे आज हमारे बीच नहीं हैं.
मैं उनसे एक दो ही बार मिला. मिलना भी क्या महज दो चार पल की औपचारिकता. यह कहना अधिक बेहतर होगा कि एक दो बार ही उनको देखा. पर, उनकी उपस्थिति सदैब बनी रही तब से ही जब से उनकी किताबें पढ़ी. उन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के मानसरोवर हॉस्टल में रहा करता था. सीनियर प्रभात रंजन इनके बारे में बताया करते. फिर उन्हीं के मार्फ़त अनुपम जी की दो किताबें पढ़ी: राजस्थान की रजत बूंदें और आज भी खड़े हैं तालाब. फिर, रहा न गया. प्रभात जी ही की मदद से इन दोनों किताबों को ख़रीदा. सहेज कर रखने के लिए, गाहे बगाहे किताबों को फिर फिर से पढने के लिए. पर, यह हो न सका. ऐसी किताबें भला यदि एक जगह टिक सकती तो फिर मैं ही कहाँ पढ़ पाता इन्हें. मैं भी तो पहली दफ़ा किसी और ही की किताब पढ़ी थी. खैर, न तो बढियां किताबें एक जगह टिक पाती है, न ही उनमें पसरा ज्ञान का लोक ही. और, न ही उनके लेखक. वे भी आज नहीं रहे.
अनुपम जी को अधिकतर लोग एक गांधीवादी पर्यावरणविद के रूप में जानते हैं. उन्होंने जिस सरलता से और जिस संवेदना से राजस्थानी परिवेश में, भाषा से समाज से, शिल्प और विज्ञान से जोड़कर जल और जीवन की बात कही वहाँ पर्यावरण महज एक सामजिक एक्टिविज्म  की एक कैटेगरी नहीं रह जाती. यह नहीं कि प्रयावरण पर व्याख्यान सुनना है तो हाल संख्या दो बटे चार पर जाएँ और अर्थव्यवस्था पर बहस के लिए हाल संख्या तीन गुणे नौ की तरफ मुड़े. अनुपम जी के लिए यह एक जीवन पद्धति रहा. एक ऐसी समग्र दृष्टि जहां आप पानी को भाषा से व्यवहार से जैसे ही अलग किये और चौबीस घंटे पाईप वाटर सप्लाई के महानगरीय आधुनिकता के छलाबे में जैसे ही पड़े वैसे ही आपका बंटाधार.
इसलिए पानी को केंद्र में रखने के बाद भी अनुपम जी के लिए यह न तो एक असंपृक्त ईकाई रही और न ही महज एक प्राकृतिक संसाधन.
