Listen to Regal hotel, Darbhanga रीगल हॉटल, दरभंगा by Sadan Jha #np on #SoundCloud https://soundcloud.com/sadan-jha/regal-hotel-darbhanga
Sunday, October 30, 2016
Saturday, October 29, 2016
Tuesday, May 31, 2016
कामेडी, कार्टून और हंसी की राजनीति
तन्मय का सचिन- लता मंगेशकर कॉमेडी फूहड़ और बेपेंदी का है जिसमें गालियॉं और हंसी दोनो ही जबरन ठूंसी गयी हो. मैं, खुद को, अपने बिरोध के तमाम सूरों के, राजनैतिक प्रतिरोध और सत्ता की तमाम आलोचनाओं के बाद भी इस कॉमेडी के साथ खड़ा पाने में अक्षम पाता हूं. पर, कॉमेडियन के गिरफ्तारी की मांग, हर बात को कानून और पुलिस तक ले जाने की राजनीति! यह तो कोई बात नहीं हुई. क्या हम एक ऐसे समय में सॉंस ले रहे हैं जहां हर निर्णय, हमारे विवेक और नैतिकता की हर नब्ज या तो भीड़ तय करती है या पुलिस तय करे. कुछ कला सराहनीय होती है तो बहुत सी नजरअंदाज करने के लिये भी तो होती है. और वहीँ तय होता होता है कि कौन कलाकार उम्दा है और कौन नहीं.
Wednesday, May 18, 2016
British Library /ब्रिटिश लाइब्रेरी
Image: Sitting on History, 1995, Bill Woodrow, British Library, London
देखो तुम्हारा नाम नताशा, जूलिया, जेन, लूसी, मार्ग्रेट या फिर ऐसा ही कोई ब्रिटिश नाम होना चाहिये. प्रोपर ब्रिटिश. नहीं, मुझे गलत नहीं समझो. मुझे तुम्हारा नाम बहुत अच्छा लगता है. पर, शायद मैं जो कहना चाह रहा हूं वह यह कि तुम्हे देख कर फिर तुम्हारा नाम जानकर दोनो से एक ही छवि नहीं बन पाती. किसी बहुत प्लीजेंट सरप्राइज सा लगता है तुम्हारा नाम सुनना. जूनी.
हम लोग उसी पुराने जगह पर बैठे हैं. सेंट पैंक्रियास, ब्रिटिश लाइब्रेरी. मेजनाइन फ्लोर. बैंच पर. सामने चार्लस डिकेंस के रहस्यमय और अंधविश्वासों की दुनिया पर पिछले पखवारे से एक्जीविशन चल रही है. दोपहर के करीब दो या ढाई बज रहे होंगे. समय का अहसास ही कुंद सा हो गया है, जबसे जूनी से मुलाकात हुई. यहीं इसी जगह, इसी राहदरी में. इसी बैंच पर. यही एक्जीविशन को देखते हुए हम मिले थे. मिले क्या थे? हमारी बातचीत शुरु हुई थी. पहल, जाहिर सी बात है, उसी ने की थी. नहीं तो कहां हो पाता मुझसे बात करना! पर, जब बातों का सिलसिला निकल पड़ा तो कौन कहां रुकने बाला था. मैं तो सोचता कि मैथिल ब्राह्मन से गप्पवाजी में कौन टिक पायेगा. पर, यह ब्रिटिश लड़की तो मुझे मात दे रही थी. या फिर, कह सकते हैं कि उसकी बातें सुनना, चुपचाप रहते जाना अपने कानो के सहारे भाने लगा है.
खैर, उसकी प्रतिक्रिया स्वभाविक रुप से त्वरित आयी.
" ये प्रोपर ब्रिटिश क्या होता है? मुझे नहीं लगता था कि तुम ऐसे शुद्धता वादी नजरिया रखते होगे. अभि भी मेरा वही विश्वास है तुम्हें लेकर. पर, तुम मुझे ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से चौंका देते हो. और, मैं तुम्हारी तरह प्लीजेंटली सरपराइज्ड नहीं हूं. यह निराशाजनित ही है. या फिर उसकी सिमांत पर कहीं. और फिर, तुम तो इतिहास के हो, प्रेक्टिशनर( वो हमेशा यही कहती, शोधकर्ता या छात्र कहना उसे नहीं सुहाता; हां जिस दिन चुहल के मुड में होती तो प्रोफेसर कहती और इठलाकर अपनी पोनी टेल संवारने लगती)."
" देखो जूनी, मेरा दिमाग हमेशा तर्क और ज्ञान की भाषा नहीं बोलता. पता नहीं क्यों मेरे जेहन में जूनी से साउथ इस्ट एशियन छवि या फिर स्पैनिश लैटिन अमेरिकन अहसास होता है. इसकी कोई वजह भी नहीं है. कमसेकम मुझे इसका इल्म नहीं है. पर, ऐसा ही है मेरे साथ. फिर, लंदन और ब्रिटिश समाज के बारे में जानता भी तो कुछ नहीं."
