Saturday, May 17, 2008

वैष्‍णव जन: Narsinh Mehta

वैष्‍णव जन तो तेने कहिए
जे पीड़ पड़ाई जाणे रे ।
पर दु:खे उपकार करे तो ये
मन अभिमान न आणे रे ॥
सकल लोकमां सहुने वंदे
निंदा न करे केनी रे
बाच काछ मन निश्‍चल राखे
धन धन जननी तेनी रे॥
समदष्‍टि ने तष्‍णा त्‌यागी
परस्‍त्री जेने मात रे ।
जिह्‍वा थकी असत्‍य न बोले
परधन नव झाले हाथ रे ॥
मोह माया व्‍यापे नहि जेने
दढ़ वैराग्‍य जेना मनमां रे ।
रामनाथुं ताली लागी
सकल तीरथ तेना तनमां रे ॥
वणलोभी ने कपट रहित छे
कामक्रोध निवार्या रे
भणे नरसैयों तेनु दुरसन करतां
कुलएकोतेर तार्या रे॥
–नरसिँह मेहता।
This is a famous poem, a prayer close to Mahatma Gandhi's heart. Few words are not spelt here properly as I was unable to type 'dri' properly. please read 'samdrishti', 'dridha' instead of 'samdisti' and 'didha'.

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