बहुत सी बातें हैं कहने की और लिखने की. सबकुछ न तो लिखा जा सकता न ही कहा. हाँ जैसे उनकी किताबें थी. जिस तरह की सुरुचिपूर्ण सजाबट थी. जिस सरलता से कही गयी थी बेहद गूढ़ बातें. जिस गहरे दृश्यबोध का परिचय देती थी उनके किताबों की तस्वीरें, वो उन दिनों मेरे जैसे अबोध हिंदी पाठक के लिए बेहद आश्चर्य में डालने बाला भी था. पर, इसका यह कतई मतलब नहीं था कि उनका सौन्दर्य बोध प्रकाशन की, ज्ञान की राजनीति के प्रति ज़रा भी लापरवाह था. उन्होंने अपनी किताबों के कॉपी राइट अधिकार को मुक्त रखा. यह उन दिनों मेरे लिए एक सुखन जानकारी तो थी ही पर, आज के माहौल में भी सोचता हूँ तो यह एक बड़ी और समय से आगे की बात लगती है.
अनुपमजी की राजनीति अबोध भाव लिए थी. एकदम सरलता से सौम्यता से क्लिष्ट तार उनकी उलझी गांठें सुलझाकर बेबाकी से सामने रख देने बाली. करीब पंद्रह बीस साल तो हो ही गए होंगे उनको मसूर दाल और सामाजिक विकलांगता पर सुने हुए. दिल्ली विश्वविद्यालय में ही किसी ग्रुप ने बुलाया था. आज भी मृदु लहजे मे धीरे धीरे कहे गए उनका भाषण दिमाग में किसी डंके की भांति बज रहा है. बाद में, एक दफे मैं भी उनको पानी और शहर के ऊपर वक्तब्य देने के लिए आमंत्रित किया. वे मुझे नहीं जानते थे, पर स्वीकृति देने में जरा भी कोताही नहीं की. जिस माहौल में यह समायोजन था वह कई तरह से अभिजात्य होने का आभास भी देता था और इससे वे कुछ असहज भी रहे, ऐसा मेरा अनुमान है. यह बहुत लाजिमी भी था. वे अंग्रेजीदां के बजाय आम लोगों के बीच अधिक सहज रहा करते, ऐसा मेरा अनुमान है.  
अनुपम जी के बारे में यदा कडा कुछ पढने कुछ सुनने को भी मिला जिनसे चम्बल की बीहरों में जयप्रकाश नारायण के साथ उनके द्वारा डाकुओं के सामुहिक आत्म समर्पण की जमीन तैयार करने में उनकी भूमिका का कुछ पता चला. पर, एक विस्तृत रपट इस बाबत शायद लिखा जाना शेष ही है. वैसे भी वे संकोची स्वाभाव के व्यक्ति थे और लोग बाग भी इसे भूल ही गए हों, यह भी मुमकिन है.
खैर, जो भी हो, हमने आज समाज के बेहद शांत चित्त ऐसे स्तम्भ को खोया है जितने बड़े  सामजिक कार्य कर्ता थे उतने ही अद्भुत लेखक और वैसे ही कहनकार.  
उनका आज चले जाना बहुत से अर्थों में मेरे लिए गांधीवादी व्यक्तित्व के अंत का संकेत है. 