"हुम्म! ये जो तर्क की अपूर्णता और जेहन की भाषा की बात जो कही तुमने वह बेहद ठहरी हुई बात है. " ओठों के किनारे पर आती हुई बहुत सुकुन भरी मुस्कुराहट को संयत करते उसने बात आगे बढ़ायी. " एक राज की बात बताती हूं ब्रिटिश लड़की को अपने नाम पर चर्चा लंबी करने में बेहन गुदगुदी सा अहसास होता है. शायद तुम्हें पता है. पर, छोडो अभी. हम नाम पर फिर कभी जरुर लौट कर समय गुजारेंगे. अभी जो ये तुमने बात से बात निकाल दी तर्क की दुनिया.. ज्ञान और दैनिक व्यवहार में के बीच के फासले ...इसका सत्य.
अपनी आंखे सामने चार्ल्स डिकेंस के रहस्यमय संसार के एक एक्जीविट पर ही टिकाये उसने कहा: जानते हो प्रोफेसर, सत्य को कहां टिका पाओगे? "
जिस अंदाज में सबाल आया यह समझना मुश्किल हो गया कि उसका अभिप्राय मेरी बातों से है या फिर चार्ल्स डिकेंस के इस रहस्यमय दुनिया से जिसकी जमीन सामने चल रही एक्जीविशन तैयार कर रही दिखती है.
" सत्य...सत्य का तर्क से सीधा कोई नाता नहीं. यह तो विज्ञान ने अपनी सहुलियत के लिये तर्क की इमारत खड़ी कर रखी है.
जिस अनुभव पर आपका विश्वास हो और जिसपर आप दुसरों को विश्वास दिला पायें वही सत्य है".
" तो बात दरअसल विश्वास की है." कहते हुए उसने एक गहरी नि:स्वास छोड़ी. पतले गले में हल्की रेशमी हलचल सी उठी हो मानो. दायीं कान पर आ गयी लटों को उंगलियों के पोरों से समेटते हुए पीछे लेते चली गयी, जूनी.
Friday, March 18, 2016
Friday, February 05, 2016
सुबह की सैर
मन स्वत: ही बचपन की ओर मुड़ गया. याद आया हमेशा इस आस में रहना कि क्या गजब हो कि सुबह स्कूल जाते हुए या फिर शाम खेल से लौटते वक्त सड़क के किनारे पैसे मिल जाय. सपने बुने जाते. नैतिकता पहरे लगाती. पेपर में यदा कदा छपी रपटें ताकीद करबाती कि फलाने रिक्सेबाले ने नोटों की गड्डी थाने में जमा करबा कर एक आदर्श उपस्थित किया. खाली समय में दूर के रिश्तेदारों द्वारा पूछे सबाल याद आते --'अच्छा बताओ यदि तुम्हें रास्ते पर चलते हुए कभी नोटों से भरा बैग मिल जाय तो क्या करोगे? ' वो हमे तौलने के लिये यह सबाल पूछते. हम उन्हें अपने मूड के हिसाब से भटकाते. कभी नैतिक चरित्र का परिचय देते. तो, कभी कंज्यूमर संस्कृति की विशालता से अवगत करबाते.
खैर हकीकत में कभी ऐसा कोई बैग मिला नहीं आजतक. न ही कोई खजाने का नक्सा ही. पर, नसीब अपनी इतनी भी गयी गुजरी कभी न रही कि फुटकर पैसे न मिले. दरअसल, हम चाहते भी यही थे. नोटो की गड्डी या बैग मिल भी जाय तो तमाम तरह की पेचिदगियां साथ आने के खतरे हुआ करते. इसलिये आस रखते कि फुतकर सौ पचास के या दस पांच के नोट ही मिलबाना. यह आस यथार्थ के अधिक करीब भी गता और देश-काल की अपनी समझ के धरातल पर प्रोबेबिलिटी के जटिल कैलकुलेशन पर बनते. पर, दस पांच के नोट भी नहीं मिले. सबसे अधिक दफे यदि अपने खाते कुछ आया तो पच्चीस पैसे के सिक्के. गोल गोल, छोटे छोटे. पंच पियाही और बीस पियाही, वही ताम बाला, भी हाथ आये. पर, पचीस पियाही की बात ही निराली. इन बिरले छणों में अक्सर यही होता कि पैसा मिलने की खुशी छण भंगूर हुआ करती. अगले ही पल अहसास होता कि चवन्नी अपनने ही हॉफ पेंट के दांयी जेब के छेद से सरका हुआ अपराधी था.
खैर, वो तो बचपन था. आज जब किसी को आस पास न देखा तो सोचा स्कूल जाते किसी बच्चे की जेब से सरक गया होगा. पर, इन सोसायटी के बच्चे खुदड़े सिक्क् भला क्यूंकर ले जाये? फिर, लगा कि हो न हो यह ऑटो से सुबह सुबह उतरे किसी मजदूर या काम करने बाली केहाथों से फिसल गया हो. मन में कचोट हुआ. दो सिक्के थे, एक दो का और एक एक का. सोचा पास ही किनारे पर रख दूं जिसका खो गया वह खुद आकर ढ़ूढ़ लेगा. पर, मन इसे युक्ति संगत न माना. सोचा आगे किसी सेक्युरिटी गार्ड को देदूंगा. खुश हो जाएंगे. जब अपने सोसायटी के गेट पर आया तो संयोग या दुर्योग से वहां उस वक्त कोई न मिला. कहीं टहलकर बतिया रहे होंगे. हैं तो वे भी इंसान ही, फिर कठीन और लंबी ड्यूटू भी बजानी होती है. इधर उधर ही होंगे. पर, खोजकर महज तीन रूपये देना जंचा नहीं. सोचा आगे अपने बिल्डिंग के टॉवर बाले वॉचमेन को दे देंगे. कुछ ऐसा योग कि वो भी नहीं मिला. तीन रूपये के साथ घर आ गया. लक्ष्मी का आर्शीवाद भला कहीं छूटता है. यदि हाथ से जाना ही लिखा होता तो लक्ष्मी भला इतने में मुझे ही खोजकर ये तीन रूपये क्यों पकड़ाती?
Tuesday, February 02, 2016
गिरीन्द्र नाथ झा, इश्क में माटी सोना. लप्रेक.
जगहों में पदानुक्रम हुआ करता है. ऊंच-नीच, भेद-भाव, अगड़ा-पिछड़ा...जैसे हमारा समाज जाति, धर्म, वर्ग, लिंग आदि खांचों में बंटा है उसी तरह जगहों के अपने खांचे हुआ करते हैं. अपने अपने तयशुदा दड़बों में जिंदगी गुजारने को अभिशप्त.
और, फिर हम यात्रा करते हैं इस शाप से मुक्ति की टोह में. सामाजिक और स्थानजनित भेद को लांघने की जद्दोजगद से लबरेज. एक जगह से दूसरी जगह. एक दायरे से दूसरे में. बृत से त्रिकोण, गुफा से जंगल, जंगल से गांव, फिर कस्बा, मुफस्सिल, शहर, और फिर महानगर. यह गमन एक रेखीय हो यह भी तो नहीं. रास्ते घुमावदार हुआ करते हैं. पेचिदगियां. खयाल की तरह जाते जाना भी और ध्रुपद की तरह सम की अनिवार्यता भी. यात्रा मानसिक धरातल पर हुआ करती है और भौगोलिक पर भी. शब्दो और सुरों की भी, विचारों की भी और पुन्य की तलाश की भी.
यह कतई जरुरी नहीं कि यात्राएं हमेशा जगहों के हाइरार्की को चुनौति ही दें. हममे से अधिकतर भेड़ चाल में यात्रा करते हैं. इससे तो जगहों की तय दादागीरी मजबूत ही होती है. जब हम इस भेड़ चाल से अलग होते हैं तो जगहों के बने बनाये खांचे को चुनौति देते हैं. गिरिन्द्र का लप्रेक, इश्क में माटी सोना कुछ इसी तरह जगहों की पक्की सड़क को लांघता है. पक्की से कच्ची पर लौटते हुए तीसरी कसम का गाड़ीबान "लीक और बैलों पर ध्यान लगाकर बैठ गया. राह काटते हुए गाड़ीबान ने पुछा-'मेला टूट रहा है क्या भाई?'...छत्तापुर- पचीरा कहॉं है? कहीं हो, यह लेकर आप क्या करियेगा?"
मन, बैलगाड़ी के टप्पर से मुक्त निरगुण गाने लगता है -- "अरे, चलु मन, चलु मन ससुरार जइवे हो रामा,
कि आहो रामा,
नैहरा में अगिया लगायब रे- की••• "
कहीं और ही से पंकज मलिक की तान गुंजती है --'मन रे तु काहे न धीर धरे... ओ निर्मोही..."
चनका-पुरेनिया- दिल्ली-चनका. शब्द, स्मृति, अनुभव, उलझने और आस. सब तैरते हैं यहां इस लप्रेक में. ऐसी ही हूक जगाती आस में "उसने धीरे से कहा--अबकी सावन में बारिश के लिये दुआ करूंगी' ".
विक्रम नायक के किरदार इस सुहानी मेघ की कथा कहते हैं, खुबसुरत लकीड़ों और शब्दों की पगडंडी पर हाथ थामे दो नन्हें पैर.
और परती परिकथा का जितेन 'सबकुछ' छोड़कर गांव लौट आता है. शब्द और बीज दोनो के साथ. आस के साथ. स्मृतियों के साथ, जो वहां भी थी. जो यहां भी हैं.
यहां जमीनी हकीकत कच्छपपीठा धरती की तान को सुरसा समान निगलने को मुंह फारे खड़ा है. तो साथ ही कबीराहा मठ की तान और दिल्ली में कॉफी मग की झाग पर गुनगुनाती फेनिल हँसी भी.