Sunday, October 30, 2016

Regal hotel, Darbhanga रीगल हॉटल, दरभंगा

Listen to Regal hotel, Darbhanga रीगल हॉटल, दरभंगा by Sadan Jha #np on #SoundCloud https://soundcloud.com/sadan-jha/regal-hotel-darbhanga

Saturday, October 29, 2016

Tuesday, May 31, 2016

कामेडी, कार्टून और हंसी की राजनीति

तन्मय भट्ट के कमेडी पर सोच रहा हूं. हास्य व्यंग एक मान्य विधा रहा है. कॉमेडी और राजनीति का भी लंगोटिया नाता रहा है. बिरोध की अभिव्यक्ति. चाहे राज सत्ता का हो, चाहे व्यक्ति के देवीय होते जाने की सत्ता हो. दूसरी तरफ यह व्यंग अक्सर ही उसी प्रचलित भाषा, बिंब और स्टिरियोटाईप्स का सहारा लेता है जिससे पारंपरिकता, पुरुष सत्ता, जातिवाद, जैसे गंभीर शत्रुओं को फैलने के लिये अधिक आकाश मुहैया हो जाता है. पर, इन तमाम पेचिदगिंयों के बाद भी जो तार कायम रहता है वह यह कि दूसरे किसी कला की भांति कॉमेडी का हर उदाहरण एक स्टेटमेंट होता है. कभी स्पष्ट और मुखर और रैडिकल तो कभी प्रच्छन्न, अप्रत्यक्ष और कन्जरवेटिव. कभी व्यंग (चुटकुले, प्रहसन, कार्टून, कैरिकेचर, कॉमेडी आदि) जो अपनी संकल्पना में ही रिप्रेजेंटेशनल आर्ट ( इतिहास, फोटोग्राफी, पोर्टेट आदि) से भिन्न होता है अपनी माध्यम मात्र के जरिये हमें अपने होने के, अपनी समाज के और अपनी समय को देखने परखने के लिये एक भिन्न नजरिया प्रदान करता है. और, हमारी दृष्टि, आम और खास के प्रति हमारी सोच में किसी न किसी स्तर पर कुछ न कुछ जुड़ जाता है, कुछ घट जाता है. कभी गंभीरता से गुदगुदा जाता है तो कहीं मासुमियत से हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं अपनी ही कहकहों पर ढहर कर सोचने को. शायद यही कारण हो कि व्यंगकार, कॉमेडियन और कार्टूनिस्ट के ऊपर सबसे तीखे हमले हुआ करते हैं. फ्रांस के चार्ली हेब्दो पर हुआ आतंकवादी हमला हो या फिर एनसीईआरटी के पाठ्यपुस्तक में अंबेडकर-नेहरु कार्टून का विवाद हो, नरेंद्र मोदी पर कार्टून बनाने बाले हरिश यादब उर्फ मुशब्बूर को रातो रात इंदौर से गिरफ्तार कर लिया जाता है. प्रोफेसर अम्बिकेश महापात्रा को बंगाल में ममता बनर्जी के कार्टून को महज फार्वर्ड करने के लिये गिरफ्तार होना होता है. या फिर, असीम त्रिवेदी को पार्लियामेंट के कार्टून के लिये लंबी कानूनी जद्दोजगद से गुजरना होता है. क्या आपने किसी फोटोग्राफर या फिर किसी कहानीकार या कवि को हाल के दशकों में इतना प्रताड़ित होते पाया है? (हाँ, यहाँ पत्रकारों की बात अलहदा है, अक्सर उनके मार दिए जाने की उन पर हमले की और उनके ऊपर कानूनी कार्यवाही की खबर आ ही जाती है). पहले के दौर में भी बहुत उदाहरण नहीं मिलेंगे. हां, उपनिवेशिक युग, मशहूर अफसानानिगार मंटो के बहुचर्चित प्रकरणों, इमरजेंसी के दौर की बात तो खैर उल्लेखनीय है ही. फिर, हाल में समाज विज्ञानी, मनोविज्ञानी आशिष नंदी को भी लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी तो पड़ी ही. पर, क्या किसा फोटोग्राफर या एक्टर को उसके फोटो या एक्टिंग के लिये गिरफ्तार होना पड़ा है? हाल में तो नहीं.जो कार्टून हाल में आतंकी हमले या सरकारी तंत्र के चपेट में आये वे कोई बहुत  उम्दा कला के उदाहरण भी नहीं हैं. कोई गहरी राजनीतिक समझ दिखाते भी नहीं मिलते हैं.
तन्मय का सचिन- लता मंगेशकर कॉमेडी फूहड़ और बेपेंदी का है जिसमें गालियॉं और हंसी दोनो ही जबरन ठूंसी गयी हो. मैं, खुद को, अपने बिरोध के तमाम सूरों के, राजनैतिक प्रतिरोध और सत्ता की तमाम आलोचनाओं के बाद भी इस कॉमेडी के साथ खड़ा पाने में अक्षम पाता हूं. पर, कॉमेडियन के गिरफ्तारी की मांग, हर बात को कानून और पुलिस तक ले जाने की राजनीति! यह तो कोई बात नहीं हुई. क्या हम एक ऐसे समय में सॉंस ले रहे हैं जहां हर निर्णय, हमारे विवेक और नैतिकता की हर नब्ज या तो भीड़ तय करती है या पुलिस तय करे. कुछ कला सराहनीय होती है तो बहुत सी नजरअंदाज करने के लिये भी तो होती है. और वहीँ तय होता होता है कि कौन कलाकार उम्दा है और कौन नहीं.