यह एक ऐसी सुरीली हँसी है जो दिल्ली के मुखर्जी नगर के कमरे की दीवारों से लेकर चनका के खेत और बंसबिट्टी तक पसरी हुई है... वही बंसबिट्टी जिसे स्नेहा 'बांस की बाड़ी'' ' कहा करती है.
गिरीन्द्र नाथ झा, इश्क में शहर होना ( चित्रांकण, विक्रम नायक), राजकमल, दिल्ली, 2015.
Friday, January 29, 2016
अ
Monday, January 11, 2016
My book on Reverence, Resistance and Politics of Seeing the Indian National Flag
Cambridge University Press, 2016.
ISBN 978-1-107-11887-4 Hardback. Length: 268+xxvii
www.cambridge.org/9781107118874
Advance praise: 'A brilliant multidisciplinary analysis of the development of the Indian national flag and the way in which it came to be seen, appropriated and sacralised by different groups. A must-read for anyone interested in the Indian nationalist movement.' Bhikhu Parekh, University of Westminster
Friday, January 01, 2016
My three best readings in 2015:
A classic socially far richer and denser a treatment of body, love, longing and desire than Vatsyayana's Kamasutra. Unlike kamasutra's urban, comparatively docile women and elitist cosmos of leisure and love here we have rural, peasant and relatively bold women having their own desires and agency. My best pick is the chapter on "The Go- Between". One of the verse says: " You always say:'Your business is my business,'
But today, dear go between,
You've taken it all too literally
And gone too far."
Thanks Vidyanand Jha sir for suggesting this book.
A magical realist prose peeling layer after layer of strange yet familiar landscape of contemporary Bihar politics through lives of two politicians: Laloo Prasad Yadav and Nitish Kumar. In fact, a mind blowing account of these two Siamese twins of contemporary Bihar politics. Sharp analysis. Amazing marshalling of facts which create an alternate archive: a repository that assiduously collects not just tangible details about contemporary Bihar and her lineages but also converts whispers and body languages and personal experiences as reliable and crucial building blocks, something any contemporary history worth its salt will find difficult to ignore. A seductive language that caresses each curls and curves of the landscape called Bihar, a narrator who never misses an occasion to flirt with his memory and belongingness, and a razor sharp eye of an editor who is astute enough to know the weight of his words. Mesmerizing. Unputdownable. But, also a book any student of Bihar and contemporary Indian politics would love keep going back in search of little nuggets, to join the missing dots and to get insights only an 'insider' can offer.
3. Amitav Ghosh , Flood of Fire. Third and closing novel in Ibis trilogy. I liked the first, Sea of Poppy the most. Yet, this third shows the dexterity and dryness which constitute the terrain of this wonderful novel: the ruggedness of war itself. It is dry. It is flat. A form befitting its content.
Other temptations of 2016 which will remain with me for a long time:
1. Prabhat Ranjan,कोठागोई
बहुत समय बीता, मदन गोपाल सिंह ने फिल्म स्टडीज का दो घंटे का क्लास पढ़ाया था. बहुत कुछ याद नहीं रह जाता ऐसे क्लासों का. लेकिन उनका क्लास जेहन में रहा. खासकर दो बातें, दो तरह के उदाहरण. अंग्रेजी के शिक्षक होने के साथ वे खुद एक उम्दा सूफी गायक हैं और सूफी संगीत के बहुत बड़े जानकार. वे हम लोगों को हिंदी फिलंम संगीत के ऊपर क्लास लेने के लिये बुलाये गये थे. उन्होनें दो मार्के की बातें बतायी. पहला, उनका अपना अनुभव जब उन्हें ए आर रहमान ने अपने स्टूडियो में सूफी संगीत की कुछ बारिकियों पर चर्चा के लिये बुलाया था. दूसरी बात उन्होनें संगीत के पिक्चराइजेसन, विजुअल स्ट्रकचर आदि को लेकर की.मसला था कि हिन्दी फिल्म गीत संगीत जब पर्दे पर आता है तो उसके विश्लेषण में किस तरह के मुद्दों पर ध्यान दिया जाय और उन्होने पाकीजा के 'इन्ही लोगों ने ले ली ना दुपट्टा मेरा' का उदाहरण रखा, एक बेमिसाल उद्दरण. उन्होने बताया कि इस गीत के दृश्यमय प्रस्तुति में हम एक अनोखे संरचना को पाते हैं. इस गीत में मुख्य फ्रेम में मीना कुमारी का नृत्य हो रहा है लेकिन यह मुख्य या फ्रंट उसी एक ही विशाल फ्रेम में पार्श्व के अनेक छोटे छोटे फ्रेमों के साथ हमारे आंख के सामने आता है. सिनेमा की भाषा में कहें तो mise en scene जो है वह यहां अनेक छोटे छोटे नृत्यों से बना है अलग अलग अटारियों पर अलग अलग थिरकने हो रहीं हैं. इस तरह के एरेंज्मेंट को मदन गोपाल सिंह ने सेल्युलर नाम दिया. यहां अलग अलग फ्रेम्स अपने में स्वायत्त रूप से कुछ उसी तरह कार्यरत हैं जिसतरह मानव शरीर में अनेकों कोशिकाये (cells) स्वायत्त रूप में कार्य करते हैं ये कोशिकाएं समग्रता में मानव देह बनाते हैं जैसे इस सिनेमा दृश्य में अनेकों हो रहे नृत्य के फ्रेमों से मिलकर समग्र फ्रेम बना. यहां फ्रेम, सॉट और सीन की बात नहीं है यहां एक ही फ्रेम मे हो रही गतिविधियों की बात है, भीतर के विविधता की बात है लेकिन फिर भी एक अद्भुत किस्म के सामंजस्य की सिंक की बात है( देखें नीचे दिया गया विडियो).
सिनेमा स्टडीज के उस क्लास को गुजरे कई साल हो गये. पाकीजा के लखनऊ का वह लैंडस्केप और उसके दृश्यांकन का सेल्युलर स्ट्रकचर अभी फिर से जेहन में आ गया. कारण प्रभात रंजन की हाल में आयी 'कोठागोई(चतुर्भुज स्थान के किस्से) है. चतुर्भुज स्थान के एक फ्रेम के भीतर अनेक फ्रेम, अनेक किस्से सब एक दूसरे से जुडे हुए लेकिन हर कोई अपनी स्वायत्ता में नाचता हुआ.
उत्तर बिहार खासतौर पर मुजफ्फरपुर और उससे सटे हुए नेपाल के सीमावर्ती इलाके के सन् अस्सी और नब्बे के दशकों में आती बदलावों को प्रभातजी पहले भी अपनी कहानियों (जानकीपूल आदि) में शुक्ष्मता और अनोखे ढंग से पिरोते रहे हैं. यथार्थता अपने पूरे जादुई अंदाज में पाठकों के सामने कुछ इस तरह आती है कि सच और झुठ का फ्रक झीना हो चलता है. कोठागोई भी कुछ इसी तरह की है. लेकिन यहां कुछ सूत्र भी हैं उस्ताद गौहर खान हैं, एक शोधार्थी है, कथाकार के बचपन की यादें हैंऔर चतुर्भुज स्थान एक बदनाम वस्ती के गिरह खुलते जाते हैं एक के बाद एक. कथा चलती रहती है मानो कोई सुना रहा हो और हम पढ़ नही रहे हों. मानो हन भी 'कनरसिया' हो गये हों. इस वस्ती के बनने, बसने से लेकर आज के फेसबूक पर कथाकार को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजती एक किरदार तक का फासला तय करती कहानियॉं. अपने विस्तार से मनोहर श्याम जोशी के फलक को याद दिलाती कहानियॉं. लेकिन सामाजिक समय के बदलाव को कथा में पिरोने के मामले में यहां एक बेहद संसलिष्ट औरत परतदार मामला रहा. कुमाऊं और तिरहुत बिहार में अंतर भी तो बहुत भारी है. और जिस खुबी से प्रभात जी ने बाबुसाहबों जमिंदारों की बदलती तस्बीर खिंची है वह बेमिशाल है अपनी स्थानियता के तमाम समृधि में. यहां अनेक चरित्र हैं उनकी कहानियॉं है जिसमें इस जगह, इस शहर और इस क्षेत्र का इतिहास, इसकी बदलती लोक संसकृति और समाज है. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और मुख्य गानेवालियां हैं, कनरसिये हैं और गीत संगीत के बदलते आयाम के ऊपर की गई बारीक ओबजर्वेशन्स हैं. बैठकर सुने बाले संगीत की दुनिया खड़े होकर सुनने की दुनिया में बदल जाती है. इमरजेंसी की बात है, आदाब तहजीब की बात है. मुजफ्फरपुर और लंदन न्यूयोर्क से तथा पटियाला, लखनऊ और बनारस से जुड़े संबंध की बात है. तिरहुत और नेपाल तक फैले सुरों के दस्तक की बात है. यहां कुछ भी स्थिर नहीं. कुछ भी बेसूरा नहीं.
लिखने को अब भी बहुत कुछ है इस कोठागोई के ऊपर लेकिन मोबाइल पर टाइप करते थक रहा हूं. अंत में चार बातें, काले टीके की तरह:
पहली, प्रभातजी के पाठकों के लिये यह नई बात मही लगेगी कि प्रभाजी अपनी कहानियों मे एक किस्म की जल्दबाजी में दिखते हैं. कहानी लिख दी फिर एडिटींग किस बात की? इस मामले में वे मनोहर श्याम जोशी और मार्केज, दो नाम जिसका वे अक्सर जिक्र करते हैं, से बिल्कुल अलग खड़े दिखते हैं. जहां भी शव्दों में कमी बरतते हैं वहां बेजोड़ मिलते हैं. शैली की बात आयी तो कोठागोई में यदि रेणू जैसे एडिटिंग के प्रयोग होते तो बात कुछ और होती. रेणु दूसरे से सुनी बातों के लिये या डायरेक्ट स्पीच के लिये सिंग्ल इनवर्टेड कोमों का प्रयोग किया करते. कहानी उपन्यास सब में अपने शव्द और दूसरे से ली गई बातों के बीच एक पतली रेखा बनी रहती. पर, हर एक कथाकार की अपनी शैली भी तो होती है.