Wednesday, May 18, 2016

British Library /ब्रिटिश लाइब्रेरी


Image: Sitting on History, 1995, Bill Woodrow, British Library, London

देखो तुम्हारा नाम नताशा, जूलिया, जेन, लूसी, मार्ग्रेट या फिर ऐसा ही कोई ब्रिटिश नाम होना चाहिये. प्रोपर ब्रिटिश. नहीं, मुझे गलत नहीं समझो. मुझे तुम्हारा नाम बहुत अच्छा लगता है. पर, शायद मैं जो कहना चाह रहा हूं वह यह कि तुम्हे देख कर फिर तुम्हारा नाम जानकर दोनो से एक ही छवि नहीं बन पाती. किसी बहुत प्लीजेंट सरप्राइज सा लगता है तुम्हारा नाम सुनना. जूनी. 
हम लोग उसी पुराने जगह पर बैठे हैं. सेंट पैंक्रियास, ब्रिटिश लाइब्रेरी. मेजनाइन फ्लोर. बैंच पर. सामने चार्लस डिकेंस के रहस्यमय और अंधविश्वासों की दुनिया पर पिछले पखवारे से एक्जीविशन चल रही है. दोपहर के करीब दो या ढाई बज रहे होंगे. समय का अहसास ही कुंद सा हो गया है, जबसे जूनी से मुलाकात हुई. यहीं इसी जगह, इसी राहदरी में. इसी बैंच पर. यही एक्जीविशन को देखते हुए हम मिले थे. मिले क्या थे? हमारी बातचीत शुरु हुई थी. पहल, जाहिर सी बात है, उसी ने की थी. नहीं तो कहां हो पाता मुझसे बात करना! पर, जब बातों का सिलसिला निकल पड़ा तो कौन कहां रुकने बाला था. मैं तो सोचता कि मैथिल ब्राह्मन से गप्पवाजी में कौन टिक पायेगा. पर, यह ब्रिटिश लड़की तो मुझे मात दे रही थी. या फिर, कह सकते हैं कि उसकी बातें सुनना, चुपचाप रहते जाना अपने कानो के सहारे भाने लगा है.
खैर, उसकी प्रतिक्रिया स्वभाविक रुप से त्वरित आयी.
" ये प्रोपर ब्रिटिश क्या होता है? मुझे नहीं लगता था कि तुम ऐसे शुद्धता वादी नजरिया रखते होगे. अभि भी मेरा वही विश्वास है तुम्हें लेकर. पर, तुम मुझे ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से चौंका देते हो. और, मैं तुम्हारी तरह प्लीजेंटली सरपराइज्ड नहीं हूं. यह निराशाजनित ही है. या फिर उसकी सिमांत पर कहीं. और फिर, तुम तो इतिहास के हो, प्रेक्टिशनर( वो हमेशा यही कहती, शोधकर्ता या छात्र कहना उसे नहीं सुहाता; हां जिस दिन चुहल के मुड में होती तो प्रोफेसर कहती और इठलाकर अपनी पोनी टेल संवारने लगती)."
" देखो जूनी, मेरा दिमाग हमेशा तर्क और ज्ञान की भाषा नहीं बोलता. पता नहीं क्यों मेरे जेहन में जूनी से साउथ इस्ट एशियन छवि या फिर स्पैनिश लैटिन अमेरिकन अहसास होता है. इसकी कोई वजह भी नहीं है. कमसेकम मुझे इसका इल्म नहीं है. पर, ऐसा ही है मेरे साथ. फिर, लंदन और ब्रिटिश समाज के बारे में जानता भी तो कुछ नहीं."
"हुम्म! ये जो तर्क की अपूर्णता और जेहन की भाषा की बात जो कही तुमने वह बेहद ठहरी हुई बात है. " ओठों के किनारे पर आती हुई बहुत सुकुन भरी मुस्कुराहट को संयत करते उसने बात आगे बढ़ायी. " एक राज की बात बताती हूं ब्रिटिश लड़की को अपने नाम पर चर्चा लंबी करने में बेहन गुदगुदी सा अहसास होता है. शायद तुम्हें पता है. पर, छोडो अभी. हम नाम पर फिर कभी जरुर लौट कर समय गुजारेंगे. अभी जो ये तुमने बात से बात निकाल दी तर्क की दुनिया.. ज्ञान और दैनिक व्यवहार में के बीच के फासले ...इसका सत्य.
अपनी आंखे सामने चार्ल्स डिकेंस के रहस्यमय संसार के एक एक्जीविट पर ही टिकाये उसने कहा: जानते हो प्रोफेसर, सत्य को कहां टिका पाओगे? "
जिस अंदाज में सबाल आया यह समझना मुश्किल हो गया कि उसका अभिप्राय मेरी बातों से है या फिर चार्ल्स डिकेंस के इस रहस्यमय दुनिया से जिसकी जमीन सामने चल रही एक्जीविशन तैयार कर रही दिखती है.
" सत्य...सत्य का तर्क से सीधा कोई नाता नहीं. यह तो विज्ञान ने अपनी सहुलियत के लिये तर्क की इमारत खड़ी कर रखी है.
जिस अनुभव पर आपका विश्वास हो और जिसपर आप दुसरों को विश्वास दिला पायें वही सत्य है".
" तो बात दरअसल विश्वास की है." कहते हुए उसने एक गहरी नि:स्वास छोड़ी. पतले गले में हल्की रेशमी हलचल सी उठी हो मानो. दायीं कान पर आ गयी लटों को उंगलियों के पोरों से समेटते हुए पीछे लेते चली गयी, जूनी.