दूसरी बात, यहां जातिगत घरातल बाबुसाहबों का है. क्या लालू प्रसाद और अस्सी के दशक के बाद के बदले जातिय धरातल से चतुर्भुज स्थान अछुता रहा. यह भी एक समाज शास्त्रीय सवाल है और जाहिर है कि हम एक दिलचस्प किस्से की बात कर रहे हैं. जिसे इतिहास लिखना है वो उठाये सवालों को. पर उम्मीद तो बंध ही जाती है. हसरतों का क्या करें? लिखा ही कुछ ऐसा है.
तृतिय, और यह कतई मेरा नहीं. मैं भी सकते में आ गया जब मेरे ही घर में पता चला कि कोठागोई तो पुरूषों की बाते हैं. गानेबालियों , उनकी सबलता को जैसे पुरूषप्रधान समाज ने देखा. अब इसका क्या करें? हम नारीवादी युग में जो हैं.
चौथा, फिर कभी...
अब देखिये पाकीजा के इन्ही लोगो ने का लिंक भी प्स्ट नहीं हो रहा. फिर से एडिट भी करना होगा पर फेसबुक पर तो चलेगा... लिंक कल मिलेगा. तब तक फर्स्ट कट
https://www.youtube.com/watch?v=lEm7GwR3hvM
2. रवीश कुमार, इश्क में शहर होना.लप्रेक: लघु प्रेम कथा.
"शव्द पपड़ी की तरह उड़ रहे हैं" (लप्रेक: रवीश कुमार)
चित्र (स्केच) और शव्द की जुगल बंदी लिए लप्रेक हिंदी साहित्य के फलक पर हाल के दशकों में होने बाला एक अनूठा प्रयोग है. विक्रम नायक के रेखाचित्रों में ताजगी है और नजर को अपनी तरफ बनाए रखने का सामर्थ्य. रवीश जितने अच्छे टी.वी. एंकर है उससे अधिक अच्छे लेखक. भावुकता, नोस्टेलजिया और सेंसुअलीटी का अद्भुत मेल है यहाँ. निश्चित तौर पर लप्रेक हिंदी जगत में अपने फॉर्म के लिए याद किया जाएगा, प्रोज, पोएट्री और प्रोज-पोएट्री से इतर यह एक नयी शैली है. फेसबुक के जमाने का साहित्य.
3. Amitava Kumar, A Matter of Rats.
A fascinating prose about Musahars of Bihar, growing up in Patna; part memoir, part anthropology, part fiction.
Waiting to read:
Dipesh Chakrabarty, The Calling of History: Sir Jadunath Sarkar and His Empire of Truth
Shahid Amin, Conquest and Community: The Afterlife of Warrior Saint Ghazi Miyan
Girindranath Jha, इश्क में माटी सोना.लप्रेक: लघु प्रेम कथा.
Tuesday, December 08, 2015
Delhi 2033: दस्ताने दिल्ली
2033 ईo. राजस्थान में राष्ट्रीय राजमार्ग से बीस कि.मी. दक्षिण रात के सवा दो बजे उन दोनो की सांसे बहुत तेज चल रही थी. फिर, उस ऐसी टेंट में सन्नाटा पसर गया. दोनो ही को गहरी नींद ने अपने आगोश में ले लिया. यह सौ सवा सौ किमी का टुकड़ा जो कभी निरापद और विरान हुआ करता था जहां हिन्दी सिनेमा रोड मूवी और हॉरर मूवी की प्लॉट तलाशते कभी आया करती वह पिछले पांच सालों से ऐसे अनगिनत ऐसी तंबूओं और उनमें निढाल हुए इंजीनियरों, प्लानरों, ऑर्किटेक्ट, ब्यूरोक्रेट और खुबसुरत मर्दाने सेफ से अटा पड़ा है.
निशा अभी अभी तो मसूरी से निकली है और सीधे पीएमओ से उसे यहां भेज दिया गया, स्पेशल असाइनमेंट पर. निशीथ अभी अभी तो स्वीटजरलेंड से हॉटल मेनेजमेंट का कोर्स कर लौटा और लीला ग्रूप ने अपने सेटअप की जिम्मेदारी देते हुए यहां भेज दिया. दस साल में कितना कुछ बदल जाता है. पिछली बार, शारदापुर में छोटकी पीसिया के बहिनोइत की शादी में एक छण देखा किया था. हॉय हेलो ह होकर रह गया था. नंबर और इमेल एकसेंज भी नहीं कर पाया. कई दफे फेसबूक पेज पर जाकर भी फ्रैंड रिक्वेस्ट नहीं भेज पाया. आखिर दूसरे तरफ से भी तो पहल हो सकता था. पहल करने के मामले में निशी भी पुराने ख्याल की ही थी. कोल्ड फीट डेवलप कर लेती. और, उस भागम भाग माहौल में दोनो के पास कुछ बचा रह गया तो महज एक जोड़ी नाम और दो जोड़ी ऑंखें.