Friday, March 18, 2016

"भारत माता और लडती हुई उसकी सन्तान: श्री कमला Bharat Mata and Her Quarreling Sons, From Shree Kamla (1910-1920)

अभी पुराने फोटो खंगालते वक्त ये मिला:
नीचे की पंक्तियाँ है:
"पुत्र तुम यह क्या करते हाय
हमीं पीलाया दूध सभी को पोसा अन्न खिलाय
आपस में फिर क्यों तुम लड़ते ममता मोर बिहाय
कट मरौ भाई भाई सो अचरज बड़ी लखाय
गले मिलो अबहूँ तो प्यारे हम सन लाखा न जाय"

श्री कमला से उद्धृत जो भागलपुर से निकला करता था




Friday, February 05, 2016

सुबह की सैर

आज सुबह सैर से लौटते हुए सड़क के किनारे जहां पक्की का कालापन खत्म होता है वहीं रेत मिट्टी पर दो सिक्के दिख गये. हम उस वक्त पड़ोस के सोसाइटी के गेट के सामने थे. हठाथ ही नजर उस तरफ मुड़ गयी. शायद मन में भय रहा हो कि कहीं कोई सिक्के उठाते देख तो नहीं रहा. शायद इस उम्मीद से कि कोई नजर आये तो पुछ कर उसकी संपत्ति वापस कर एक नैतिक जिम्मेदारी का निर्वहन ही कर लूं. पर, वहां कोई न दिखा. मैंने भी तब तक स्वभाविक रफ्तार में सिक्के उठा लिये थे. अब सबाल था कि इनका क्या किया जाय?
मन स्वत: ही बचपन की ओर मुड़ गया. याद आया हमेशा इस आस में रहना कि क्या गजब हो कि सुबह स्कूल जाते हुए या फिर शाम खेल से लौटते वक्त सड़क के किनारे पैसे मिल जाय. सपने बुने जाते. नैतिकता पहरे लगाती. पेपर में यदा कदा छपी रपटें ताकीद करबाती कि फलाने रिक्सेबाले ने नोटों की गड्डी थाने में जमा करबा कर एक आदर्श उपस्थित किया. खाली समय में दूर के रिश्तेदारों द्वारा पूछे सबाल याद आते --'अच्छा बताओ यदि तुम्हें रास्ते पर चलते हुए कभी नोटों से भरा बैग मिल जाय तो क्या करोगे? ' वो हमे तौलने के लिये यह सबाल पूछते. हम उन्हें अपने मूड के हिसाब से भटकाते. कभी नैतिक चरित्र का परिचय देते. तो, कभी कंज्यूमर संस्कृति की विशालता से अवगत करबाते.
खैर हकीकत में कभी ऐसा कोई बैग मिला नहीं आजतक. न ही कोई खजाने का नक्सा ही. पर, नसीब अपनी इतनी भी गयी गुजरी कभी न रही कि फुटकर पैसे न मिले. दरअसल, हम चाहते भी यही थे. नोटो की गड्डी या बैग मिल भी जाय तो तमाम तरह की पेचिदगियां साथ आने के खतरे हुआ करते. इसलिये आस रखते कि फुतकर सौ पचास के या दस पांच के नोट ही मिलबाना. यह आस यथार्थ के अधिक करीब भी गता और देश-काल की अपनी समझ के धरातल पर प्रोबेबिलिटी के जटिल कैलकुलेशन पर बनते. पर, दस पांच के नोट भी नहीं मिले. सबसे अधिक दफे यदि अपने खाते कुछ आया तो पच्चीस पैसे के सिक्के. गोल गोल, छोटे छोटे. पंच पियाही और बीस पियाही, वही ताम बाला, भी हाथ आये. पर, पचीस पियाही की बात ही निराली. इन बिरले छणों में अक्सर यही होता कि पैसा मिलने की खुशी छण भंगूर हुआ करती. अगले ही पल अहसास होता कि चवन्नी अपनने ही हॉफ पेंट के दांयी जेब के छेद से सरका हुआ अपराधी था.
खैर, वो तो बचपन था. आज जब किसी को आस पास न देखा तो सोचा स्कूल जाते किसी बच्चे की जेब से सरक गया होगा. पर, इन सोसायटी के बच्चे खुदड़े सिक्क् भला क्यूंकर ले जाये? फिर, लगा कि हो न हो यह ऑटो से सुबह सुबह उतरे किसी मजदूर या काम करने बाली केहाथों से फिसल गया हो. मन में कचोट हुआ. दो सिक्के थे, एक दो का और एक एक का. सोचा पास ही किनारे पर रख दूं जिसका खो गया वह खुद आकर ढ़ूढ़ लेगा. पर, मन इसे युक्ति संगत न माना. सोचा आगे किसी सेक्युरिटी गार्ड को देदूंगा. खुश हो जाएंगे. जब अपने सोसायटी के गेट पर आया तो संयोग या दुर्योग से वहां उस वक्त कोई न मिला. कहीं टहलकर बतिया रहे होंगे. हैं तो वे भी इंसान ही, फिर कठीन और लंबी ड्यूटू भी बजानी होती है. इधर उधर ही होंगे. पर, खोजकर महज तीन रूपये देना जंचा नहीं. सोचा आगे अपने बिल्डिंग के टॉवर बाले वॉचमेन को दे देंगे. कुछ ऐसा योग कि वो भी नहीं मिला. तीन रूपये के साथ घर आ गया. लक्ष्मी का आर्शीवाद भला कहीं छूटता है. यदि हाथ से जाना ही लिखा होता तो लक्ष्मी भला इतने में मुझे ही खोजकर ये तीन रूपये क्यों पकड़ाती?

Tuesday, February 02, 2016

गिरीन्द्र नाथ झा, इश्क में माटी सोना. लप्रेक.