और, आज वही नाम, वही आँखे एक दूसरे से मिल गये. और अब सब कुछ शांत.
टेंट में आई पेड पर बहुत हल्के वॉल्युम में अमजद अली का सरोद बजता रहा. निशी की यह अजीब सी आदत जो ठहरी जहां जाती उसके ठीक उलट संगीत ले जाती. पहाड़ो पर डेजर्ट साउंडस्केप के साथ धुमती और रेगिस्तान में कश्मीर को तलाशा करती. जल तरंग और सरोद.
टेंट कुछ ऊंचाई पर था. इंजिनियरों और आर्किटेकटों से भी थोड़ा हटकर. सामने नीचे सौ सवा सौ किमी का नजारा. नियॉन रोशनी में नहाई रात अब तनहा तो न थी. सामने जहां तक नजर जाती रोशनी ही रोशनी. दैत्याकार मशीन, सिमेंट, लोहे, प्री फेवरिकेटड स्लैव, क्रेन, और असंख्य चीनी और बिहारी मजदूर. उधर, दूर इन मजदूरों की बस्ती से आती बिरहा सरोद की धुन में मिल गयी थी.
एक सौ साल पहले कुछ ऐसा ही तो मंजर रहा होगा जब दिल्ली की रायसीना की पहाड़ियां सज कर तैयार हुई होंगी. समय बदला, लोग बदले, तकनीकि बदला. वही दिल्ली रहने लायक न रही. हवा और पानी भला जात पॉत पैसा ओहदा माने. पहले पहले तो गरीब गुरबे अस्पताल जाते मिले. नेता, अफसर और प्रोफेसर निश्चिंत सोते रहे. पर, जब हवा ही जहरीली हो तो किसकी सुने. फिर, मीटिंग बुलाया गया. रातो रात अफ्सरों को जगाया गया. सबसे कनजरवेटिव अफसरों और सबसे रैडिकल प्लानरों को सुबह पौने सात बजे तक हॉल में आ जाना था. डिफेंस, रियल स्टेट, पार्यावरण साइंटिस्ट, मिट्टी के जानकार, पानी के एक्सपर्ट, मरीन बॉयोलोजिस्ट सभी को लाने का जिम्मा अलग अलग सौंप दिया गया था. उधोग पतियों और मीडिया हॉउस के पॉंइंट मेन को अपने दरबाजे पर पौने पॉंच बजे तैयार खड़ा रहना था जहां से उन्हे सबसे नजदीकि सैन्य हवाई अड्डे तक रोड से या हेलीकॉप्टर से ले जाने का प्रबंध कर दिया गया था. यहां तक कि ट्रेफिक कमिशनरों को ईत्तिला दे दी गयी थी कि अपने महकमे के सबसे चुस्त अधिकारियों के साथ वे ऐसे खास ऐडरेसेज और हेलीपैड या एयर वेस के बीच के यातायात पर खुद निगरानी रखें. पर, किसी और से इसका जिक्र न करने की सख्त हिदायत भी साथ ही दिया गया था. पौने सात बजने से ढ़ाई मीनट पहले उस विशालकाय मीटिंग हॉल की सभी मेज पर हर कुर्सी भर चुकी थी. सभी के सामने एक और मात्र एक सफेद कागज का टुकड़ा और एक कलम रखा था. पीरियड. लेकिन एक ही पेज क्यों, लेटर पैड क्यों नहीं? नजरें और चेहरे खाली कुर्सी पर टिकी थी जो उस हैक्सागोनल हॉल के किसी भी कोने से साफ दिखता था. और, जिस कुर्सी से उस हॉल की हर कुर्सी पर बैठे आंखो की रंगत को पहचाना जा सकता था. यह एक अदभुत मीटिंग था. आज देश की सबसे बिकट समस्या का हल ढुढ़ना था. हवा के बारे में बातें करनी थी, जो बिगड़ चुकी थी. आज राजधानी को बदलने की योजना तय होनी थी. आज निशा, निशीथ और उनके जैसे असंख्य की जिंदगी की दिशा तय होनी थी. आज ही के मीटिंग में सरोद को रेगिस्तान की जमीन पर बिरहा से मिलन को तय होना था. आज ही तो तय होना था कि निशीथ की पीठ पर दायें से थोड़ा हटकर नाखुन की एक ईबारत हमेशा के लिये रह जाएंगी. एक खुरदरे टीस की तरह...
Wednesday, November 18, 2015
गांव का वाचनालय / Library and the old reading club of my village
हमारे गाम, सरिसब पाही में मेरे घर के सामने सड़क के दूसरी तरफ एक वाचनालय हुआ करता है. नाम महामहोपाधयाय सर डा गंगानाथ झा वाचनालय.बहुत पुरानी संस्था है. आजादी से बहुत पहले की. एक रीडिंग क्लब के रूप में इसकी शुरुआत हुई थी. गाम के बुजुर्ग और कर्मठ लोगों ने आरंभ किया था यह परिपाटी. प्रेरणा कहां से आयी यह तो नहीं कह सकता लेकिन यही लोग गाम में स्कूल, कॉलेज और हस्पताल बनबाने में भी रहे. रीडिंग क्लब इनमें से ही एक के घर के एक कमरे से शुरु हुआ. बाद में दरभंगा महापाज से अनुरोध पर जमीन भी मिला जहां यह आज जर्जर अवस्था में है. जगह बदला तो नाम भी बदला. गांव के प्रसिद्ध विद्वान महामहोपाधयाय डा सर गंगानाथ झा का नाम पड़ा इसे. आज चंद उत्साही ग्रामीण इसको सक्रिय बनाने की मुश्किल कवायद में लगे हुए हैं.. आज महामहोपाधयाय डा. झा की पुन्यतिथी के अवसर पर एक छोटा सा कार्यक्रम था मैं भी सिरकत करने गया. मन में झेंप के साथ. वे मुझे इतिहासकार मान गंभीर बातों की अपेक्षा कर रहे थे. मैं अपने को एक गमैये के तौर पर देख रहा था. और, वह भी अपनी अपूर्णता में लथपथ एक ऐसा संबंध जिसे अधिक से अधिक फ्लीटिंग ही तो कहा जा सकता है. आज हैं कल नहीं. फ्लर्ट करता हुआ सा नाता.
मेरा बचपन यहां से तीस किमी नजदीक दरभंगा मे बीता. जब गॉंव आता तो वाचनालय आकर्षित करता. महाराजी पोखर के उत्तर पूर्बी महार पर ऊंचाई में स्थित इकलौता इमारत.सन् अस्सी के शुरुआत की बात मैं कर रहा हूं. संस्था अपने अवसान पर थी. लेकिन शाम को लोग बाग जुटा करते. कुछ खेल कुद कभी कभार बृहत आयोजनो का होना भी मेरी स्मृति में शेष है.यहीं शायद सबसे पहले मैंने शाखा लगते हुए भी देखा किया था. पर, जिस कोतुहल की याद जोरदार है वह इसके वाचनालय होने को लेकर है. पुस्तकालय या लाइब्रेरी क्यों नहीं, वाचनालय क्यों?
आज जब सोचने बैठा तो पुस्तकालय को केंद्र में रख लिखी गयी एक उपन्यास, उम्बर्तो इको का 'नेम ऑफ द रोज' और जादुई यथार्थवाद के पुरोधा खोर्खे लुई बोर्खेई की लधु कहानी 'लाइब्रेरी ऑफ बेबल' की ओर मन चला गया. नेम ऑफ द रोज पुनर्जागरण धर्मसुधार के युग की पृष्टिभूमी पर लिखे गये इटली के एक मठ की कहानी है जहां प्रतिदिन एक भिक्षु अंतेवासी की हत्या हो रही होती है.तहकीकात वहां के विशाल लाइब्रेरी की ओर ले जाते हैं अंत में पता चलता कि राज उस लाइब्रेरी के अफ्रीकी सैक्सन के एक खास किताब के पन्नो में छुपा हुआ है. तर्क और विश्वास , आस्था और जिग्यासा की जद्दोजहद में ग्यान और सत्ता के समीकरण अदभुत रुप में हमारे सामने आते हैं यहां इस लाइब्रेरी में हो रही हत्याओं के जरिये.
ऐतिहासिकता लिये हुए इस लाइब्रेरी से बहुत अलग दुनिया है बोर्खेई के लाइब्रेरी ऑफ बेबल की. यहां एक ऐसा अदभुत लाइब्रेरी है जिसमे वे सारी किताबें हैं जो दुनिया में उपलब्ध है. जो यहां नहीं वह कहीं नहीं. इतना ही नहीं यहां महज किताबें नहीं उन किताबों की भाषाएं और ग्यान के तमाम कोड भी हैं. मतलब जो यहा नही वह दुनिया में ही अस्तित्व में नहीं. यह एक ऐसा लाइब्रेरी है जो कल्पनातीत है लेकिन जिसकी आकांक्षा हर बाल मन पुस्तकालय में प्रवेश करते हुए करता है. जब बचपन में हम लाइब्रेरी जाते तो सोचते यहा हमारे हर सबाल का जबाब होगा. पुस्तकालय ग्यान का अकुट भंडार. लेकिन स्वस्थ समाज के लिये महज किताबी ग्यान पूर्ण नहीं. ग्यान की साझेदारी भी जरूरी. इसलिये रीडिंग क्लव. मन के साथ शरीर को भी तंदुरूस्त रखना होगा. इसलिये भी पुस्तकालय को केंद्र में रखते हुए भी एक ऐसे स्थान की परिकल्पना जहां खेलकुद और बिचार और ग्यान सबका आदान प्रदान हो सके. गाम और इसके समाज की प्रगति के लिये. जो, आज जर्जर हो चुका है. नव उत्थान की आस संजोये. जद्दोजहद करता समय के थपेड़े से.