जगहों में पदानुक्रम हुआ करता है. ऊंच-नीच, भेद-भाव, अगड़ा-पिछड़ा...जैसे हमारा समाज जाति, धर्म, वर्ग, लिंग आदि खांचों में बंटा है उसी तरह जगहों के अपने खांचे हुआ करते हैं. अपने अपने तयशुदा दड़बों में जिंदगी गुजारने को अभिशप्त.
और, फिर हम यात्रा करते हैं इस शाप से मुक्ति की टोह में. सामाजिक और स्थानजनित भेद को लांघने की जद्दोजगद से लबरेज. एक जगह से दूसरी जगह. एक दायरे से दूसरे में. बृत से त्रिकोण, गुफा से जंगल, जंगल से गांव, फिर कस्बा, मुफस्सिल, शहर, और फिर महानगर. यह गमन एक रेखीय हो यह भी तो नहीं. रास्ते घुमावदार हुआ करते हैं. पेचिदगियां. खयाल की तरह जाते जाना भी और ध्रुपद की तरह सम की अनिवार्यता भी. यात्रा मानसिक धरातल पर हुआ करती है और भौगोलिक पर भी. शब्दो और सुरों की भी, विचारों की भी और पुन्य की तलाश की भी.
यह कतई जरुरी नहीं कि यात्राएं हमेशा जगहों के हाइरार्की को चुनौति ही दें. हममे से अधिकतर भेड़ चाल में यात्रा करते हैं. इससे तो जगहों की तय दादागीरी मजबूत ही होती है. जब हम इस भेड़ चाल से अलग होते हैं तो जगहों के बने बनाये खांचे को चुनौति देते हैं. गिरिन्द्र का लप्रेक, इश्क में माटी सोना कुछ इसी तरह जगहों की पक्की सड़क को लांघता है. पक्की से कच्ची पर लौटते हुए तीसरी कसम का गाड़ीबान "लीक और बैलों पर ध्यान लगाकर बैठ गया. राह काटते हुए गाड़ीबान ने पुछा-'मेला टूट रहा है क्या भाई?'...छत्तापुर- पचीरा कहॉं है? कहीं हो, यह लेकर आप क्या करियेगा?"
मन, बैलगाड़ी के टप्पर से मुक्त निरगुण गाने लगता है -- "अरे, चलु मन,  चलु मन ससुरार जइवे हो रामा,
कि आहो रामा,
नैहरा में अगिया लगायब रे- की••• "
कहीं और ही से पंकज मलिक की तान गुंजती है --'मन रे तु काहे न धीर धरे... ओ निर्मोही..."

चनका-पुरेनिया- दिल्ली-चनका. शब्द, स्मृति, अनुभव, उलझने और आस. सब तैरते हैं यहां इस लप्रेक में. ऐसी ही हूक जगाती आस में "उसने धीरे से कहा--अबकी सावन में बारिश के लिये दुआ करूंगी' ".
विक्रम नायक के किरदार इस सुहानी मेघ की कथा कहते हैं, खुबसुरत लकीड़ों और शब्दों की पगडंडी पर हाथ थामे दो नन्हें पैर.
और परती परिकथा का जितेन 'सबकुछ' छोड़कर गांव लौट आता है. शब्द और बीज दोनो के साथ. आस के साथ. स्मृतियों के साथ, जो वहां भी थी. जो यहां भी हैं.
यहां जमीनी हकीकत कच्छपपीठा धरती की तान को सुरसा समान निगलने को मुंह फारे खड़ा है. तो साथ ही कबीराहा मठ की तान और दिल्ली में कॉफी मग की झाग पर गुनगुनाती फेनिल हँसी भी.
यह एक ऐसी सुरीली हँसी है जो दिल्ली के मुखर्जी नगर के कमरे की दीवारों से लेकर चनका के खेत और बंसबिट्टी तक पसरी हुई है... वही बंसबिट्टी जिसे स्नेहा 'बांस की बाड़ी'' ' कहा करती है.
गिरीन्द्र नाथ झा, इश्क में शहर होना ( चित्रांकण, विक्रम नायक), राजकमल, दिल्ली, 2015.